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विश्व की

प्राचोन सम्यताएँ भाग

(३२३ ह० पृ० तक )

श्रीराम गोयल, एम० प्‌० लेक्चरर प्राचोन इतिहास, पुरातत्त्त एव संस्कृति विभाग गोरखपुर विश्वविद्यालय

भूमिका डा० वासुदेवद्धरण अग्रवाछ प्रिसिपछ, कोंलिज आब इण्डोलॉजी काशी-हिन्दू-विश्वविधालय वाराणसी

भारत-सरकार की आथिक सहायता से शिक्षा-मंत्रालय की योज्ञना के अन्तर्गत प्रकाशित

विश्वविद्यालय प्रकाशन

गोरखपुर वाराणसी

प्रकाशक विश्वविद्यालय प्रकाशन, नखास चौक, गोरखपुर

शाखा के ४०/१८ भैरवनाथ,

वाराणसी-१

रेखाचित्र शिवकुमार गुप्त, एस० ००

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प्रथम ईस्वीरेणु, १९६३ ६० 000७0 प्रतियों हे

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मुल्य बीस रुपया

मुद्रक ओमप्रकाश कपूर, जानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी ५९१३-१८

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परम अभ्रद्धेय डॉ० गोविन्द्चन्द्र पाण्डेय को

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लेखक की ऊतियाँ

प्रागेतिहासिक मानव ओर संस्कृतियाँ हम सब एक हैं

« समुद्रगुप्त « विश्व की प्राचीन समभ्यताएँ, खण्ड , विश्व की प्राचीन सम्यताएँ, खण्ड (यन्त्रस्थ)

गुप्रकालीन भारत का राजनीतिक इतिहास (यन्त्रस्थ)

प्रस्तावना

हिन्दी और प्रादेशिक भाषाओं को शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाने के लिए यह आवश्यक है कि इनमें उच्च कोटि के प्रामाणिक ग्रन्थ अधिक से अधिक *ख्या में तैयार किये जाएं | शिक्षा-मंत्राल्य ने यह काम अपने हाथ में लिया है और हसे बढ़े पैमाने पर करने की योजना बनाई है | इस योग्ना के अन्तर्गत अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के प्रामाणिक इन्थो का अनुवाद किया जा रहा है तथा मात्कि अन्थ भी लिखाये जा रहे हैं। यह काम अध्कितर राज्य सरकार्से, विश्वविद्यालयों तथा प्रकाशकों की सहायता से आरम्म किया गया है। कुछ अनुबाद और प्रकाशन-कार्य शिक्षा-मंत्राल्य स्वयं अपने अधीन करवा रहा है प्रसिद्ध बिद्वान ओर अध्यापक हमें इस योजना में सहयोग प्रदान कर रहे हैं। अनूटित और नये साहित्य में भारत-सरकार की शब्दावढी का ही प्रयोग किया जा रहा हैं ताकि भारत की सभी शेक्षणिक संस्थाओं में एक ही पारिभाषिक शब्दावली के आधार पर शिक्षा का आयोजन किया जा सके |

यह पुस्तक प्रकाशकों की महायता से कार्या-वित की जाने वाली योजना के अन्तर्गत प्रस्तुत की जा रही है | इसके लेख्वक अपने विपय के अधिकारी विद्वान है हमें विश्वास है. कि यह हिन्दी भापा ७र साहित्य को समद्ध बनाने और भारतीय भाषाओं के भाध्यम से शिक्षा का ग्रसार करने में सहायक सिद्ध होंगी | आशा है कि भारत-सरकार के इस प्रयास का सभी क्षेत्रों में स्वागत किया जायगा )

नई दिल्ली, “री ४] 4 ।४- 20 अप्रेल 963 |

शिक्षा मंत्री भारत-सरकार

विश्ववारा संस्कृति

प्राचीन मान्यता के अनुसार मन, प्राण और भूत्तों की सम्ति मनुष्य हैं-- प्लेयम आत्मा मनोमयः प्राणमयः वाहमयः मनुष्य ने देश और काल में विदय के रंगमश्न पर जो मन से सोचा है, कम से किया है और भोतिक माध्यम से निर्माण किया है वही मानब की संस्कृति है। किन्तु शञान, कर्म ओर रचना को संस्कृति की कोटि में रखने के लिए यह आवश्यक है कि वह संस्कार सम्पन्न हो और विश्व की प्राणघारा के अनुकूल हो | ऋग्वेद में कहा हैं सा संस्कृति: प्रथिमा विश्ववारा' अर्थात्‌ देव प्रजापति ने जिस सृष्टि की रचना की है बह एक संस्कृति है | इसकी रचना में प्रजापति ने कितना प्रयत्न किया होगा इसकी कुछ कल्पना विश्व के अनन्त रहस्यों को ध्यान में रखकर की जा सकती हैं | विश्व के गम्भीर रहस्यों का कोई अन्त नहीं है। मानव ने उन्हें समझने के लिए. अनेक यत्न किये हैं अनेक संस्कृतियों का इतिहास यही कथा कहता है। विश्व के नियमों की बुद्धिपरक व्याख्या मानवीय संस्कृति का बहुत ही मूल्यवान अंग है। उसे ही हम तन्व, ज्ञान, दर्शन, धर्म, नीति आदि अनेक नामों से पुकारते हैं | उसके अनुसार मानव ने अपने लिए अनेक मार्गों का विधान बनाया | उसकी बह कम सृष्टि भी मानवीय संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अंग है| प्राणों की झक्ति का कर्म- मय रराक्रम मानव की अपूर्व उपलब्धियों का क्षेत्र रहा है। उसमें जो धर्म और नीति की उदात्त प्रेरणा निहित है वह संस्कृति का अंग है। तीसरी कोटि में भौतिक स्तर पर अथवा भूतों के माध्यम से मानव की स्थूल रचना है, जिसका सबसे समृद्ध क्षेत्र मानवीय कला की उपलब्धियों हैं। इसी प्रकार दर्शन, धर्म, साहित्य, जीवन ओर कला के क्षेत्र में मनुष्य की समस्त कृतियाँ और रचनाएँ उसकी संस्कृति हैं| किन्तु मानव को इन सब की प्रेरणा जिस खोत से मिल्ती रही है ओर आगे भी मिलेगी, वह कोई नित्य देव संस्कृति है जिसे 'प्रथमा संस्कृति” (प्रायमीवल कल्चर) कट्दा गया है। अर्थात्‌ जो सबसे पृव॑ में थी, सबसे श्रेष्ठ थी ओर जो सबके लिए प्रतिमान या नमूना है। ऐसी संस्कृति स्वयं विश्व संस्कृति है | सूर्य, चन्द्र, आकाश, बायु, समुद्र आदि भौतिक रूप एवं उनके मूल में सक्रिय

है;

मानसतत्त्व--ये दोनों अपरिमित है और नित्य हैं एवं मानव के लिए सनातन आदश हैं |

विश्व संस्कृति को दूसरी विशेषता यह होती है कि वह सबके लिए है। अर्थात्‌ जहाँ एक ओर मानवीय संस्कृति देश ओर काल में समुत्यन्न होती है वहाँ विश्व की संस्कृति सब के लिए वरण योग्य होती है। अतएव उसे विश्ववारा' कहा गया है | एक एक मानव समुदाय, एक सांस्कृतिक पद्धति को ही जन्म दे सकता सकता है] किन्तु प्रजापति की संस्कृति सब॒ के लिए है ओर सब देशों और काल्ोों में उसकी सत्ता एकरस ओर नित्य सिद्ध रहती है। जो मानवीय संस्कृति इन दो लक्ष्यों की जितनी अधिक पूर्ति कर सकती है वह उतनी ही अधिक विशिष्ट होती है। अर्थात्‌ एक तो वह देव संस्कृति की निर्मिति और भावना को अधिक से अधिक व्यक्त कर सके और दूसरे वह देश ओर काल की संकुचित सीमाओं से से ऊपर उठकर विच्व के लिए अधिक से अधिक ख्ीकार्य हो विश्व अपने मन का प्रतित्रिम्ब जहाँ पाता है वही संस्कृति उसे रचिकर होती है। जो मानव समुदाय, अध्यात्म और धमं, तत्त्व-ज्ञान और दर्शन, भौतिक जीवन और सत्य, प्रेम और करुणा , सौन्दर्य और पब्रत्रता इन दैवी तत्वों की अधिकतम उपासना करता है ओर जीवन के विधान को उनके अनुकूल नियमित करता है वही विच्व संस्कृतियों के इतिहास में स्थिर म्थान पाने के योग्य है |

किश्व की सृष्टि तो अनन्त है किन्तु अवांचीन मान्यता के अनुसार सम्य मानव का व्यवहार भूतल पर कुछ सहस्त बर्ष पूर्व से ही हुआ है। मानव ने भौतिक स्तर पर अपनी यात्रा के जो चरण चिह्न छोड़े हैं उनका संग्रह और व्याख्या नए युग का एक चमत्कार हैं। इसके अध्ययन का श्ामत्त्रीय रूप ही बतंमान इतिहास का विपय है | इसके अनुसार मिस्र, सुमेर, क्रीट, यूनान, ख़ददी (क्रैल्डिया), असुर (अमीरिया), बाबेर (बैश्रिलोनिया), ईरान, भारत, चीन, आदि अनेक जातियों के प्राचीन सांस्कृत्तिक इतिहासी का उदघाटन किया गया है। उनकी कथा जानने योग्य है। इस अध्ययन का शास्त्रीय फल तो है ही किन्तु दूसरा प्रत्यक्ष फल मानवीय एकता की अनुभूति है। संस्क्ृतियों में जहाँ एक ओर अपनी विश्येपताएँ और भेद हैं वही दूसरी ओर एकता का भाव और भी अधिक है | उनके देवता अनेक हैं किन्तु देव-तन्व सब में एक है। सीन्‍्दर्य के विधान अनेक हो सकते हैं किन्तु सोन्‍्दर्य के लिए मन की भावना सर्वत्र विद्यमान है | जीवन के मल में प्रेम की भावना सबमें समान रूप से पाई जाती है यद्यपि उसके बिकास की क्षेत्र-सीमा में भिन्नता है। मनुष्य ने अपनी परि- स्थितयों से किस प्रकार संघर्ष किया है ओर किस प्रकार प्रकृति को अपना मित्र

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बनाकर जीवन के रहस्य को आत्मसात्‌ किया है और न्यायपूर्वक रहने की कला और युक्तियों का विकास किया है, कहाँ तक करुणा के क्षेत्र को विस्तृत करके मानव भाग को उस में समेट लेने का सफल अभ्यास किया है, इन सब दृष्टियों से संस्कृतियों को मापने का मानदण्ड प्राप्त किया जा सकता है।

संस्कृति एक ओर मन का विषय है तो दूसरी ओर नितान्त स्थूल और भोतिक मानवीय कृतियों का। भोतिक धरांतल पर या भूतों के माध्यम से आत्मा की अभिव्यक्ति ही मानव है जिसमें मानस-तत्त्व, बुद्धि और चिन्तन-शक्ति का सबसे अधिक विकास हुआ है। मन ही मनुष्य है। भनुष्य की बुद्धि जीवन के अनेक मन्त्रों का आतिष्कार कश्ती रहती है। संस्कृति विशेष की ऊँचाई नापने का विश्वसनीय मापदण्ड मानव के सुसंस्कृत मन की परख है। यहाँ कोई पक्षपात नहीं रहता | प्रत्येक को विश्व के रंगमश् पर किए हुए अपने कर्मों के आधार पर विशुद्धि के अक्षर प्राप्त करने होते हैं

नदी के प्रवाह के समान प्रत्येक संस्कृति अपने मार्ग से बहती है। वह अपने लिए जिन दो किनारों का निर्माण करती है वही उसकी विशेष सीमा है | उसी में कालचक्र के द्वारा उसके यश का विस्तार होता है ये दो किनारे कौन से हैं ! इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक प्रवाह का एक किनारा मन है, दूसरा कर्म किसने कितना सोचा और किसने कितना किया इससे ही जीवन की नदी बनती है। संस्कृति के जन्म और विकास का भी यही ढाँचा है। विधाता की सृष्टि में सबका नियामक तत्त्व काल है| उसके पट- परिवर्तन से कोई भी अछुता नहीं रहता विश्व के नाख्य मश्न पर अनेक यवनि- काएँ उठती और गिरती रहती हैं। नाटक के पात्र अपने ही विचार और कर्म की योग्यता से अभिनय कर चले जाते हैं | इस दृष्टि से प्रत्येक संस्कृति इतिहास के लिए कुछ सांकेतिक अक्षर लिख जाती है। वे ही मानवीय जीवन रूपी व्याकरण के प्रत्याहार सूत्र हैं। भारत ने अध्यात्म को, यूनान ने सीन्दर्य-तत्त् को, रोम ने म्याय ओर दण्ड-व्यवस्था को, चीन ने विराट जीवन के आधार- भूत नियम को, ईरान ने सत्‌ ओर असत्‌ के द्वन्द् को, मिस्र ने भौतिक जीवन की व्यवस्था और संस्कार को, समेर ओर मलेच्छ जातियों ने देवी दण्ड-बविधान को अपनी अपनी दृष्टि से आदश रूप में स्वोकार करके उनकी प्रेरणा से संस्कृति का विकास किया | वे सब हमारे लिए मूल्यवान हैं |

संस्क्ृतियों के इतिहास का एक मर्म ध्यान में आता है और वह यह है कि शरीर का संस्कार और आत्मा का संस्कार दोनों ही मानव के लिए इष्ट हैं जहाँ दोनों का समन्वय हो बही प्राप्तव्य बिन्दु है। केवल शरीर के अलूुंकरण

से संस्कृत का रूप बन सकता है केवल अध्यात्म के चिन्तन से हो यह भी स्मरणीय है कि मानव जाति समस्त संस्कृतियों की उपलब्धियों से आज समृद्ध है किसी एक की कृपा से नहीं। अतएब सबके प्रति आस्था का दृष्टिकोण हो विश्व संस्कृति के प्रति सच्चा दृष्टिकोण है |

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,

यापुदेघशरण अप्रवाल वाराणसी जद्पर

प्राकंषन

भारत में विध्व को प्राचीन सम्यताओं का सांगोपाड् अध्ययन अभी हाल ही मे प्रारम्भ हुआ है | इस त्रिषय को अब तक जितनी उपेक्षा होती रही है, उससे हमारी इतिहास-दृष्टि में भारी दोष उत्पन्न हो गया है और हम स्वयं अपने देश के इतिहास ओर संस्कृति के महस्व को समझने में असमर्थ होते जा रहे हैं आज- कल हमारे देशवासियों के मन में या तो यह धारणा मिलती है कि भारत प्राचीन काल में विच्च का गुर था अथवा वे कुछ पाश्चात्न आलोचर्को के साथ यह विश्वास करते पाये जाते हैं कि हमारी प्राचीन संस्कृति पाश्वात्य संस्कृति की तुलना में सबंधा उपेक्षणीय थी | इसलिए इस बाल की परमावश्यकता है कि हम अपने देदा के इतिहास और सांस्कृतिक विकास का विश्व इतिहास और सांस्कृतिक विकास की प्श्भूमि में अध्ययन करें | तब हम पायेंगे कि प्राचीन कारू मेन तो अन्य देशों के निवासी पृ्णतः बबंर और हमारी संस्कृति उतनी विकृत थी जितनी कुछ पाश्चात्त आलोचक बताते हैं

प्रस्तृत पुस्तक लेखक को प्रागेतिहालिक मानव और संस्कृतियाँ पुस्तक के ब्राद की कड्टी है, यद्यपि इसमें उक्त पुस्तक की विपय-सामग्री के सार को पहले अध्याय में पृष्ठभूमि के रूप में दें दिया गया है। इसमें भी जहाँ तक सम्भव हों सका हें नवीनतम गर्वेषणाओं से प्रकाश में आये तथ्यों को समाविष्ट कर दिया गया है |

पुस्तक में उम्सिसित कुछ गेसी बातों की ओर लेखक मुधी पाठकों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करना चाहता है जो उसके अपने अध्ययन और मनन का परिणाम हैं। उदाहरणार्थ उसने सुझाव रखा है कि सैन्धव धर्म में “दाब' को मातशक्ति का भाई ओर पत्ति दोनों माना जाता था (प्ृ७ ५५१- ५२) इतना ही नहीं उसने यह सम्मावना भी मानी है कि सैन्धत्र समाज में भाई बहिन के चिवाह की प्रथा प्रचल्लित थी (पृ० ५५०३-५४) लेखक का विश्वास है कि उसके ये सुझाव सुपुष्ठ प्रमाणों पर आधृत हैं। इनके स्वीकार से भारत के धार्मिक और सामाजिक इतिहास पर नया प्रकाश मिलेगा और भारतीय

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सामाजिक संगठन के अनेक पक्षों की मीमांसा सरलू्तर हो जाएगी इनके अति- रिक्त लेखक ने इस पुस्तक में अपने कुछ ऐसे सुझावों का उल्लेख भी किया है जिनका विस्तरशः विवेचन वह अन्यत्र कर चुका है। उदाहरणाथ उसने सम्भा- बना व्यक्त की है कि भारतीय जल्प्लावन आख्यान मूल्तः मास्तोय था (प० ५४८) और कर्वेद के रद 'झंझाबात के साथ आनेवाले विद्युत्वारी घने काले मेप्रों” का देवीकरण थे (प१० ५६६)। क्योंकि इन समस्याओं का बविश्तरइ विवेचन इस प्रकार की पुस्तक में उचित नहीं था, इसलिए लेखक इन समस्याओं में रूति रखनेवाले पाठकों से इन पर अपने अन्यत्र प्रकाशित निबन्धों को (दे० पटठनीय सामग्री) एक बार देख जाने का अनुरोध करता है| कुछ समस्याओं पर लेखक ने प्रचलित मतों के पक्ष अथवा बिपक्ष में कुछ नए तकों के साथ सबबतरबख्येण आग्रह किया है। इनमें सेन्धव सभ्यता के निर्माताओं के अभिजान, इस सम्यता की तिथि तथा आर्यों के आदि निबास ध्षान विषयक समस्याएं उल्लेखनीय हैं | आजकल कुछ विद्वान्‌ यह स्वीकृत करने डगे हैं कि सैन्धव जनता में आरयेतर द्रविड़ों की ग्रधानता थी। लेखक नें भी द्रविड्ञें को यह क्षय देने का अनुरोध किया है, परन्तु इसके साथ ही यह मुझाव भी रखा हैं कि आरयों की किसी प्रानीनतर शास्वा के भारत आकर बसने ओर सेन्धव सम्यता को उसी प्रकार पृरणं्षेण अपना लेने की सम्भावना भी स्मरण रखनी चाहिए जिस प्रकार यूनान में एकियन यूसानियों ने मिनोअन सभ्यता अपना ही थी | वह भारतीय परातलवबेत्ताओं से लोथल सं जात 'सोगष्ठीय मेन्चच सम्यता' ऑर ब्लेक एण्ड बेयर' संस्कृति की इसी एष्ठममि में मीमांसा करने का आग्रह करता है। उसे यह बात अत्यन्त महत्वप्रण लगती है छि राथल से प्रकाश में आए अवशोेषों में सेन्धव सभ्यता के वे तस्व, जिन्हे विशिप्तः आर्येलर कहा जाता हैं (जैसे मातशक्ति की मतियाँ, 'पशुपति' का अंकनवाली मद्राएँ तथा शिवलिंग आदि), प्रायः अनुपलब्ध है) क्या यह सम्भव नहोंठँ कि 'मौराष्ट्रीय सेन्धव सभ्यता का सेन्वल सम्बता से बसा ही सम्बन्ध रहा हो जैसा भमाइसिनियन सभ्यता का मिनोअन सम्बता से था और इसके निर्माता भारत में मम्भवतः श्रान से आनेवाले आयों की पहली वहर रहे हो | अगर लेखक का यह मुझाव सही है तो भारतीय आर्यों की इस प्रथम हहर की तुलना यनानी आयी की एकियन शाखा से और ऋग्वेदिक आयों की तत्ना डोरियन यूनानियों से की जा सकती है | इस हृष्टि से देखने पर यह तथ्य मह्त्वपृण हा जाता है कि इन दोनो दंशों मं आन बाली आयों की पहली लहर ने प्रासीनतर संभ्यताओं को अपनाया ओर दूसरी लहर ने उनका विध्व॑ंस किया |

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सैन्धव सभ्यता की तिथि के विषय में लेखक श्री ह्वीलर द्वारा प्रतिपादित तिथि का विरोध करने के लिए बाध्य है क्‍्थोंकि उसका विश्वांस है कि सेन्धन सभ्यता सुमेरियन सभ्यता से प्रानीनतर थी ओर “सभ्यता का भाव! (आइडिया आँव सिविलिजेशन) सुमेर से मारत नहीं आया (जैसा कि छ्ीलर महाशय मानते हैं) बरन मारत से सुमेर गया था (प० ५५७-६०)। आरयों के आदि निवास स्थान की समस्या पर उसने वेन्ट्रिस द्वारा यूनान की 'लाइनियर बी लिपि के उद्घाचन तथा अन्य नई ल्रोजों पर विचार करने के उपरान्त निष्कर्ष निकाला है कि जान की वर्तमान अवस्था में ब्रेन्देस्टीन द्वारा प्रतिपादित मत ही सर्वश्रेष्ठ है (पर० ४९१-०६)। लेखक की यह आशा ही नहीं विश्वास है कि प्राचीन सम्यताओं, विशेषतः पुरा-ऐतिहासिक भारतीय सभ्यता के अध्ययन में रुचि रखनेवाले विद्वान उसके सुझावों और तकों पर गम्मीरता तथा सहानुभूति पृर्वक बिचार करेंगे |

हस पुस्तक को लिखने में लेखक को अनेक महानुभावों ने सहायता एवं सहयोग प्रदान किया है| सर्वप्रथम यह डॉ० गोबिन्दचन्द्र पाण्डेय, प्रोफेसर और अध्यक्ष, इतिहास और भारतीय संस्कृति विभाग, राजस्थान निश्वविद्याग्य्य, का अभिनन्दन करता है। यह पुस्तक वस्तुतः उन्हीं की प्रेरणा और उत्माहनधन के परिणामस्वरूप अस्तित्व में सकी है। उन्होंने इसको पाण्डुलिपि देखकर ओर अनेक बहुमस्य सुझाव देकर भी लेखक को क्ृतार्थ किया है। काशी-हिन्दृ- विश्ववियालय के 'कॉलिज ओंव इण्डोलॉजी' के प्रिन्सिपल डॉ० वासुदेबदरणा अग्रवाल ने अस्वस्थ होते हुए भी इसकी भूमिका लिसख्वकर उसका उत्साह बढ़ाया है, इसके लिए वह उनका अत्यन्त आभारी है। गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचोन इतिहास, पुरात्तल्व एवं संस्कृति विभाग के सहयोगियों और बन्धुओं ने पुस्तक का पाण्डुलिप देखकर लेखक को समय-समय पर बहमृल्य सुझाव दिए इसके छिए वह उनका क्ृृतज है -विशेष रूप से स्वश्री शैलमाथ चनर्ेंदी शिवाजी सिंह और विजयबहादुर राब का। प्रस्तक को भारत-सरकार का शिक्षा-मस्त्रालय अपनी एक योजना के अन्तर्गत प्रकाशित करवा रहा है इस लेसक उसका अनुगृह मानता है विश्वविद्यालय प्रकाशन के अभिकारी नी पुरुषात्तमदास भोदी ने इसका प्रकाशन और ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी के भी झोम प्रकाश कपूर इसका म॒द्रण कितने उत्माह से किया है श्सका प्रमाण यह पुस्तक अपने आप है। इसके लिए ये धन्यवाद के पात्र है। हसके अतिरिक्त लेखक 'पटनीय सामग्री' में उल्लिस्वित तथा अन्यान्य उन सभी विद्वान लेखक के प्रति भी आभार प्रदर्शन करता है जिनके ग्रन्थों, निबन्धों और अन्य सामग्री का उपयोग इस पुस्तक में किया गया है |

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पुस्तक में दिए गए चित्र ओर मानचित्र आदि छेखक के अनुज श्री शिवकुमार एम० ए० ने बनाए हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने पुस्तक को पाण्डुलिपि तैयार करने, अनुक्रमणिका बनाने एबं पुस्तक को छपबाने में भी अत्यन्त तत्परता और लगन के साथ कार्य किया है। इसके लिए वह प्रशंसा के अधिकारी हैं |

गोरखपुर विश्वविद्यालय १२-१२-१९६२ श्रीराम गोयल

विषय-सची

अध्याय प्ष्ठ चित्र-सूची मर १७ मानचित्र-सूची हल २२ फलक (प्लेट) सूची मा श्र आभार प्रकादान 2 र्३ १, प्रागितिह्ास ओर सभ्यता का जन्म १-बे०

मनुष्य का आविर्भाब, १; मनुष्य की प्रकृति पर विजय और अन्य प्राणियों पर सफलता के कारण, ४; प्रारम्मिक-पूर्ब-परापाण काल, ५; मध्य-पूर्व पापाण काल, ८; परवर्ती-पूर्न-पाषाण काल, ११; मध्य-पापाण कारन, १६: नव-पापाण काल, १७; ताम्रप्रसतर काल, २१; कांस्य- काल, नगर-क्रान्ति ओर सभ्यता का जन्म, २० |

खण्ड : पश्चिमी एशिया

२. पश्चिमी एशिया का भूगोल ओर जातियाँ ३३-४० मुमेरियन सभ्यता की प्राचीनता, ३३: पश्चिमी एशिया का भृगोलल, ३०. पश्चिमी एशियाई जातियाँ, 2८

३. सुमेरियन इतिहास ओर सम्यता ४१-११० सुमेरियन इतिहास के साधन, ४१: सुमेरियन जाति, ४४: राजनीतिक इतिहास, ४७: आर्थिक अवस्था ५७: राजनीतिक संगठन, ६३: युद्ध कला, ६७; न्‍्याय-व्यवस्था और सामाजिक संगठन, ६१९: धर्म और दर्शन, ७२: नेतिक दर्शन, 2२; राजनीतिक दर्शन, ८०: लिएपि और शिक्षा पद्धति, ८९; साहितय, ९६; कत्य, १०१: विज्ञान, १०७: मुमेरियर्नों की सांस्कृतिक सफलता और विश्व इतिहास में स्थान, १०९ |

७. वेविछ्ोंनियन इतिहास ओर सम्यता ११११-१० राजनीतिक इतिहास, १११: शासन व्यवस्था में सुधार, ११९: न्याय और दण्ड-व्यवस्था, १२०; वैबिदोनियन घमम, १२२; राजनीतिक

दर

दर्शन, १२९: नैतिक दर्शन, १३१; शिक्षा और साहित्य, १३६; आधधिक जीवन, १४०: सामाजिक संगठन, १४६; पारिवारिक जीवन १४८; कला, १५१; विशन, १५३ |

प्रतिस्पर्दधी साश्राज्यों का युग १५६-१७७ विश्व का प्रथम अन्‍्तराष्ट्रीय युग', १०६; बेबिलोन का कसाइट वंश, १६०: मिस्र का एशियाई साम्राज्य, १६१; मितन्नी राज्य, १६५; हित्ती साम्राज्य, १६७; आरम्मिक असीरिया, १६७

हिक्ती इतिहास ओर सम्यता १७१- ५१३ इतिहास जानने के साधन, १७१; अनातोल्या का भूगोल और जातियाँ, ४७३; राजनीतिक इतिहास, १७४; शासन और न्याय व्यवस्था, १७८: युद्धकला, १८१; विधि-संहिता और दण्ड-व्यवस्था, १८३: सामाजिक संगठन, १८६; आर्थिक व्यवस्था, ६८९१; लिपि, 2९१: भाषाएँ और साहित्य, १९२: कला, १९५; घमे, श०२; विदेशों से सम्बन्ध २०१ |

परिशिष्ट : हित्ती जाति के आविभाव की सम्रस्था

असीरियन साम्राज्य ओर सम्यता २१४-२५६८ नवयुग का प्रारग्भ, २१४; इतिहास जानने के साधन, २१०; राज- नीतिक इतिहास, २१६: शासन प्रक्‍न्ष, २६३: युद्धकछा, २२५८: विधि-संहिता और दण्ड-व्यव्रस्था, २२९: सामाजिक व्यवस्था, २३२: आधिक संगठन, २३०; धर्म और दर्शन, २३७; असीरियन बला, २४०; बौद्धिक उपलब्धियां, २४६: असीरिया का पतन, २४९ | असीरियन साघ्राज्य के प्रतिस्पर्की ओर शात्रु २५३-२६७ नई मेमेटिक जातियों, २०३; फिनीशयन जाति और सम्बता, २०५४:

7 रे मियन ज़ाति, २०८; फ्रीगिवन और हाडियन राज्य, २०९. उरलु राज्य, २६०: उत्तर की बबंर जातियाँ ओर पूर्व के मीड, २६१८ वेबिलोनिया और क्लेल्डियन जाति, २६२; एड़म २६२ |

यहदी इतिहास ओर सभ्यता २६०-२९७ फिल्स्तीन का भूगोल, २६५; इतिहास जानने के साधन, २६

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जाति, २६७; यहूदी परिभ्रमण ( माइग्रेशन्स ) और इतिहाम, २६

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यहूदी सम्बता, २७४; धर्म, २७६; दर्शन, २८३; कानून, समाज और सदाचार, २८४; आर्थिक अवस्था, २७९; साहित्य, २९०; यहूदी सम्यता की देन, २९३ |

१०, क्रैल्डियन पुनजोगरण ४५९५-३०६ राजनीतिक इतिहास, २९५; धर्म और दर्शन, २९८; ज्योतिष और खगोल-विद्या, ३००; बैबिलोन का पुनर्निर्माण, ३०१; ब्रे्रिडोन का विश्व इतिहास में स्थान, ३०३ |

खण्ड २; मिस्र

११, पिरेमिड युग ३०९-३५५ भूगोल, २००९; मिश्री इतिहास जानने के साधन, २१२; मिली इति- हास का तिथिक्रम, ३१५: मिम्र को जातियों, ३१९; प्रानीनतम मिस्र, ३२१; पिरमिड सुग का राजनीतिक इतिहास, ३२३; धम, १२५; दर्शन, ३३३: शासन और न्‍्याय-व्यवस्था, २३५; सामाजिक-व्यवस्था, २३८: आधिक अवस्था, ३२४०; लिपि, ३४३; शिक्षा और साहित्य, ३४७: विज्ञान, ३४८; केला, ३४९ |

१२. मध्य-राज्य युग ३*९६-३६४ गजनीतिक इतिशस, ३५६: शासन-स्यवम्धा, ३५७; सामाजिक ओर आर्थिक संगठन, ३९०; धम्म ओर दर्शन, ३०९; कला, ३६१; साहित्य ओर दान, ३६०

१३, साम्राज्य-युग ३८०९-२८४ राजनीतिक इतिहास, ३६५; शासन व्यवस्था, ३७०; सामाजिक और आधिक व्यवस्था, २७१; पर्म : अख्नाटन की धार्मिक क्रान्ति, ३७२. साहिद्य, ३२७९; करा, ३८१

खण्ड : इजियन प्रदेश, यूनान और रोम

१७, इंजियन सभ्यता 3३८७-७२

इंजियन प्रदेश का भूगोल, ३८७; इतिहास जानने के साधन, ३९०; इंजियन सम्यता का उत्थान और पतन, ३९४: इंजियन सम्यता के निर्माता, ४००; कला, ४०२; बौद्धिक पक्ष, ४०६; रा जनौतिक संगठन

हर

४५८; साम्मजिक जीवन, ४०९; धर्म, ४११; ईजियन सभ्यता को देल, ४१३ |

१५, होमरकाल ओर 'हक्लासिकल' यूनान का जन्म ४१४-४४८ होमर-काल, ४१४; होमरकालीन धर्म, ४९०; 'क्लासिकल' यूनान का जन्म : राजनीतिक विकास और इतिहास, ४२२; एथेंस, ४२३; स्पार्ट, ४२८; ईरान-यूनान संघर्ष, ४३२; यूनानी पोलिस, ४३७; आशिक विकास और औपनिवेशिक प्रसार, ४३९; धर्म, ४४२; दर्शन, ४४४; साहित्य, ४४६; कव्श, “४४७

१६, पाँचवीं शताब्दी : पेरिक्लिज़ का युग ४४९-४६६ एथेंस का साम्राज्य, ४४९; पेरिक्लिज्ञ, ४५०; एथंस के जनतन्त्र का चरमोत्कर्प, ४५४; कछा, ४०६; दर्शन, ४५९; विशन, ४६२; साहित्य, ४६३ |

१७, चतुथ शताब्दी : 'क्लासिकल-युग' का अवसान.. ४६७-४७६ राजनीतिक इतिहास, ४६७; अले क्जे ण्डर, ४६८; का ओर साहित्य, ४७३; दर्शन, ४७५ |

१८, रोम का उदय ४७७४-४८ रोम का महत्व, ४७७; इटली का भूगाल आर जातियों, ४७८; इतिहास जानने के साधन, ४८०; राजनीतिक इतिहास, ४८०; संवैधानिक विकास, ४८२; पेट्रीशियन-प्लेबियन संत्र्प, ४८३; धर्म, ४८५, सांस्कृतिक प्रगति, ४८६ |

खण्ड ; ईरान

१९. प्राक-ह्तामशी युग ४८९-००७ भूगोल ओर जातियाँ, ४८१; इण्डों-यूरोपियनों का आदि देंश, ४९१, इण्डो-इरानी, ४१६; इतिहास जानने के साधन : अवेस्ता, ४९७; राजनीतिक इतिहास, ४९८; ईरानी आर्यों का धर्म, ५०३; जरथुष्ट, ५०३।

२०. हस्तामशी साम्राज्य ओर सभ्यता ५०८-५०२२ गजनीतिक इतिहास, ५०८; शासन-व्यवस्था ५१४; हस्तामशी संस्कृति

१५

का बौद्धिक पक्ष, ५१७; कल्य, ५१८; आर्थिक और साम्राजिक अवस्था, ५२०; धर्म, ५२१ |

खण्ड ५; भारत

2१, पुरा-णेतिहासिक भारत (सैन्धव और

वैदिक सभ्यताएँ) ७५५५-५७ भूगोल, ५२५; इतिहास जानने के साधन, ५२७; प्रागितिहास और जातियाँ, ५२८; सैन्घव सभ्यता की खोज, ५३१०; बलाचिस्तान की ग्राम्य संस्कृतियाँ, ०३१; सैन्धव सभ्यता की विशेषताएँ, ५३२; सेन्धव सम्यता के निर्माता, ८२२; नगर-योजना, ५३८; कला, ५३९१; आर्थिक अवस्था, "४४; राजनीतिक और सेनिक संगठन, ५४६; बोद्धिक पक्ष, ५४७; धर्म, ५४५; सामाजिक संगटन, ५५३; विदेशी सम्यताओं से सम्बन्ध, ५५४: तिथिक्रम ; मन्धव सम्यता की सुमेरियन सम्बता से आपेक्षिक प्राचीनता, "५७; सेन्धत्र सभ्यता का विलोप और आ्यों का आगमन, ५६०: वेदिक साहित्य, ५६२; ऋग्वेदिक अथवा पृर्व-बेंदिक काल, ५६३; उत्तरवैदिक काल ; आर्य ओर आर्यतर धाराओं का समन्वय, ५६७ |

, मगध का उत्कर्ष ओर घम्मे-क्रानिति ५३२--०७८

राजनीतिक इतिहास, ५७२; धर्म ओर दर्शन, ५७३: समाज और संस्कृति, ५७७ |

खण्ड ६: चीन

२३, चीनी सभ्यता का जन्म ५८१-५९९,

भूगोल, ५८१: इतिहास जानने के साधन और प्रागितिहास, ५८२, शांग संस्कृति, ०८४; चीनी लिपि, "८०; चोंऊ युग : राजनीतिक इति- हास और संगठन, ५८७; आधिक और सामाजिक संगठन, ०८१,

कला ओर साहित्य, ५९०; धर्म, ५९३. दर्शन, ५९४ |

पठनीय सामग्री ६००-६०४७ पारिभाषिक शब्द-सूची ६०'९-६१४७ विषयानुक्मणिका ६१७-६२०

चित्र-सूची

/, पूवे-पापाणकालीन मेमथ

२. जाया मानव

३, दोडियन मुटिद्ुरे

४, एक फलक उपकरण

५, निय्ड्थठ मानव

६, मुस्टरियन उपकरण

७, आमानयों मानस

८, मग्डेनियन उपकरण

ओऑरिस्ेशियनसुगीन नारी मर्णि

£ ७, परवर्ती पूर्व पापाणकाह का गुहा-चित्र 28 ऋशुपाधाणापकरण ४०५, नत-पापाणकाटीन पोलिशदार उपकरण ४9, स्टानटिल्न का कलापाण £ ४, कास्यकालीन उपकरण ४५, हित्ती सम्राट हत्तसिलिस की राजमंद्रा ४६, उरनम्म द्वारा निर्मित उर के जिगुरत का काह्यनिक चित्र 29७, ऑनीज की असीरियन युग की मलि :८, एक अक्कादी नरश की कास्य मत्ति ४०, उर से प्रामत गा देवी को स्वर्ण-मृत्ति २०, एक प्राचीन सुमरियन नाव २१, एक परवरत्ती सुमेरियिन नाव £२, 'उर की पताका' का एक सृश्य 3, मुमेरियन रथ २४६, एक सुमेरियन अभिलंख का अंश २०, भिड़ी की पाटी पर स्टाइल्स से लिखने की विधि २६, कॉआक्षर लिप का क्रमिक विकास २७, गिल्गामेश और एनकीड़ २८, गिव्गामेश : सिंहों से युद्ध करने हुए २९, उर ले प्राप्त एक मुद्रा ३०, एक सुमेरियन मुद्रा

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३१. सुमेरियन शिरस्त्राण

३२, लगश से प्राप्त रजत पात्र

३३. ग्रध्र-पाषाण का एक अंश

३४. सुमेरियन मेहराब

३५. सुमेर से[प्राप्त मिढ़ी की एक जाली

३६, एरिट् के जिगुरत का कात्पनिक चित्र

३७, जर से प्राप्त एक मुद्रा

३८. कसाइट थुग की एक पाषाण-मद्रा पर उन्कीर्ण वेबिलोनियन हल ३९, मिस्र से प्राम् एक कनानी योद्धा का चित्र

४०, हग्मूरबी के संहिता-स्तम्भ का ऊपरी भाग

४१, बल्ट दी गई मेड के यकृत की बेविलोनियन अनुकृति

४२, बेबिलोन के जिगुरत का कास्पनिक चित्र

४३, मिल्री फराओ रेखामर को समाधि के भित्ति-चित्र का एक अंश ४४. हित्ती नरेश तारकोन्देमीस की रजत मद्रा का चित्र

४०. एक हित्ती राजकुमार का मिस्र से प्राम रिल्रीफ-चित्र

४६. मलत्या से प्राम शिकार का रिलीफ-चित्र

४७. हित्तो योद्धा

४८, एक हित्ती चित्राक्षर अभिलेग्व का एक अंश

४९, ब्ोधृज़्कोई के एक मन्दिर का कात्यनिक पुन्निर्माण

५०, पुजारी वेश में ऋतुदेव के प्रतीक वृषभ की पृजा करते हुए एक

हित्ती राजा की अल्जहयुक से प्राप्त मृत्ति

५१, यजिलीकय दीघधां का रुख्य ह्थ्य

५२, यजिलीकय से प्राम एक विचिन्न देवता के चित्र की ग्वानकृति ७३, द्वार-संरक्षक' की मृत्ति-- सामने ओर पाशव से

५४, बारहसिंगे पर[आरूद एक हित्ती देवता

५५, हित्ती 'पमपति

५६. एक दित्ती राजा अपनी रानी के साथ पृजा करते हुए

५७, कार्शमिश से प्राप्त पक्षयुक्त सिंह ५८, अमीरियन देवराज अशुर के चिद्द की रखानुकृति ५९, असुरन सिरपाल के राजप्रासाद से प्राप्त पक्षयक्त नरजूप्भ की मूत्ति ६०, तिगलथपिलेसर के शासनकाऊर का एक रिलीफ-चित्र ६१, असुरबनिपाल के राजप्रासाद से प्रात शिकार का एक रिलीफ-चित्र

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च््क ब्ड्जे

१९

६२, दो असीरियन योद्धा २२७ ६३, एक असीरियन 'शड्डफ! २३५ ६४, सेनाक्रेरित्र के द्वारा निर्मित कृत्रिम जल-मार्ग ( ऐकीडक्ट ) का

कास्पनिक पु]नर्निमाण २४२ ६५, सिंह शावक ले जाते हुए व्यक्ति का असीरियन रिक्रीफ-चित्र २४३ ६६, एक असीरियन राजा और उसका मन्त्री २४४ ६७. घायल सिंहनी' २४५ ६८, अमुस्बनिपाल की शय्या का चित्र २५२ ६०, फिनीशियन पुरुषों को पाशाक कीटान की रखा कृति २५३ ७०७, एक फिनीशियन जलपोत २५५ ७५, एक फिनीशियन कंघा २५७

७२, एलमी देबताओं की मृत्तियों को ले जाते हुए असीरियन सैनिक २६३ ७३, पिलिस्तीन के गेजेर नामक स्थान से प्राम एक यहूदी परापाण-अभिलेख २६५

७४, एक सिंह का वेबिलानियन भित्ति-सित्र २९७ ७५, इब्तर-द्वार ३०२

५६, मिस के गिजेह नामक स्थान पर स्थित तोन पिरमिशें के मुलरूप को पुनर्नियोजित खूपरस्ता

७७, दक्षिणी ओर उत्तरी गज्यों के मुकुट

७८, एक प्रास्वेशीय मिल्री सूट भाणड जिस पर नौका का चित्र बना हैं

७, पषी प्रथम को नाम्र प्रतिमा

८०, का केब पर पर जमा कर नृत को ऊँचा उठाना

न्‍प्ज 0 ,28७ #छ >#0 80 >्यत >>) >>! *₹० र.. ( «0 ९! «०9

८९, पक्षयुक्त संर्यचक्र

८२, हियराकोनपोटिस के ब्येन की सुब्ण प्रतिमा का शीर्ष भाग ३२८ ८३, पिरमिद-युग का हल ३४६० ४, प्रिमिइ-युग का एक भिल्ली पशुपालक ३४१ ८७. प्राचीन मिख्र में इंट बनाने को विधि ३४२ ८६, पिरेमिड-युग का कुम्हार २४२ ८७, नरमेर की स्लेट पड़िका २४४ ८८, एक हाश्रंटिक अमिलेश का अंश ३४८ ८९, मिल्री चित्राल्लर ओर हाइरेटिक लिपियों की तुलना ३४५ १९०, पेपाइरस के निर्माण के लिए पौधों का संग्रहण ३४६

९१, प्राचीन भिम्र में पत्थर तरादने का दृश्य २५१

२०

९२, पेपी प्रथम की ताम्र प्रतिमा का शीषभाग १५४ ९३. पिरेमिड-युग के एक मस्तब्रे से प्रात चित्र ३७०४ ९४, पिरेमिड-युग की रानी देतेपहेरेस को पालकी का चित्र ३५५ ९५, बेनीहसन से प्राप्त एक मध्यराजयुगीन धूपदान २५६ ९६. मध्य-राज्य युग की एक काष्ठ मूत्ति ३६२ ९७, थीबिज की राजसमाधि से प्राप्त साम्राज्ययुगीन पृर्णाकार रथ का चित्र ३२६५ ९८. देवोपासना करते हुए एक मिल्री सम्राट २६६ ९९, अख्माय्न को पत्नी नोफ्रेतीति की मूत्ति ३६७ १००, एक मिली सम्राट ओर उसकी रानी ३६८ १०१, “मी का निर्माण ३७२ १०२, एक बुक आँव दि डे ड' पर पानी के रगा से बना चित्र ३७३ १०३, एक मिल्नी देवता ३७४ १०४, तूतनखामेन की अन्तः शवपेटिका का ऊपरी भाग ३७४ १०५. साम्राज्य-युग की एक न॒तकी ३८२ १०६, आठवीं शती ई० पृ० की कांस्य की एक देवमूत्ति ३2३ १०७, क्रीट से प्राप्त परवर्ती भिनोंअन युग की एक नारी मृत्ति २८७ १०८, थीबिज से प्राप्त एक भित्ती-चित्र ३९६ १००, थीबिज्ञ के भित्ति-चित्रों में अंकित एक केपिटिक का चित्र ३९७ ११०, वाफियों से प्राम एक सुबण निर्मित प्याला ४०३ १११, नो सो के राजप्रासाद का काल्पनिक चित्र ७०५ ११२, एक क्रीटी अभिलेश ४०७७ ११३, व्यइनियर बी! लिपि के कुछ रेव्रा-चिह् ४०७ ११४, नो सों के एक भित्ती-नित्र में अंकित क्रीटी राजा अथवा सासन्त ४१० ११०, एक क्रीयी खिलाड़ी की हाथीदात की मूर्सि ४११ ११६, क्रीट से प्राप्त एक पालकी के मो डेल का चित्र ४१३ ११७, साइलिक्स नास के प्यालों के एक नमूने पर अंकित बालक का चित्र ४१४ ११८, एयथ्रे्स के सुप्रसिद्ध देवालय पा्थनोन के काह्पनिक पुनर्निमाण की रेखानुकृति ४१७ ११९, पेरिक्लिजञ ४५६ १२०, डोरिक स्तम्भ ४६६

१२१, आयोनिक स्तम्म .. ४५७

२१

१२२, अपोलो की ओलमिपिया से प्रास कांस्थमृ्ति की रुखानुकृंति १२३, आइसस का युद्ध १२४, अले क्जे ण्डर महान १२५, कोरिन्थियन देंली का स्तम्म १२६, एट स्कन शिरख्राण १२७, एशियाई ढंग के शुकुन सूचक यकृत का एट्र स्कन कांस्य मो डेल १२८, एक मीडियन अश्ारोंही २२९, लुल्लबी जाति का एक रिलीफ-चित्र १३०, एक मीडियन सामन्त १३१, सीथियनों से युद्ध करते हुए, दंरानी योद्धा १३२, पक्षयुक्त-अहरमज़ुदा १३३, नकक्‍दो-रुस्तम की अग्नि-वे दिकाओआ का रेखा-चित्र १२४, दारयबोप प्रथम और विद्रोही नेता १२५, लरिस्तान से प्राप्त ईरानी खज्नर १३२६, कुरुप महान के फ्रवर्शी का पेसरगेडाय से प्राप्त चित्र १३७, दृश्नामणी युग का एक म॒ुवर्ण आभूषण १३८, पश्चिमोत्तर भारत के झोत्र स्थान से प्राप्त मातृदेवी (!) की मृत्तियाँ १३९, हृद्रप्या से प्राप्त छाल प्रस्तर की मूर्ति / १४०, हृड़प्या से प्राम नरक की मुत्ति / १४१. मोइनजोदड़ों से प्रात पुजारी (:) को मुर्ति १४२. दृड्डप्या से प्राप्त नरक की मूर्ति" का काल्पनिक पुनर्निर्माण १४३. मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक ठोकरे पर बना नाव का चित्र १४४, सेन्धब गाड़ी का चन्हृदड़ों से प्राप्त मिद्री का नमूना १४०, सिन्धु लिपि के कुछ चित्राक्षर / १४६. सेन्धव_'परुपति' १४७, यंदिक रथ का कान्पनिक चित्र १४८, एक हखामशी रिंकीफ-चित्र में चित्रित एक भारतीय १४९, यिन-यांग १५०, हांग युगीन चीनी लिपि का नमूना १७१. चोऊ युग का एक कांस्य-भाण्ड १५२, भैन्सियस

मानवित्र-सची

₹, पश्चिमी एशिया पृष्ठ ३६ के सामने २. मिस्र ३१० के सामने २. ईजियन प्रदेश ३८६

४. भूमध्य-सागरीय जगत्‌ ( ७००-५०० ई० पू७ ) ४०

५, एके क्‍जे ण्डर का साम्राज्य ४७०

६. हखामशी साम्राज्य ४८८

७, इटली ४७८

८. पुरा-एतिहासिक भारत ५२५४

९, वेदिक भारत ५६४ १०, पूर्वी एशिया (५५८०

फूलक ( प्लेट ) सूची १, (अ) अमुरबनिपाल के पुम्तकालय से प्राप्त एक पृष्ठ $ के सामने असीरियन अभिलेग्य (आ) नरामसिन पापाण २. शिकारी कुत्ते: एक असोरियन रिलीफ चित्र २४४ के सामने

३. नेबोपालेस्सर द्वारा निर्मित इंश्सर द्वार का काव्पनिक ३०२ के सामने सम्रवायवी जित्र

४. (अ) मिर्खी स्फिन्‍्कूस और पिरेमिड ३३२ के सामने (आ) अख्नाटन का भोज

५, तृतनखामेन की शबपेटिका का ऊपरी भाग पृष्ठावरण के सामने

६. (अ) रोजेया प्रस्तर ३४६ के सामने

(आ) एक यूनानी कछश नित्र ७. नो सो के राजप्रासाद के अन्तःपुर का काल्पनिक चित्र ४०४ के सामने ८. (अ) मोहनजोदड़ो से प्राप्त 'पुजारी' की मूर्ति ५५२ के सामने (आ) मोहनजोदड़ो से प्रासत 'नर्तकी' की मूर्सि

आभार प्रकाशन

पुस्तक में दी गई ग्रेट (अओ) तथा (आ) के लिए लेखक “ब्रिटिश संग्रशा्य” का और (आ) के लिए. 'लूब्े संग्रहालय” का अभारी हैं। ऐ्लेट को छापने की अनुमाते उसे ओरियन्टल इन्स्टीट्यूट', यूनीवर्सिटी आंब शिकागो से मिली है। इसके लिए वह इस संस्था का उपकार मानता है| डेट (अ) के लिए 'काहिरा संग्रहालय का तथा के लिए 'इवबान्स' का ऋणी है। वीं प्लेट को छापने की अनुमति देकर उसे आक्योलॉजिकल सर्व ऑब इषण्डिया' ने उपकृत किया है। प्रेट (आ) तथा (अ) के रेखाचित्र क्रमशः 'वेलिकोव्स्की की “ओण्डिपस आंब अख्नाटन' तथा अंस्टेड की 'कोन्कुएस्ट ऑब सिविलिजेशन' में प्रदत्त चित्रों के आधार पर बनाए गए हैं तथा शेष रेखाचित्र निम्नलिखित पुस्तकों में प्रदत्त चित्रों की सहायता से ;

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प्रागितिहास ओर सभ्यता का जन्म

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मनुष्य का आविभोव

जीवनका उद्मव और विकास

जीवन का उदभव--जबसे मनुष्य को प्राणिजगत्‌ में अपने एथक्‌ अस्तित्व और वैशिष्ट्य का बोध हुआ, वह अपनी उत्पत्ति की सभस्था पर विचार करता रहा है। विश्व के लगभग सभी धर्मोमे प्राणियों के आविर्भाव और मनुष्य की

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इस ५४ के ऊपर दिये गए चित्र में पूर्व पापाण काछ के सुप्रसिद्ध पशु मेमथ ( गजरा'ज ) का अंकन है | उसकी तुरूना उसका पीछा करते हुए शिकारीके साथ करके उसके दृहद्‌ आकार का अनुमान किया जा सकंता हैं मैमव के दंतद्य की विशालता विशेष रूप से द्रष्टव्य है

विश्व की प्राचीन सम्यताएँ

उत्पत्ति पर प्रकाश डालनेवाली कथाएँ उपलूब्ध होती हैं। श्नमें सामान्यतः यह मत प्रतिपादित किया गया है कि इंश्वर ने सब प्रकार के प्राणियों की समकालीन परन्तु पृथक-प्रथक्‌ विकसित रुपों में सृष्टि की थी, बाद में उनकी बंशानुबंश परम्परा घटती रही | इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य अन्य प्राणियों से सवंधा पृथक ओर श्रेष्ठ है और उसकी शारीरिक संरचना और मानसिक दशा में उसके आविर्भाव से लेकर अब तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ है | परन्तु आधुनिक काल में हुई वैज्ञा निक गवेषणाओं ने इस विश्वास को निराधार और सत्य के सर्वथा प्रतिकूल सिद्ध कर दिया है। आजकल नृबंशशासत्री विकासघाद ( थ्योरी आँव एवोसव्युशन ) के