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पे थ्शा ि हक स्खा अधथशर्ि क्र खंच- [ भारतवर्षीय हिन्दी-अरशास्तर-परिषद हारा स्वीकृत ]

नओसिदाप-स->--

लेखक-- (द्याशंकर दुबे, एम० ए०, एल-एल० बी० अरशास्र अध्यापक, प्रयाग विश्वविद्यालय

भूमिका लेखक--- पंडित अमरनाय का, एम० ए०, एफ० आर० एस० बाइस जैन्सलर, प्रयाग विश्वविद्यालय

जज०्ल-

प्रकाशक

साहित्य-निकेतन प्रथमावृत्ति दारागज, प्रयाग मूल्य ६]

श्च्इ०

प्रकाशिका--- रामकली दैवी + व्यवस्थापिका साहित्य निकेठन, दारागज्ञ, प्रयाग।

मुद्रक--- नारायणप्रसाद, नारायण प्रेस, नायययण बिल्डिज्ल, प्रयाग |

भूमिका अर्म- धाल्त्र बा अथय्रर आइुमिक सवान कात जनवशाड़ ख्ेरक हैं /वचीव जमय हैं, जन ति दाध्ारण व्यक्ति री आफिस अाकश्यर्कानें सीकित थी, जन अध्यापक भअबी भाक्षम ने, टफ़्तालिलित॒उस्ती अधया बग्रेस्थ अन्यो बी तहांयता में हमस्त शध्यी 2907 बढ थे, जब शिज्ित_ बक्से वी दहशात्रश की उपेट उत्फी: उरील्डि बल और स्वास्थ मे निनेमदुत*ज सानत्री- 4 शिकामी, सनजना वैमेद्धध उचा मे लिया मा वहीउसरे सिरे पर्रीक था अररी चना वर्शशरिकि कि बाड़ शिला था उसी कि जस्टन रहते शिए सत्र क्िलक्‍लए्टनि पति शार कक्‍्यति की दोहे | यही सानमद श्री बधजादा शी तर अर्पद्वरत्ा जे वर्िशि है साधतटथायनतत भा शी लीपिय क्पी ही 4 फल रब जे समाज इकया मिस्ट्त दे वश हैं. और किल्य के जीन के इतनी युशिष्टश उपध्यित लि गई है. कि दत्त शाह फ्ठिती थी सहायता मित्र अगिगटना जकए- है उविद १९ ३८ अगरिधालओर जे तलीएका ज्खयव्ध्वरबरत्ता परत है आदीना, उन छा, वल्ताका, - रिवान्त आवश्यला वर्‌दुजितर - स्खरन्‍एानरपीता हह सिशाकी , पर्स ममस्प्त सख्रुनी उनर्पिक्त लियति मे है; /अरेरिक, आपाद, इंगलैड4ी लिएकिया सहरसा अमान हरि पेश नी खोशरि शा पसन्णटरी उध्ट वेत्ञाओं का शत बढ है. केकल उक सिक बा. धमसत्ा लिशलना; रनिटत आश्थिद् उतदभिर ऐ. किकवितू इम्म बद्यत हैं / पत्र और सेशन फैवीक-

से उमावित तेवर, आईीकिना--जी सधाशि, वफ सह शरुवरि चद्षशिण

दलित बा्ानाहत हैं; और पैकतिक जीनश ते मी इन्ही सातरक्षा्रलि व्रत हिबद अपी आचरीय की टिका करता है; (हट शिव किर है. लन्‍री नी सयब्स्य जखिब कटी हैं. रथ भा टी जररिफिये केजतिश्रद्ू रखना जबस्थर है / स्वस्त मे शिलिकन लकशि ही रण आशध्य भगवती है रही है. /

अखु ।मैसी उठी गति है मैंकी ही शिक्षा बी अच्हती मी हेगी

जारती है। तरशास्त्र मधयरात अत खालरशा मद रैशरखा

लेगी ऑलिार्ण हि यथा है / कारयिए के दिशी के इस शास्त्र नी की उच्दरि ढ्् है और दि री है हहारि निशा से दुख अध्यन्य कार्ट टै,

बख छाए औैजूदुशिया वानती जगति हावी रैक सगते।

परत दयाशवर दूरे शेर कीत उरते हिली हैसर्वशिसनते लितिघा

लिक्श पटलेस ओर, पल्लिकाये घिस रहे है; /आपी शिन्दीसाहित्य पे एल अगनी हरि मे वठी सराहवीश सेनानी है /रिनिजथिलनिफोलासरभा

आधार नर्दन करसा आप ही जा आर है. / अर आपने यह विशानसाया उुस्तब निब<र टिल्‍री वन्‍्नि ढ्ति का रिक्‍ा वश धरा लिफा है हि4ढुका प्िशि ता बहू वुहतका का अध्यदा अर्शिफत्रति वाटिबजमर करने ते लिंक फर्ीशसियर / इतनी कखनशेती लिक्रआाहियी है; तिवाश के स्‍निखलना नर की शक्ति इसमे है, म्््विदि केड्ध्यद्रत बल बी उचकि के का है) कूलर था दए रेकटलेसन रे वकती हरिरभकता बला हैं / हिचीय्टटिला + इत इुस्हव वा वाखन दिशा और जियारीयि का रृचति उपचाट ऐयो --

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द्ट्‌र अर्थप्रधान युग में अर्थ या घन का महत्व समझाने की शावश्यक्ता नहीं है छोटा बच्चा भौ पैसे का सहस समभता है ओर मचलपर अथवा रोफर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करता दे बद भी इतना जानता दे कि पेसा दी ऐशी वस्तु दे निम्से वह अपनी इच्छित वस्तुएँ. ले सकता है। नवसुबस ओर बूढे आदमी तो दिन रात उसी की चिता मे परेशान रहते हैं

परन्तु बहुत कम व्यक्ति उस शास्र का ध्रध्ययन बरते हूँ जो यह बतलाता दे हि व्यक्ति, देश और समाज गरीय या घनवान केसे द्वोते हें. श्रौर गरीय देश या व्यक्ति के धनवान होने के प्रधान साधन क्या हैं | भारत बहुत गरीब देश है। यहाँ की अधिकाश जनता को कठिन परिश्रम करने पर भी रूसा सा भपेट भेजन नहीं मिल पाता देशवाधियों मे अर्थशात्र के ज्ञान के प्रचार करने को श्रावश्यक्ता खयसिद्ध है। इत प्रचार में सब सेंबड़ी कठिनाई

(४)

हिन्दी में थ्र्थशास्र उम्पन्धी पुस्तकों की कमी है | इसी कमी के। कुछ अश में दूर करने के लिए मैंने इस पुस्तक को लिसने का साइस किया हैं

एक युग था, जय अर्थ का केवल़ बाह्य जीवन से ही सम्बन्ध माना जाता था हमारे देश का आदर्श तो यहाँ तक डेंचा था कि योगी यती ही नहीं, सदूगदस्थ लोग भी अर्थ उचय के सम्सन्ध में उदासीन रद्दा करते थे। पर आज श्रव यह स्थिति नहीं है। आन ते श्र्थ हमारे रात दिन के चिन्तन का विपय बन गया है। जीवन-निर्वाह के लिए. द्वी नहीं, आज ते विवाह, पुत्र जन्म, श्रत्य रस्कार, प्रेम, प्रतिदान और उपद्ार से लेकर जीवन के अन्तिम क्षय तक के लिए, भर्थ एक प्रधान, उल्कि सब प्रधान, समस्या है | ग्राज ते विता माता पुत्र के प्रति, भाई भाई के प्रति, इष्ट मिन, कुठम्ब्री और व्यवद्वारी अपने साथी, पड़ोसी और सदहये।गी के प्रति अपने श्राक्मीय प्रेम, आउर्पण और प्रतिदान के लिए. एक मान अर्थ पर द्वी निर्भर रहते हैं | आज ते एक मात्र झ्राथिक समस्या द्दी जीवन को प्रमुस समस्‍या दे अतएथ कितने आश्चय्य किन्तु परिताप का विपय दे कि जीवन के क्षय क्षण से सम्बन्ध रसने वाले ऐसे अनिवाय्य उपयोगी विषय (अर्थशातत्र) के प्रति इमारे देश बी शिक्षित जनता अनुराग का मात ने रसकर उसे एक शुप्क्र विपय मानती है| जय कमी में इस तरह की बात सुनता हूँ, तो मुझे बम क्लेश होता है। मैं खाहता हूँ कि इसारे नवशुवर अर्थशास्त्र के स्थायी और व्यापत् महतय को स्वीझार करें और इस जिचार को सदा के लिए. मूल जायें हि यद्द कोई

शुष्क विपय है। मेरी तो यह पकी घारया दै कि यही एक ऐसा व्रिपय है

(५)

जो गौवन को रस, सफल और प्रिय बनाने में सब्र से श्रथिक्र सद्दायक औै। में आशा करता हूँ कि इस पुम्तक को पढ जाने के अनन्दर पाठक मेरे इस मत से पूर्णतया सहमत होंगे। में उन अ्यक्ियों गे से हूँ जो यद विश्व/स करते हैं कि अर्थशाज्र इतना सरल विषय दे कि उसका शान साधारण जनता से लेकर प्रारम्भिक कक्षाओं तक के विधार्थियों को आठानी से कराया जा सकता दै। इसी उद्देश्य से मैने बालयोध रौडरों में कुछ पाठ अर्थशास्त्र-सम्बन्धो विषयों पर दिये। ये रौडरे युक्तप्रात की सरकार द्वारा स्वीकृत हुई और इंडियन प्रेत द्वारा प्रकाशित की गई इनका प्रचार पाँच वर्षा तक युक्तप्रात में हुआ। मुझे यह सूचित करते हर्ष द्वोता दे कि अर्पशास्तर-सम्बस्धी पाठों को प्रारम्भिक पाठ्शालाओं के अध्या- पर्कों भौर विद्यार्थियों ने बहुत पसद किया इस तफ्लता से भ्रोष्सादित होकर ' मैंने एक ऐसी पुस्तक लिसने का विचार ऊ्रिया, जिसमे अर्थशास्तर-्सम्बन्धी प्रायः सब्र बातें कद्दानो या खाद के रूप में इस प्रकार से दी जाय कि साधारण जनता उसे आसानी से समझ सके और उपकी रुचि भी इस शास्त्र के पढने के सममस्ध में यैशा हो कई व्यक्तिगत ऋूमट़ों के कारण में अपना विचार शीभ कार्यरूप भे परिणत नहीं कर सकता | तो भी मैं प्रयश्या करता द्वी गया। इसी प्रयल का परिणाम यद्द पुस्तक हे। इसे द्िल्दीसपार को भेंट करते हुए मुझे बहुत प्रशक्षता द्वो रही है। यद्द मेरे २० वर्षों के अर्थशास्त्र के अध्ययन और अध्या-

पन के अनुभव के आधार पर लिसी गई हद | इस पुस्तक मे भारतीय इृष्टिकोण

(६)

को प्रधानता दी गई है और धर्म तथा श्रर्थ वा सम्यन्ध भा इसी दृष्टिजोण से समझाया गया हे। आजकल सुसार में प्राय सर्वत्र मौतिक्वाद और स्वाय विद्धि का साम्राज्य स्थावित है अथवा द्वो रह्म है। ससार भर में अशाति की लद्दर पैली हुई है। जो गरीय हूं वे तो दु सी हैं दी, परन्तु धनवान भी सु का अतठुभष नहीं कर रदे हैँ। अपने थोडे-से निजी स्पार्थ के लिए दूसरों का या समाज का भारी अदित करना धनवान व्यक्ति भी बहुत जहूद अगीकार कर लेते हैं | इस सम्पन्ध में वे धमे का तो कुछ ख्याल ह्वी नहीं रसते | पर मेरा दृढ विश्वास है कि ससार मसुस् और शान्ति का साम्राज्य तभी स्थापित द्वो सवा दे जप श्र्थ-सम्मन्धी प्रत्येक बार्य धार्मिक भावना की प्रधानता रदे। यही हिन्दू आदर्श है) प्रिश्व का स्थायी शान्ति ते लिए भारत का यद्दी एकमात्र पदेश दे इसका विशेष रूप से गिवेचन इस पुस्तक किया गया है |

इस पुस्तक का [वपय श्र्थशासत्र हे, कहानी नहीं तो भी इसके विपय प्रतिपादन में कद्दानीपन लाने को चेपष्या भ्रवश्य की गई दे | कह्दानी वा लक्ष्य है, आनन्द का उद्रक और चमत्कार की सुप्टि। इसके अनेक अध्यायों यद्द यात भा पाठकों को मिलेयां। अन्तर केवल इतना हे कि मेंने जो घटनाएँ चुनी हैं, वे एक तो कोरी कल्पना-अयृत नहीं है, दमारे आज के जीवन भचारों ओर व्याप्त हैं और सत्य हवा दं। केवल पानों के नाम बदल दिये गये हैं | दूसरे इसकी कद्दानियों का उद्देश्य कल की सब्टि

नहीं है, बरन्‌ अर्थशात्र के रिद्धान्तों, अगों और समस्यात्मक उलभनों का

448 का 5 5ारपावार गन + अड्डा धम का अथ मुद्रित रूप में नदी लिया गया है

(७)

समाधान है। इसलिए हम यह स्पीकार करते हैं कि इसकी कुछ कथाओं से पाठयों को यह आनन्द तो नहीं मिलेगा, जो किसी श्रेष्ठ कला पूर्ण कद्दानी में मिलता है। बात यद्द हे कि उद्देश्य हमारा यही रहा हे कि अर्भशात््र को ऐसे ढंग से उपस्थित किया जाय, जिससे वह परल से-सरल और रोचक जान पढ़े। अर्थशास्त्र के तिद्धास्तों को इस रूप में उपस्थित करने का दिन्दी में यइ पहला ही प्रयत्न है। अग्नरेनी मे भी शायद ऐसा प्रयत्न नहीं किया गया। में इस प्रदत्त में कहाँ तक सफल हुआ हूँ इसका निर्णय गे अपने पाठकों पर छोडता हूँ

/ कसी भी शास्त्र का पूरा वियेचन करना बहुत कठिन कार्य दे। मैने यो इसमें ध्र्थशास्त्र की रूप रेपा द्वी वतलागे का प्रयत्न किया दे इस पुस्तक को दो भागों में प्रकाशित कराने का भेरा विचार ऐ। इस भाग में उपभोग, उस्तत्ति, विनिमय और वितरण के सम्पन्ध में मैंने अपने विचार प्रवठ किये है। यदि दिन्दी ससार ने इस पुस्तक को पसद्‌ किया, तो दुसरे भाग में रुपपा-पैसा, करेंसी, बैंक, देशी और विदेशी व्यापार, राजस्व तथा साम्यवाद आदि विपयों पर में अपने विचार उपस्थित करूँगा |

इस पुस्तक के लिखने मे मुझे श्री महेशचन्द्र अग्रवाल, एम« ए०, बी० एसू ती० “विशारद! और ओीयुत भीधर मिश्र वी० काम से सद्दायता मिली है। भारत विख्यात, हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कद्दानी-लेखक प० भगवती प्रसादजी वाजपेयी ने भेरे विचारों को कहानी अथवा कथोपकथन का रूप देने मे रद्घायता

दी है। इस कृपा के लिए मैं उपयुक्त तीमों सरजनो का शआाभारी हूँ

(८५८०)

प्रयाग विश्व विद्यालय + वाइस चैंतलर पड़ित अमरनाथज्ौ भा एम० ए०, प्फ० आर» एसू० ने इस पुस्तक की भूमि लिसकर मुझे प्रोप्तादित ड्िया « है। इस असीम हवा के लिए मैं उनका यहुत इतज हूँ

नारायण प्रेस के अध्यक्ष श्रीयुत गयाप्रसादजी तिवारी वी० काम? ने इस पुस्तक को शीघ्र छुप देने में जो तलरता दिफनाई है उसके लिए मैं उनकी धन्यवाद देता हैँ।

यदि इस पुस्तक के द्वारा मैं भारत की साधारण जनता को--और पिशेषस्र विद्यार्थियों को -अर्थशास्त्र रे दिद्वान्यों को तमभाने में कुछ भी सद्दायक दो

सत्र तो मैं श्रपने प्रन्‍लों को सफल उमभूँगा

श्री दुवे निवास, दारागज, प्रयाग दध्ाशैकर > द्‌्‌ वा 9] कार १७ अगस्त, १९४० की 2222 की: / का श्रावण शुत्ध पौर्िमा, सवत्‌ १९९७ | अर्वशास्र अध्यापक, अयाग विश्वविद्यालय

विषय-सूची

नरक

पहला खएड-प्रारं भिक

पहला श्रध्याय--अ्ृशासत्र कया है! ०.८ #.,

दूसरा अध्याय--श्र्थ या घन क्या है १६८ ...

तीसरा अध्याय--ऑर्शा्र के विभाग और उनका पारस्परिक सम्पन्‍्प चौथा अध्याय--अधशाज़ का महत्व हि हा रे पाँचवाँ अ्रध्याय-अशास का अन्य विद्याओ्रों से सम्बन्ध ५८..

सरा खएइ-उपभोग छठ्याँ अध्याव--आाए्रंहई- इच्छाएँ, ४४ ... शा सांत्षाँ लक 2 श्रौर छत्तोप ... आठवाँ अध्योग- गा -उपयोगिता-हा पनियम ४८ सर्बाँ अध्याय--सर्मे-सी मात-उपयोगिता नियम . ..” दसवाँ अध्याय--माँग का नियम 2 भ्यारदर्वाँ अध्याय--उपभोछा की बचत चारदहवाँ अध्याय--उपभोग की वस्ठुओं का विभाग तेरदर्वाँ अध्याय--माग कौ लोच चौदहवाँ अध्याय--फिज्लप़र्ची ४०४ पर्द्रह्॒वाँ अध्याय--मादक वस्लु्चों का निषेष ..., ब्रे

ब्न्* $००

पृष्ठ प्ृझया

श्१ १९ शद श्प

१०३

( १० )

सोलहवाँ अध्याय--उपमोग में सरकार के श्रन्य इत्तच्षेष. ... १०८

सत्नहवाँ अध्याय--बरबादी ५३, *७)5 "हैंड अठारदयाँ अध्याय--भविष्य का उपभोग और बचत न. ११६ उन्नीसर्वाँ अध्याय--दान-्धर्म हर बल. १२६ घीसवॉँ अव्याय--उपभोग का आदर्श कि बन ३१

तीसरा खणइ-उत्पत्ति

इफ़्फ्रीसर्वाँ अ्ध्याय--उत्पत्ति के भेद पक ब०. रैशेण धाइसवाँ अध्याय-उसत्ति पे साधन”. ,.. या पका! तेइसवों श्रध्याय--भूमि और उसके लक्षय ... नल. १५१ घौबीसवाँ अध्याय--सेतों की चकबन्‍्दी..,.. जन. १६० पश्चीस्वाँ अध्याय-श्रम के मेद और गुय ४... १६४ छुब्बीसवाँ अ्रध्याय--जन-सख्या बद्धि मन जन. १७१ सत्ताइसबाँ अध्याय--शभ्रम की कुशलता... मी अट्वाइसवाँ अध्याय--भ्रम विभाग ०... १८९ उन्तीसर्वा अ्ध्याय--पूँजी के भेद डक ०». १९८5 तीसर्वाँ अध्याय--पूँजी की गदि ग्रे न. २०६ इकतीसवाँ अध्याय--प्रवन्ध के न... श१७४ बत्तीसवाँ अध्याय--ठाइस ३३६ न. औशर तैंवीसवाँ अध्याय--उत्तत्ति के नियम न. ३३० चोंतीसर्वा अध्याय--घनोसत्ति के क्रम. ... ०» डेइे पैंदीसवाँ अध्याय--व्यपस्था के मेद मर 9 २४७ छत्तीसवाँ अध्याय--सरकार और उद्तत्ति ..,, जन. र१७

सैंवीसवाँ अध्याय--उत्नति का आदर्श...

( श१ )

चौथा खएडइ-विनिमय अद्तीसववाँ अध्याय- बस्तु-परिवततन हल रद उनृतालीसबाँ अध्याय-क्रय-विक्रय ल्‍न३ ज्छ चालीसब्वाँ अध्याय--बराज़ार इफतालीसवॉ अध्याय - वस्तुओं की क्ीमत-अ्ल्पक्ालीन बाज़ार में वयाल्ीसर्वाँ अध्याय--दखुथों की क़ीमत--दीर काल में तैंताबीसवाँ अध्याय--वस्तुओं की क्षीमत--थ्रति दौर्घकाल में . चैवालोीसवाँ अध्याय--थोक और फुटकर बिक्रो 57३] चैंतालीसर्वा अध्याय--वस्तुओं की कीमतों का पारस्परिक सम्बन्ध छियालीसवाँ श्रध्याय--वस्तुश्रों की क़मत--एकाधियार में सैताल्नीसवाँ अध्याय- एकाधिफार में प्रतिधर्दा ५५8 अ्रद्ृताल्लीसबाँ अध्याय--दूकानदारी हि उनचासवचाँ अध्याय--जुआ और सट्ट बाजी.... बे पचासवा अध्याय- क्य-विकय का आदर्श ... बन पाँचवाँ खण्ड-वितरण इक्यावनवाँ अध्याय- वितरण की समस्या «५ री

बावसरवाँ अध्याय--आर्थिक लगाव ५5 तिरपनवाँ अध्याय -जमीदारी प्रथा धर चावनवाँ अध्याय--किखनों का सद्दायक ज़मीदार थ्द पचपनर्चाँ ध्ध्याय--सूद॒का ठिद्धात डे छुप्पनर्याँ अध्याय--जनसाधारण का ऋण श्ध

सत्तायनवाँ अध्याय--दुष्ट मद्ाजन ग्र्र कर

अट्वाचन्वाँ अध्याय - मज़दूरी

२७६ श्प+ र्‌ ३०३ देह ३१९ ३२६ ज़हर ३४३ ३०४ ३६० ३६६ डे७३

रेफर रेप श्ष्८ ०५ ६454 ड१९ शर्ट

४३०

( १२ )

3 उनसठवाँ अध्याय--न्यूनतम मज़दूरो हा साठवाँ अध्याय-- इड़वाल और मज़्दूर-सभा ,.. इकसटठवाँ अध्याय--लाम बासठवाँ अध्याय--अत्यघिक लाम «्लर

तिरसठववाँ अध्याय--आधिक असमानता.._... चैसठव्वाँ अध्याय--असमानवा दूर करने के तरीके पैंसठ्ाँ अध्याय--वितरण का आदर्श रे पारिमापिक शब्दों की यची श्म शब्दामुक्रमणिका हक

ध्श्८

४५० ४४७ ४६१ ड६७

पहला अध्याय अर्थशास्त्र क्या है ?

भोहन रहता तो उन्नाव मे है, पर उसके चाचा प्रयाग में नौकर हैं, इस- जिए माघ के महीने में वह अपनी भा के साथ चाचा के यहा आया हुआ है | उसकी मा मघ भर त्रिवेयी रुगम में प्रतिदिन समान करेगी गत रविवार को मोदन भी अपने चाचा के साथ त्रिवेशी स्नान करने तथा वहा लगे हुए माघ मेला को देसने के लिए. गया था

मेले के पास पहुँचने पर पहले मोहन को कृपि प्रदर्शनी दिखाई पड़ी उसने चाचा से कहा रि यह भी इसे देखेगा |

प्रदर्शिनी के पएडाल में जाने पर मोहन ने तरह-तरह की मशीने देखीं। चाचा ने उसे बताया कि ये सत्र खेती करने के काम आती हैँ | मोहन को कुए से पानी खींचनेवाली मशीन अधिक पसन्द आई। बहां की अन्य चरतुए. भी बह देखना चाहता था, पर चाचा ने कहा कि चलो, पहले गगा जी नहां आयें, फिर लौटते समय इन यब चीजों को अच्छी तरद देपना।

बाँध पर पहुँचते ही मोहन ने कई हलवाइयों की दूकाने' देखीं। सुबढ का समय था | वाज़ी ताज़ी जलेबी बनाई जा रद्दी थी | कुछ लोग दूकान के पास जलेदी सा रहे ये [

माघ का शुरू था | इसलिये अभी कुछ दुकानों पर माल नहों आया भा वे खाली पड़ी थीं। कुछ मज़दुर इधर उघर ज़मीन खोद रहे ये। मोहन

ई्‌ अर्थशासत्र की रूप रेखा

ने कद्दां--चाचा, यद्दा तो बढा मजा है। क्‍या यह सय्र यहा पर हर साल होता है ?

घाचा--हाँ, दर साल इसी तरह मजदूर टीन और लकड़ी को दूकाने बनाते और उजाडवदे हैं।

मोइन--तब तो बहुत लकड़ी और टीन ख़ब्च द्वोता होगा

घाचा--म्लर्च तो होता है। पर बडे बड़े ठेकेदार इन चीजों को मेला ज़तम द्वोने पर मोल ले लेते हैँ फिर साल मर बाद वे इनजी बेचते हूं

इसी समय एक ओर इल्ला सुनकर मोहन का ध्यान उधर चला गया। दो एक साधू कह रहे थे---चलो, चलो, आज एक भाग्यवान्‌ ने मुत्रद दी भडारा किया दे

मोदन--चाचा, यद भडारा क्‍या द्वोता है ?

चांचा--जब कोई आदमी पहुत से साधुओं को मोजन कराता है तो उनके खाने के लिए बडा प्रबन्ध करना पत्ता है | इसी यडी दावत को भडारा कहते हूँ | यद्दा पर ऐसे भडारे रोत ही हुआ करते हैं।

जाते करते करते दोनों सडक से दूर एकात स्थान पहुँच गये |

इतने में मोहन चिल्ला उठा--अभरे चाचा ! वह देसो | कुछ साधू ध्यान लगाये आस मूदे बैठे हैं |

चाचा--यद्दा एकांत मे ये लोग भगवान का ध्यान कर रहे | हम लोग सडक से दूर निफल आये हैं | सडक से चलना ठीक होगा |

थोड़ी देर में दोनों सटक पर पहुँच गये | वह्दा पर एक साधू को देखकर मोहन ने कद्वा--अरे, यद साधू तो उलगा लब्मा हुआ है ! नीचे आग जल रही है। क्‍यों चाचा, ये जलते नहीं होंगे ? थोरी देर में तो भुन जायँगे ! पर चाचा, यद क्या वात है ऊ्रि दचाना दूर रद्द, लोग तमाशा देफ रहे हूँ !

चाचा--पद्द पैता कमाने का ढद्न है | त॒म देखते हो न, साधू इधर से उधर भूल रद्दा है इस कारण उसे अग्नि की कुल नहीं लगती | हाँ, थोड़ी गरमी जरूर लगती द्वोगी। परन्दु आतनल तो ढ८ढ में यह अधिक खलती द्ोगी | हिर उसने इसका अभ्यास मी तो कर रक्सा है|

अर्थशास्त्र क्या है डर

मोहन--इससे तो अच्छा हो कि वह यों द्वी सागकर पैसे इकट्ठे कर ले | पर बह पैसों का करेगा क्‍या

चाचा--पह पैसों से भोजन वस््र आदि मोल लेगा तुम जानते ही हो कि दुनियाँ में सब काम इसीलिए किये जाते हूँ कि सुख प्राप्त ह। जीवन के सारे सुख आज पैसे पर ही निर्भर हैं

मोहन--झरे चाचा | शो चाचा | देखो, यह साधू तो कौलों पर बैठा है! इसके बदन में तो तमाम सून निकल शआ्राता द्वोगा ) इसे तो सिवाय तक- लीफ के और क्या आराम मिलता होगा

चाचा--यह वेण कमाने के लिए ही ऐसा घर रहा दे पसे से बद उन घस्तुओं को ग्रौदेगा जिनकी उसे आवश्यकता है। उन वरुुओं के उपयोग से उसे सुस मिलेगा | यदि अत में उसे सुख मिले, तो बैठने की कौन कहे यह कीलों फे पाउ भी जाय

मोहन ने चाचा की यातों पर ध्यान नहीं दिया। उसका ध्यान उस दुकान की वस्तुओं पर था जिएके बगल से वह और उसका चाचा गुजर रहे थे दूकान में तरह-तरह के छुपे बेल बूठेदार कपडे रखे थे यकायक मोहन की बजर एक मोर छाप शेंगोछे पर दक गई उसने चाचा से कहां कि बढ उसे मोल ले दें। इस पर चाचा ने दूकानदार से उस श्रेगो्लें का दाम पूछा

दुकानदार--एक दाम बता दे या मोल माप करोगे

चाचा--एक दाम बताइये |

दुकानदार ने ओंगोल्ले को उतारकर सोला और मोहन के चाचा को दिखाते हुए कहा--

देखिए, बडा मोटा है, सालों नहों फ्टेगा है तो अधिक दाम का, पर तमसे चार झने पेंसे ले लेंगे |

चाचा--चार भआने तो बहुत हैं, तीन आने में दो |

इतने म॑ माहन बोल उठा--और कया, चार पसे फा माल है।

दुकानदार --अरे वाया, साढे तीन आने की उरीद है। मथुरा से यहा आये। दूकान का कियया, कुछ सुनाफा-मनदूरी भी दो चाहिये मैंने आए से कोई ज्यादा नहीं कष्ठा | फिर सुबद-सुबह वोहनी के वक्त...)

अ्र्थशात्र की रूप रेखा

चाचा--भच्छा लो, साढे तीन थाने ले लेना। ख़रीदा तो ठुमने दो श्राने में होगा

दूकानदार--अ्रे बायू झाहय, भाव के भाव पर दे रहा हूँ। चलो, दम पन्‍्द्रह पैसे द्वी दे देना

चाचा--पन्द्रद वन्द्रद नहीं, देना हो वो चौदद पैणों में दे दीजिये | मुतद- सुबद्द खटसट अच्छी नहीं द्ोती

दूकानदार -क्या चताऊ ' अच्छा लाओ |

घाचा ने जेब से एक रुपया निकालकर दूकानदार के पास फंता बूकान दार ने रुपये को उठाकर उगलियों पर यजाया। फिर वह बुछ सोचते हुए बोला--

पैसे तो नहीं हैं सवेरे सवेरे आप के पास चौदह वैसे नहीं हैं ?

चाचा के इनकार करने पर दूकानदार ने अपने सन्दूक़ में पैसे ढूंढे | जय साढ़े बारह झआने नदीं निकले, तो दारफर दूसान के सामने तैठे भानवाले से उठ रुपये का भाज मांगा! उसने एक पाई रुपये वी मजाई ले ली। दूकानदार पाई कम साढ़े यार आने पैसे मोहन के चाचा को लौठाने लगा।

चांचा--पूरे साढे बारह पाने दीजिए |

दूकानदार--पाई तो भाज में चली गई !

घखाचा-तो मैं क्या करूँ ? आप ही ने तो भुनाया |

आख़िर दूकानदार ने यह कहते हुए कि “वाह साहब, अच्छी चपत लगी | मनाश तो कुछ मिला नहीं, पाई गाँठ से देनी पड़ी |? पूरे साढे वार्‌इ आने पैसे दे दिये। मोइन खडा-फंडा यह सत्र देख रहा था। जय चला तब पहले तो उसने अपने उस नये थ्ेंगोछे को कन्‍्घे पर रस लिया | फिर चाचा से कहने लगा--दूकानदार इस तरह वात करता है जैसे इस श्रेंगोडे के वेचने में उसे नुकसान ही हुआ हो

चाचि--भला नुकसान उढाने के लिए. कहीं कोई दुकान. करता, है |, यह तो सब्र कहने की वातें हैं|

अभी मोहन के चाचा पैसे जेब में डाल ही रहे थे कि एक पैसा चमक डठा। मोहन ने क्द्वा-देखें, जान पढ़ता है, नया पैसा है। चाचा ने

अर्थशाप््र क्या है ह॥

पैछा दे दिया | तब मोहन ने पूछा--क्यों चाचा, इस पैसे पर फिसकी तत्यौर बनी दे !

चाचा--यह तस्पीर हिन्दोस्तान के भये वादशाद छठे जाजं की है। बादशाह वा काराव़ाना ही इन पैसों को बनाता दे रेल, पुल सलक श्रादि का सारा इतज्ञाम भी सरकार ही करती हे इतज़ाम ररने में जो ग़र्च होता है वह सरकार जनता से कर ( टैक्स ) के रूप मे बदूल फरती है।

चाचा ने पूछा- अच्छा मोइन, बताओ तो अ्रग ठक इतने लोगों को बाम बरते देसकर ठुम क्‍या समझे क्‍या ठुम उता सफते दो कि वे क्‍यों काम करते है !

मोइन-रश्राप दी ने दो बताया कि सन कोई सुस्त ग्रात्त करने के लिए

काम करते हैं) दूकानदार कमा कमाकर नो जमा करेगा उससे वह और "जाके लबवे लडके सूत्र खेलेंगे, कृदेंगे ौर मौज उटवेंगे। पर चाचा, मेरी समक्क में यह्द नहीं क्राया कि उन साधू मदास्मान्रों वो आस मूँदकर बैठे रहने से क्‍या घुस मिलता है। वद जो आग के ऊपर उलटे भूल रहे ये, उनवा तो द्वाल ठीक है। इस तरह कुछ देर तकलीफ उठाने के बाद उनसे पास पैसे इकट्ठी हो जायेंगे भर तप्र थे उतरकर मजे से उन पैसों का भोचन पग्ररीद लेंगे। पर आँध मूँदकर ध्यान झगानेवाले साधुओं के श्रागे तो कोई पैसे भी नहीं डाल रह था !

चाचा--यहद्द तो ठीक हे लेकिन सुए देवल पैसों से ही नहींमलता | रिना पैसा प्र्च किये भी आनन्द सकता है। जैसे तुम जय हँस हँस कर अपने दोस्त मुन्मू से बाते करते हो, तो त॒म्हें खुशी होती है | या जैसे तुम्द्दारो माँ रोज यहाँ गगा जी मे स्नान करती हैं। खझ़र्च तो वे एक पैसा भी नहीं करती, पर इससे क्‍्या। इसी तरद उन साधू महात्माओं को आँख मूँदकर भगवान का ध्यान करने से कुछ सुप्त का अनुमव अवश्य होता द्योधा | जब तक तुम्हें भविष्य में सुस मिलने को आशा होगी तब तक तुम कोई दुस उठाने के लिये तैयार होगे इसीलिए कहा जाता है कि अत्येक व्यक्ति का दर एक प्रयक्ष सुस प्राप्ति के लिए ही होता है

अर्थशांत्र की स्प रेखा

मोइन--तव मुखग्राप्ति के दो तरीके हुए। एक तो पैसों द्वारा और

दूधरा बिना पैों द्वारा चाचा - दीक, पर पैसे स्वय तुम्हें सुख नहीं देते | पैसों द्वारा ठम-वे वल-उन _बस्टथ्ों को प्रीदते हो, जो तुम्हें सउ पहुँचाती हैं। श्रत, मुख के लिए. दम

अपने .प्रयक्षों-दारा-या-ठो-उन-बत्ठुओों-को-प्राम-करते हँ-जो-स़रीदी-जा

सफ़्ती हैं प्रभोत्‌ जो विनिमय खाध्य हैं और घन या सुपत्ति कहलाती हैं, या सा कार्य करते हैं जिचसे इमें श्र प्राप्त दोता दे

मोदन--तब फिर साधुओं का श्रौप मूँदकर ध्यान लगाना, माँ का गगा नद्दाना, भगवान की पूजा करना आ्रादि ऐसे कार्य हैँ जिनसे ऐसी कोई वस्ठु नहीं प्रास होती जो विनिमय-साध्य हो, परन्तु उनसे सुस्त की प्राप्ति अवश्य द्वोती है

चाचा--हाँ

घाट किनरे पहुँच जाने के कारण मोहन उसके चाचा नहाने के लिए उपयुक्त जगद्द दूढने लगे | एक घाटिया के पास अ्रपने कपड़े उतारकर रख दिये और दोनों ने जिवेणी स्नान किया स्नान प्यान करने के पश्चात्‌ दोनों ने चन्दन लगाया। चाचा ने घाटिया को दो वैसे दिये। फिर जय ये लोग लौट पडे तो कुछ दूर थाये वडकर मोइन बोल उठां-5

यह भी पैसा कमाने की रौति है। पैठ्रेजैेठे जरा सा चन्दन दे दिया। इसकी चौकी पर कपड़ा रख दिया | वस, कई पैसे मिल गये | क्‍यों चाचा, पड़ा जी तो इस तरद दिन भर में कई रुपये पैदा बर लेते होंगे

अरे चाचा ! यद देसो यह मिखमगा पहुँचा | यह तो विलकुल मुफ्त सोर है

जब दोनों ( चाचा भतीजे ) कुछ दूर चले आये, तव चाचा ने कद्दा -

अच्छा मोहन, ठुमने मुत्ह से तरह तरद के काम देखे और यह सममा कि इस सर अपने सुख के लिए. विनिमय-स्यध्य बस्ठुओं को प्राम करने का प्रयत्न करते हैं या ऐसे कार्य करते हैं, जिनसे सुस प्राप्त होता दै। अब में तुम्हें उस शास्त्र का नाम वताता हूँ तिसमें विनिमय-साध्य वस्तुओं का विवेचन किया जाता है |

अ्र्थशाल्त्र क्या है 8

मोहन--पर यह तो बताइए कि अशाम्र का अध्ययन किस तरद किया जाता है| मेरा मतलब * *|

चाचा--सुम्दारा मतलब शायद अथशासत्र के विभागों से है। सुनो, तुममे कृषि प्रदशिनी तरह-तरद की खेती करने की मशीने देसी थी। दे सब श्रम्ाज वी उत्पत्ति मदद करती हैं। अर्थशार्र के एक विभाग मं वस्तुओं की उत्तत्ति पर विचार किया जाता है। हसक्े अन्तर्गत हलवाई का

अन्‍मलपप-+ा

जलेबियाँ बनाना/ मजदूरों का दूफान तैयार करना आदि, सभी काय, जाते हूँ। अर्थशास्त्र के उपभोग विभाग म॑ मनुष्य के सान पान, रदन सहन, आदि बातो पर प्रिचार किया जाता है। तुमने जलेब्रियाँ साई था। नहां कर जब हम लौट रदे ये तो तुमने दसा था कि हलवाई की दूकान पर बैठे हुए. कई लोग कचौडी और पूरी खा रदे थे ) यह रुव उपभोग के कार्य हैं। इन कार्यों का ही विवेचन उपभोग विभाग जिया जाता है

पर जलेबी याने के पहले पैसे देकर लोग ने उन्हें मोल लिया दोगा मेने उस कपड़ेवाल्षे की दूकान से भाव ताव करके साढ़े तीन आने में श्रेंगोछ्ठा मोल लिया था। और देखो, दोनों ओर दूकानों पर माघ मेला यात्री तरह तरद की बल्लुएँ मोल ले रहे हैं। अथात्‌ अपने रुपये पैश्ञों का मित्र मिलन वस्तुओं से विनिमय कर रहे हैं। अत अथशाम्र का तीसरा विभाग विनिमय के नाम से पुकारा जाता है शा

मोहन--मजदूर भी तो अपनी महनत का विनिमय मजदूरी से करता है।

चाचा-होँ, तो बह भो एक प्रकार का विनिमय दी | परन्तु मजदूरी पर विचार करना वितरण विभाग का काम दे। मय

इक्कों का अडड़ा वौस आजाने के कारण मोदन के चाचा ने शदर जाने के लिए एक इक्फा क्या। प्र इक्फे पर से दाएँ हाथ के सेत मोहन को दिखाते हुए उन्होंने कहा--

देसो मोदम, थे हरे भरे खेत हैं | इनको जोतने बोनेवाला लगान देवा है। गाँव भे यह लगान जमीदार को दिया जाता दै। लगान भी वितरण का एक अग है। और हठुम्हे याद कि दूकानद्ार ने कहा था कि मुनाफे

की कौडी नहीं आई। वह मुनाक् इसीलिए माँगता था कि वह मथुरा जैसी

श० अर्थशात्र की रूप रेखा

जगह से उस ऑँग्रोडे को ख़रीदकर लाया था। इसके अलावा वूकान के प्रबन्ध में उसके जो पैसे ख़र्च होते हैं वे भी तो निकलने चाहिए ].इत सुनाफे और प्रवन्ध के व्यय पर भी * और प्रबन्ध के व्यय पर भी वितरण में ही विचार क्रिया जाता द्दे। इसी समय सके साली होने की वजद्द से पीछेवाला इक्का मोहन के इके की बराबरी ररने के इरादे से आगे वढ आया दोनों इक्फ़े साथ- साथ दौड़ने लगे दूसरे इकके में बैठे एक शब्जन से मोहन के चाचा ने 'जैरामः कट्टा तय उस सज्जन ने मोदन के चाचा से पूछा--कद्दिए, फिर आपके मितर ने कहाँ से क्ज लिया घाचा--बानु कैलाशचम्द्व जी के यहाँ से दिला दिया था। उन्होंने श्राठ आने सैऊड़ा सूद तै क्या है। तैज्ञ होने के कारण दूसरा इकफा मोहन के इक्क्े से आगे निकल गया। तय चाचा ने क्द्ा--नत॒म्दें मालूम नहीं है कि जब कोई कु्ज लेता है तो कर्ज पर [मिदागन हर मद्दीने जो रक्षम लेने का निश्चय करता है उसे सूद बहते हैं| उस दिन एक ठाहव ने कुछ रुपये उधार लिये हैं और यद्द तय क्रिया है फिसौ रुपये पीछे श्राठ आने मदीना सूद दिया ज्ञायगा। अतः खूद पूछी के ऊपर लिया जावा-है | यद्द भी प्ितरण में आता हे मोहन-्ी वितरण में लगान, मचदुरी, पद, सनाफ़ा समी पर विचार किया जाता है ! चाचा--दाँ, वितरण के अलावा अरथशात्र का एक और विभाग है जिसे ईजिस्वे के नाम से पुकारते हैं |“इसम बताया जाता है कि तरकार क्रिस प्रकार देश“का ख़र्च चलाती और क्सि तरद अपनी आमदनी प्राप्त करती है राजस्व को लेकर इस प्रकार श्र्थशासत्र के पाँच विमाग हो जाते हैं | अर्थात्‌ डतस्च्ति, उपमोग, विनिमय, वितरण और राजस्व | “शहर वहुँचकर इक्ता सन गया। उसके पंसे जुकाकर चाचा-मतीजे घर चले। रास्ते में चाचा ने क्द्या-देसो, श्राज्ञ मैंने त॒म्हें वातोंद्दी-बातों में अर्थशासत्र के बारे में इतना बता दिया) अत यदि मम चाद्योगे तो कसी अन्य मौके पर वुम्हें ्रथ या घन का मतलब तथा अर्थशात््र के विभागों के पारस्परिक सम्बन्धों को समझाऊँगा।

दूसरा अध्याय “अर्थ या घन क्‍या है ?

घर में माघ-मेले की बात हो रही थी बात करनेवाले थे मोहन, उसकी माँ और चाची चाची का कदना था फ्रि इस बार माघ-मेला अच्छा नहीं है। मोहन कहता था--वाद चाची, इतना बड़ा मेला लगा हुश्रा है तुमायश, तमाशा, कपडे और फिलौने की दूकानें, साधू-मद्दात्मा समी वो हैं। और क्या चादिए

मोहन की मा चुत थी; क्योंकि बढ कई साल वाद इस बार माघ नहाने आयी थी | चांचौ मोइन को समभाती हुई बोली-वू पारसाल तो आया नहीं था। ही तो तू भी कहता कि इस बार मेला आठ थाने भर भी हीं दे

इतने में मोहन के चाचा घर में आये। भोइम को चाची के उत्तर से सन्तोष नहीं हुआ था उपने अपने चाचा से उस बात की पुष्टि कराने की सोची | पर वात दी-बात में उसे अ्रशासत्र की याद गयी | तत्र उसने कद्या-चाचा जी, उस दिन आपने अयंशाल्न के बारे में कुछ और बताने को कहा था।

चाचा-दाँ, हाँ। अच्छा बताओ उस दिन ठुम 'अर्थ! के बारे में फ्या समझे थे |

मोदन--अर्थ के मतलय आपने शायद घन के बताये थे। तब तो घर, गाड्डी, घोड़ा, सोना, चौंदी श्रादि ससक्नी गथना धन के अनन्‍्तगंत की जा सकती है।

चाचा--दीक, इम लोग आमतौर पर घन से यद्दी समभते हैं। जव एम

है

श्र अर्थशास्त्र वी रुप रेपा

दो मनुष्यों की अमीरी का पता लगाना चाइते हैं तो इसी प्रकार की बलुश्नों की तुलना करके फैसला करते हैं यह तुलना रुपयों के जरिए होती है और अन्त में दम कददते हैं कि अमुक मनुष्य लगप्ती या करोडपति है। पर क्‍या त॒म बता सकते दो कि इन वस्तुओं की गयना धन या समत्ति में क्यों करते हैं ?

मोहन--शायद आपका मतलब यद्द है कि चूँकि हम इन वस्तुओं को अपने पास रखते हैं, इस लिए, आल्विरफ़ार इनकी गिनती समत्ति में द्ोती है |

चाचा--ऐशा क्ट्दा तो जा सकता है | पर दर-असल सम्पत्ति के दो मुख्य गुण माने गये हैं |४६यम यह कि सम्पत्ति द्वारा न्य्ियों की आवश्यकत्म्यों की पूर्सि होती है। द्वितीय उपत्ति कहलानेवाली वस्तु विनिमय-साथ्य होती

(22 ५0300 228 440 700 2 हस्त

है, अर्थात्‌ उसके उदले में शरन्य आवश्यर बस्तुर्ऐे यात हो सकती हैं।

मोदन--8| तो ईश्वरीय देन की वस्त॒ुएँ--जैमे इवा, पानी, लोहा, कोयला आदि समत्ति नहीं कद्दी जा सत्ती। और चाचा जी आपने कद्घा कि ससत्ति आवश्यकताओं की पूचि करती है। पर थआावश्यम्ता पूर्ति क्रनेवाली वस्दुओं को इम उपयोगी तथा सुस्दायी भी बहते हैं | मेरा मतलय यद्द है कि सुख- दायी बस्तु उसी पदार्थ को कहते हैँ जो हमारी आवश्यकता की पूत्ति करता है। चूँकि मित्रता, प्रेम, अच्छा स्वास्थ्य आदि भी मुसदायी द्वोते हैं। इस लिए ये भी उमत्ति हैं

चाचा--तुम्दारा यद समझना ठीक नहीं है पर इस यात को पूरी तौर पर समभाने के लिए मैं ठुम्हें पइले वस्त॒श्रों के परे में ज्ञान कराऊँगा। बात यद्द है कि अर्थशात्री आवश्यक्ता पू्ति करने के साधन को वस्तु के नाम से पुकारता है। इन वस्तुओं का कई प्रकार से वर्गीफ़रण जिया जा सकता दे |

उदादरणार्थ इम वस्तुओं को मौतिक तथा अमौतिफ इन दो, समूहों में विमाजित कर सस्ते हैं | भौतिक वस्तुएँ वे हैं निनको हम देख सकते हैं, दाथ से छ्‌ सफते हैं या जिनको तौलने पर बलन निकलता दै--जैसें पानी, इवा, मिटद्दी, गेहूं, कपच्ाय, गाय, बैल, रुपया-वैसा इत्यादि | अमौतिक वस्त॒ँ वे हें जिनको हम देख नहीं सफ़्ते, द्वाथ से छू नहीं सकते, था बिना वज्ञत !

अर्थ या धम क्या हे ? १३

नहीं होता जैसे-स्वास्थ्य, प्रेम, ईमानदारी, किसी दूकान कौ प्रसिद्धि, पंडों की यजमानी इत्यादि |

इम वस्तुओं को बाह्य तथा आन्तरिक समूहों में मी बाँद सकते है) बाह्य यस्तुओ्ों में उन पदार्थों की गणना की जाती हे जो मनुष्य के मौतर नहीं हैं। उनका सम्बन्ध मनुण्य की भीतरी बातों से नहीं रहता। शतेः खनिज- पदार्थ, बायु, ग्रकराश, नदी, नाले, खेत, क्ारशाने, रेल, तार, भोजन, वस्त पेटेन्ट दवाइयाँ, कापीराइट, डाक्टर, पुलिस आदि की सेवाए, दूकानों तथा कारग़ानों की 'प्रसिद्रिः--ये सब्र वाह्म वस्तुएं कही जायेंगी

मोहन--और शआस्तरिक वस्तुएँ वे हें जिनका मनुष्य की भीतरी बातों से सम्बन्ध है

चाचा- हाँ, स्वास्थ्य, कला, ज्ञान, दया, आनन्द प्रास करने की शक्ति, किसी पेशे में प्रयीणता; इन सग्कों हम आन्तरिर बस्तु कहते हैं। अच्छा मोहन, तुमने वस्तुओं का दो प्रकार डा बगोंक्रण जान लिया। एक तो मौतिक और अभौतिक, दूसरा वाह्य और आन्तरिक। अप इस दोनों को मिलाफर हम चार भागों में ब्राँट सऊते हैं | क्‍या तुम बता सत्रते हो ऊक्रिये चार विभाग कौन कौन से हैं

मोइन--ठीक तो है पहले वस्तुओं को भौतिक 'अभौतिक समूह में बाटा पिर प्रत्येक को वाह्य और आत्तरिक समूह में बाट दिया | इस तरह चार विभाग हो गये |

चाचा--पर क्या तुम भौतिक-आन्तरिक वस्तु का उदाहरण दे सफते हो !

मोहन-+हा-दा, जैसे प्रसिद्धि।

जाच[- प्रलत | प्रसिद्धि तो अमीतिक वाद्य वस्तु है ) किलो दूकान की प्रसिद्धि से तुम्दारा मदलब दुकान के उस “नाम? से रहता है जिसके कारण उस के मालिकों के रहने पर भी तुम उछी दूकान से माल प्लरीदते हो इस प्रसिद्ध को मत॒ुष्य स्वयं उत्मम्न करता है| इसको ठम छू नहीं समझते और इसऊा कुल्ल चजन ही हो सकता है। इसलिए यह अमौतिक है। पिर इसका सम्बन्ध मनुष्य को भीतरी बातों से तो रहता नहीं, वरन यह तो

ड़ अर्थैशासत्र की रूप रेखा

अच्छे प्रबन्ध, उत्तम माल के कारण, अन्य मनुष्यों की सद्दायता का फ्ल है। शअ्रत यह वाह्य कदलाएगी। हे मोहन--तय प्रसिद्धि श्रमौतिक-वाह्य वस्तु है पर भौतिक-आन्तरिक वस्तु का उदाहरण क्या द्वोगा ! चाचा ुम मनुष्य के शरीर या मस्तिष्क को शायद भौतिक आन्तरिक वस्तु कद सकते हो अन्यथा समी भौतिक वस्ठ॒ए वाह्म होती हैं ।ह मोहन- क्यों चाचा, इन विभागों के अलावा भी और किसी रीति से वस्तुओं का प्रिभाजन जिया जाता है। घाचा - एक और वर्गीकरण है जिसे जानना आवश्यक है। वस्तुओं को विनिमय विनिमय साध्य और अविनिमय साथ अविनिमय साध्य _कुरवे भी वाय्ाजा सकता है। वे बस्तुएँ प्रिनिमय साध्य कद्दी जाती हैं जो दूसरे को दी जा सकती हैं। नदी, नाले, सठक, रेल, भोतन, वस्त, पेटेन्ट दवाइयाँ, कम्पनी के हिस्से, नौकरों तथा श्रमजीवियों की सेवाएँ सभी विनिमय-साध्य हैं भ्र्यात्‌ सभी दूसरों को दी जा सकती हैं। पर माघ मेले में तुम्हें जो शानन्द आया या बह-.अविन्तिसय- साध्य था। उसे तुम जिसी दूसरे को नहीं दे सकते। मोदन--तग्र किसी मनुष्य का स्वास्थ्य, किसी दूकान की प्रसिद्धि, किसो स्थान की जलवायु--ये भी अग्िनिमय साध्य होंगी चाचा- मनुष्य का स्वास्थ्य भर जलवायु तो विनिमय साध्य नहीं हैं, परन्तु दूकान की प्रतिद्धि विन्िमय-स्यध्य है। उसे दृकानदार किसी दूसरे आदमी को वैंच सकता है | अब वताओ, वस्तुएं कितने विभागों में बेंट सकती हें। मोहन--चार विभाग तो आपने अभी अमी वताये ही हैं (तो मौतिक- बाह्य, दूसरा भौतिक आन्तरिक, तीउस अमौतिक्-बाह्य और चौथा अमौतिक आस्तरिक | हर एक को विनिमय साध्य अविनिमय साध्य भागों में बाट दिया तो आठ भाग दो यये | चांचा--ठीक है, परन्तु तुमको इस वर्गोक्रण में एक बात का ध्यान रखना चाहिये। जो वस्तु आन्तरिक है वह चादे भौतिक हो, चादे अमौतिक, वह विनिमय साध्य नहीं हो सकक्‍ती। आन्तरिक डोने के कारण उसके बदले

अथ या घन क्या है श्पू

में दूसरी बर्तु नहीं प्रास द्वो सकती इसलिए तर में मौतिक-आस्तरिक | _विनिमय-साध्य और अभौतिक श्रास्तरिक-विनिमय साथ्य वस्तुए हो ही नहीं सकतीं. कवर बताये हुए. वर्गीकरण में केवल दो भाग ही ऐसे रह जाते हैं जो विनिमय साध्य हैं. और गिनका विचार हमकों करना चाहिये। अब मोहन, ज़रा यह बतलाओ कि वे दो यर्ग कौन से हैं ९. मोहम--मेरी समझ में वे वर्ग हैं भौतिक वाह्य-विनिमय साध्य तथा अमी- विक-वाह्य-विनिमय-साध्य चाचा--अच्छा, श्रव ज़रा अमौतिक वाह्य विनिमय साध्य वस्तुओं के उदाहरण दो। मोदन--दूकान की प्रणिद्धि, यजमानी, कारीगरी चाचा - दो उदाहरण तो तुमने ठीक दिये परन्तु कारीगरी का उदाहरण गलत दिया। कारीगरी तो बदले में दी हो नहीं जा सकती | दाँ, उस की सहायता से जो काम किया जाता दै उसके बदले में पैसा अवश्य मिलता है | श्सलिए सेवा विनिमर्गहाप्य बरतु है कि कारीगरी | दूसरों बात यह है के फारीगरी अतौतिक अवरप है, परन्तु वह आनन्‍्तरिक है, बाह् नहीं | अब भौतिक-वाह्य अविनि>य-साध्य वस्तुओं के उदादस्ण दो ।_ मोहन--हवा, पानी, बरसात, नदी इत्यादि ये वस्तुएं प्रायः ऐसी हैं जो हमको प्रकृति से प्रचुर परिमाण मे प्राप्त होती हूँ, इसलिए ये उपयोगी होने पर भी विनिमय साध्य नहीं है लि चाचा--तुर्द्वार कहना विलकुल ठीक दै परन्तु कभी कभी ये श्यविनिमय- साथ्य वस्‍्तुए' भी विशेष दशाओं में विनिमय साध्य हो जाती हैं | साधारणतः हया और पानी इतनी अपरिमित मात्रा में पाये जाते हैं कि उनका विनिमय नहीं दोवा ।_पर रेगिस्तानों में पानी ब्रिकता है। इसी प्रकार कोयले श्ादि की खानों में हुवा परिमित परिमाण_ मे रहो है। और तव रसझो गरत करने के लिए रुपया ज़र्च करना पड़ता है उप्त दशा मे वह प्रिनिमय साध्य होती | है। 'निसय साध्य वस्तुओं को ही, चादे वे भौतिक हो या अमौति साध्य बस्व॒ुओं को ही, चाहे वे भौतिक हों था अमौतिक, हम _ इव या अर्थ कहते हूँ। | इधलिए इस विशेष दशा में हवा और पानी भी घन माना जा सकता है|

4६ « अर्थशास्त्र कौ रूपरेखा

मौहन--क्या धन हमेशा मेहनत से ही प्राप्त होता है ! चाचा--हा, बिना श्रम के धन प्रात नहीं दो सकता | किसी बस्तु का_ विनिमय-साध्य होने के लिए यह आवश्यक है कि उसक्रो प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति ने श्रस अवश्य किया हो | हा, यद्द हो सकता है कि जिय मनुष्य के अधिकार में वह वस्तु हो, उसने स्वय उसे प्राप्त करने के लिए. श्रम किया हो | , हर मोइन- क्यों चाचा, माघ-मेला जिस जगह लगा था वह जगह सरकारी घन या सम्पत्ति कह्दी जाती है चाचा- दवा, वह जगह सरकारी कही जाती है | दर-अउल धन या ससत्ति _को दम वैयरकिक,.सामाजिक राष्ट्रीय भागों मे औ.जॉद पक है। बैयक्तिक सम्पत्ति मे आनेवाली वस्ठ॒ुः वाह्य द्ोती हैं कोई भी आदमी अपने घन का दिसाव लगाते समय आन्तरिक वस्तुओं को, जैसे--स्वाथ्य, हुनर, आदि को, नहीं गिनता और यदद ठोक भा है | वेवल वाद्य बस्तुए ही बैव- क्तिक सम्पत्ति में सझती है | मोहन --तव हु॥र की गिनती कहाँ की जायगी ! चाचा- इसकी गणना सामाजिक सम्पत्ति में की जायगी |तमाम बैयक्तिक संपत्ति भी सामाजिक सर्म्पचि के अतर्गद जाती दै। इसके श्रलावा नाना प्रकार के ऐसे मकान बागजर्गौचे जो क्रिछी त्ा8 व्यक्ति के अधिकार में नहीं हूं, सामाजिक रुखत्ति में सत्ते हैं) पर सामाजिक सम्पत्ति इतना महत्व नहीं रखती, जितना राष्ट्रीय संपत्ति | तुम देखते द्वो।कि सरकार ने एक शदर से दूसरे शहर में जाने के लिए सड़के' बनवा दी हैं | जगह-जगद नदियों पर पुल बने हुए; हैं। इन सब के बनाने में करोड़ों रुपये ख़र्च हो गये हैं। इन्हें तुम तो सम्पत्ति मानते हो, पर कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि यइ मेरी रुम्यति हे। केवल धरवार या शब्द ही उसे अपनी बता समता है | इसी प्रकार सार्वजनिक स्कूल, अस्ववाल, अजा- यबघर, डाक, वार, रेल, नदी, नहर आदि सभी राष्ट्रीय सम्पत्ति क्हलाते हूँ | मोहन--कोई मनुष्य अपनी समत्ति का ब्यौसा ते आातानी से बना लेता है, पर राष्ट्र को सम्पत्ति का ब्यौरा बदाना बड़ा कठिन होता होगा।

अर्थ या घन कया है ? श्७

चाचा--हां, मान लो, उुम्हें अपगे भारत की राष्ट्रीय उत्ति निकालना है ऐसी दशा में पहले नुम वैयक्तिक तथा सामाजिक समत्ति दी गणना करोगे। उसके बांद भारत सरकार की समत्ति की, प्रान्तीय सरकारों कौ, डिस्ट्रिक्ट तथा म्युनिसिपल वोडों कौ। यहाँ तक कि आम पचायतों की रुम्पत्ति की भी गणना करनी होगी। प्रास्वीय सरकार कौ सम्गत्ि मे सडक और नदियों के पुल आदि जायेंगे, इनमे आन्तीय सरकार की इमारतों की गणना आदि भी हो जायगी। म्युनिस्िपिलटियों की सम्पत्ति उनके लेम्प, नाले, पाइप, आदि की गिनती हो जायगी ) लोकल पथ डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के स्कूल तथा दवापाने शादि भी नहीं छूटेंगें। ग्राम प्मयतों के कुए, तालाब आदि के अलावा अन्य सध्याओं -भेसे क्ौपधालय मन्दिर, मसजिंद, सर्वशाधारण के स्वूल आदि को रुम्पत्ति भी गनी जायगी | मोहन--सब्‌ शामिल हौ-शामिल करना है या कुछ निकालना भी चाचा--नहीं, इसमे से बह रकम घठा देनी पडेगी जो, भारतवर्ष गे, अन्य देशो की लगी हुई है। अर्थात्‌ जो दूसरों को देनी है मोहन--दूसरे देशों की सम्पत्ति यहाँ कैसे आयी ? चाचा-दूसरे देश के बडे बडे पूँजीपतियो ने आकर अपने घन से यहाँ कारबार ऐला रखा है | फिर विदेशियों ने तुम्हारे यहाँ चलनेवाली कम्पनियों के दिस्‍्रो सरीद रखे हैं इसी प्रकार दूसरे देशों की सम्पत्ति यहाँ यगी हे | मोहन--तब यहाँ की भी सथत्ति दूसरे देशों मे लगी होगी। उसे भी जोडना पडेगा | चाचा--ओऔर क्या। मोहन--पर इसी ग्रकार क्या अस्तर्राष्ट्रीय सम्पत्ति नहीं हो सकती मेरी ज्मफा ने'ज़ोउमुप्रज्पाप्उमुप््ती उष्दर्पा रेजी यप्छुए हैं (मा पर फोए सर! अपरता अधिफार नहीं बतला सकता ! इन्हें यदि अन्तर्राष्ट्रीय कह्य जाय तो क्‍या बुराई दै ! चाचा--बुरणई तो कोई नहों है, पर अस्‍्तर्ाष्ट्रीय सम्पत्ति में क्या चीज नहीं

जायगी ? इस पृथ्वी तथा इसके सब विनिमय साध्य पदार्थों की गणना

श्प अर्थशास्त्र की रूप रेखा

अन्तर्रा्रीय सम्पत्ति में करनी पड़ेगी | अच्छा, अब यह तो बताओ कि सम्पत्ति के बारे में तुम क्या जान गये

मोइन- सम्पत्ति म॒ वे वस्तुएं गिनी