पञ्जाबी-संस्कत ठाब्दकोठा ?॥॥388|-589प॥झा 50538 87

अधान सम्पादक

हॉ० गयाचरण त्रिपाटी

है. प्रमायस फ्ँ दा + साधुशव तह»? 74000 258 सम्पादक डॉ० शिवकुमार मिश्र प्रवाचक ढ्ों० आजाद मिश्र डॉ० शैलकुमारी मिश्र प्रवाचक प्रवक्ता

छघल्दशस्वर आजाद पार्क, त्नाहालाद-२१00%१

प्रकाशक

हॉ० गयाच रण जिपादी

प्राचार्य

गछ्ानाथ का केन्द्रीय संस्कृत घिच्यापीढ चन्द्रशेधर आजाद पार्क

इलाहा बाद-२११४०२

(6) राष्ट्रिय संस्कृत' सं स्थान, नई दिल्‍ली

मुल्य

मुब्रक...] शाकुम्त॒ण मुदणासंय ३४, बलरामपुर हाउस इलाहाबाद ;

पशमश्शयाला

रख» साधुराम भारती, कश्सेतः प्रौ० प्रीतम लिह, अमृतसर; ग्रो० हरभजन सिद्ध, दिल्‍ली डाए भोग प्रकाश वरसिप्ठ, अण्डीगढ़, डाक अजमेर सिह, चग्डीगढ़ स्व० महावीरप्रसाव लखबेड़ा, इलाहाआाद

नई: जज खुद

प्रधाम सम्पादक जछकपए० बाश्याच्यरण खिप्याली

शुक्य सम्पादक

हा? शिवक्रुमार मिश्र

कु

सह सब्भादाक हा० आजाद मिस्र डा० शैलकुमारी मिश्र

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पंजाबी-संस्कृत-दाब्दकोठा भूमिका

!. संकलपना ((+077229)

रुदीर्धकास तक पराधीनता के कारण मुस्लिम शासन-काल में फारसी तथा ब्रिटिश-काल में भंग्रेजणी का वर्भस्द स्थापित होने पर संस्कृत शने: शगी:ः सरकारी एवं लोक-व्यवद्वार-फ्षेत्र से दूर होती बली गयी | तब हु स्वैरिछिक्त रूप से राजाओं, जमींदारों तथा मन्दिर-मठों के दास स्थापित संस्कृत- विद्यालयों में तथा व्यावप्ामिक हृष्टि से आयुर्वेद, चिकित्सा, ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड में जीवित रही। इस समय तक भाश के रूप में उसका अभाव कर्मकाण्ड, चारों धाम एवं सप्त ती्थों तक सीमित रह गया, जहाँ से हसने भारत की समस्कृतिक एवतसा को सुरक्षित रखा

स्वातंक्योतर काम में सेल्कृत के प्रति सोक में परस्पर दो विरोधी घारणाएँ फैलीं। कुछ अस- दक्षिण घोग 'पंरहात भाषा जटिल है, “संस्कृत धामिक भाषा है”, "संस्कृत समुदाय-विशेष की भाषा है, 'फंल्कृत मुंत जाया है” आददि-आदि कटूक्तियों द्वारा संस्कृत पर क्षमवरत अहार करने लगे दूसरी ओर संस्कृत परद्मयति जनता के भाषिक जगत से हर चली गयी, तथापि इसके प्रति ज्ोगों की श्रद्धा एवं आत्या से फ़ास नहीं हुआ भारतीय संस्कृति एवं विद्याओं में आस्या रखते बाले और अनेक श्रकार से संस्कृत के भहत्त को समझने वाले अब भी संस्कृत के अध्ययव-अध्यापन में निःस्थार्थ भावः से लगे रहे संस्कृत के छास का एक कारण आधुनिक शिक्षा-पद्धति का बहु-आयामी होना भी रहा! है। इस काज्ष में झाभनील में विध्कोट के कारण छात्रों पर अनेक विषयों का बोझ सलदता गया भाषा के रूप में संस्कृत की अपेक्षा हिन्दी एवं अंग्रेजी का वर्चस्व होगे के कारण भी संस्कृत के प्रति लॉकरुचि कम हुईं। उधर पाठशाजाओं में पंस्कृत के साथ अनेक अध्ुनिक विषय पढ़ाये जाने के कारण संस्कृत के यहुत अध्ययन की परिषादी बरमरा गयी सरकारी शिक्षा-नीति के निरस्तर परिवर्ततशील होने के कारण संस्कृत-शिक्षा' घौरादे १९ था खड़ी हुई विभाषान्यूक के आने से विद्यालयों में संस्कृताध्यवन के अवधर क्षीण हो गये अनेक प्रवेशों मैं क्षेत्रीय प्राथा [ कद आदि ), हिची तथा अंग्रेजी का पठत-माठन होने ज्गा। कहीं-कहीं तो कैश दो ही भापाने पढ़कर छान छट्टी पाते सगे; भेसे तमिलनाडु में तमिल एवं अंग्रेजी भोर उत्तर-

प्रयेश में हिएदी एवं #प्रेजी !

दे भूमिका

इस स्थिति में पारम्परिक शैली पे संस्कृत-शिक्षण व्यर्थ सिद्ध ही गया। परिणासतः संस्कृत "जिया यूतओ की संस्कृत -भाषा का ज्ञान अत्प समय में किस विधि से दिया जाय, प्रारम्भिक स्तर पर किस प्रकार की शीक्षय सामग्री दी जाय, इत्यादि ज्वलस्त प्रश्न हमारे समदा उठ बड़े हुए संस्कत-गिक्षण के सरली- करण तथा आधुनिकोकरण का श्रीन्गणेश यहीं से प्रारम्भ होता है |

आधुत्तिक विधाजयों एवं पारस्परिक पराठशालाओों भें मंस्कृत-मब्येताओं के अतिरिश्त भी संस्कृत-भाषा के शिकिक्षुओं एवं जिशासुओं के अनेक स्तर होने के कारण संस्कुल-शिक्षण की संरशनभ विधि की शावश्यकता अनुभूत हुई। सरकारी सेवा-नियुतत कुछ ऐसे उत्साही शिक्षित शोग है, जो बपते अध्ययतत-कास में तो संस्फृत-शिक्षा से वंचित रह गये, कितु अब सेस्कत के ससिकतिक एव. शाश्यंत मुन्ध की जानते के पश्चात्‌ भोसिक रूप से संस्कृत पढ़ना चाहते हैं हुछ ऐसे विदेशी! मापाकित है जो सैधार की अत्यक्त प्राचीन प्राषाओं में अस्यत्तम संस्कृत के शान-विज्ञान को अधुद्ध राशि को मूंथ कम से जानना चाहते हैं कुछ ऐसे भी हैँ जो केवल रामायण, महाभादत, गीता अथबथा कालिदस के साहिव का हो अवग्राहुत करव! घाहूते हैं। विभिन्न शिक्षास्तर एवं विभिन्न भावानभावी पदक में जाने के कारण इस समस्त संस्कत-शान-पिपासुओं को परम्परा-प्राप्ततयणाली से संस्कृत सिखाना तमबहाध्य, अयपश्ताप्म एवं द्रभ्यसाध्य होगा इनके लिये संस्कृत-शिक्षण की विधियों में रहता के उगाय हुँइने हि, जिसले अत्य समय में जिश्ञासु संस्कृत की अमुल्य राशि का ज्ञान प्राप्त कर सके

एक बाते और ह्विदी-ओपान्येसी को जिस एजति से संरक्त विलालानी घायेगी, हक उसी पद्धति से प्रेंच भाषा-भाएी दो संस्कृत नहीं सिश्रणाई जा सकती संस्युत-भिक्षतर में एक मलवाशम भाषए- भाषी जिन आवश्यकताओं का आसुध्य करेगा, ठीक उस्हीं भायश्यकताओं का भवुभव पंजाबी भावा-भामी भी करे, झावश्यक नहीं। भावगषकताएं एवं जपेकाएँ बदल जाते पर दिप़ि एव गैदय सामग्री मी अदल जायभी इब्द-भपड़ार बर्दलेगे, वाधय-संरववाएँ बदसेंगी, व्याकरम-मुशक जिशासाए अंदस जागेंगी अतदुब आब- श्यकता हैं, विभिन्न भाषा-भाषियी के किये उनकी साॉँग एव अपेक्षादं के समसार पाशयक्रव एुर्व शैदथ सामग्री का निर्माण करके उल्हें संस्कृत विखलाने की

किसी भी भाषा के शिक्षण में दो अमुछे अतिवत्थक तर्व होते हँ--व्यांकरल हर्व क्षन्दान बसी संस्कृत में ये वोनों ही तत्व अध्य जाषाओं की तुशमा में अधिक अध्नि हैं संह्कृत में धपतर्भ, प्रत्यंप, संगत जादि के हर दंत झब्द के क्षमानास्तर जनेक शब्द गढ़ने की सपृभ्नुत पोमता है) शिशिक्ष समादान्तर एवं पर्याययानी शब्दी के अर्य में अफी को विस देश कर बढशा शाता है ! कहदी के धय एवं उसके लिज की समस्यों कुछ कम कठित महीं है। यह तब्य है कि संस्कृत (ग्रेजिक तब! शोीकिक! अधिकांश भोधुनिक भारतीय भापान्रीं की बनती तथा आर्वेतर भारतीय भाषाओं की संपोधिका हैं। अतपृद्र संस्कृत से विकसित होने के काएए इन आधुनिक भारतीय भाषाओं में सस्ट्द के द्रव: अध्यी प्रतिशत शब्द सेन, पढने एंव व्यवहार में वित्म प्रयुक्त होते हैं। यदि आाधुतिक भारतीय भावाओं में मे अंल्टूत- गूसक एवं समामार्थक शब्दों का चयत करके उसके आधार पर इम्मात में प्रान्तीस तथा राज्िद पाउयकष

अमका ४]

ध्अ्ञ

तथा बीक्ष्य सामग्री का सिर्माण किया जाय तो कम-से-कम शब्दावली की समस्या का समाधान अवश्य हो जायगा इससे सस्कृत का शिक्षण विश्चित रूप से सरल होगा और स्वल्प काल भे ही सस्कत शिक्षण के अधिसख्य उद्देश्य पूरे हो सकगे इसी पृष्ठभूमि मे प्रस्तुत शब्द-कोश का जन्म हुआ है !

मह कार्य सर्द प्रथम पंजावी-भाषा से आरंभ किया गया है। पंजाबी-भाषा से योजनारंभ के पीछे अन्य भाषाओं के अ्रति हमारा अनादरभाव नहीं है। सभ्ो भाषाएँ महान हैं। परततु, कही से तो प्रारंभ करना ही था। पंजाब बेदों की भूमि रहा है। भाषा-विकास की दृष्टि से पंजाबी सस्कृत से अधिक निकट है। अतएुव यहीं से कार्यारंध की संगति भी बैठती है। प्रस्तुत शब्द-कोश मे अति प्रचलित शब्दों को छाँटकर उसके: आधार पर पंजाबी भाषा-भाषी क्षेत्ष के लिग्रे यदि संस्कृत में पाख्यक्रम एवं शेक्य सामग्री का सिर्माण किया जाय, तो संस्कृत-शिक्षण अवश्य ही प्रभावी तथा सरल हो सकेगा शब्दावली की जदिलता के समाप्त हो जाने पर शिक्षिक्षुओं के समक्ष अब केवल व्याक्रण- संबंधी समस्या ही शेष रहेगी भारत की अन्य शाषाओं में यदि इस प्रकार की संस्कत-मूलक एंवं समातार्थक शंख्दाकल्ियों का खयत किया जाय और फिर, उन बयनित शब्दावलियों की परस्पर तुलना की जाय, तो एक ऐसी समस्वित, शब्दावली प्रकाश में जाएगी शिसके आधार पर संस्कृत में राष्ट्रिय पाश्यक्रम का विकास किया जा सकता है

कपर संस्कृतनशिक्षण के बरप्ीकरण के प्रसद्ध में प्रस्तुत कोश के शैक्षणिक मुल्य वी विस्तार हे चर्चा की गयी एसदर्तिशिकत यह कोश राष्टू की भ्राषात्मक एवं भावात्मक एकता को सुहढ़ बनाने में सहायक सिद्ध होगा | अतः इसका राष्ट्रीय मुल्य भी कुछ कम चहीं है यद्ट सत्य है कि भारत का राज्यों में विभाजन भाषा के धाधार पर हुआ! है, जो विन्तकों के विचार से समुचित चट्दीं हुआ देश के समक्ष जुझने के लिए पूर्व से ही जाति, धर्म, सम्प्रदाय, वर्म भौर वर्ण-भेद की समस्याएँ कुछ कम नहीं थीं। अब क्ाया-यिवाद भी उममें जुड़ गगा यह भाषायी विवाद दिनानुदिन गहुराता जा रहा है इस स्थिति में उक्त प्रकार के द्विभाषीय धुलनात्मक कोश सम्पूर्ण राष्ट्र में भावनात्मक एकता के विकास में योगदान कर सकते हैं। जब व्यति घुदुर प्रदेक्ष में अपनी ही भाषा के शब्दों के प्रयोग वेखता-घुनता है, तब वहाँ की भापा के प्रति उसका प्रेसभांव जागृत होता है इस भाषा से तसका परिचय ज्यों-ज्यों बढ़ता है, वैमनस्य भाव कम होता जाता है। फिर उस भाषा में बोलने वाले व्यक्तियों तथा उत्तके रीतिनरिवाजजों के श्रत्ति हमारी आइर-भावता बढ़ती है। इस प्रकार बने: शनेः एकात्मकशा की भावता हृढ़ होती है यदि भारतीय धाषाणीं मे दी लिपि की दीवार हटा दी जाय तो हमारा विश्वास है कि भाषागत पिद्वाद प्यास प्रतिशव कम हो जायेगे; क्योंकि क्रमस्त भारतीय भाषाओं की घमनियों में संस्कृत का ही रक्त प्रवाहित हो रहा हैं इस कात की परमानश्यकता है कि पथम चरण में संस्कृत के साथ समस्त आधुनिक भारतीय शापाओों और ट्वितीय जरण में परस्पर आधुनिक भारतीय भाषाभों के तुसवात्मक्ष कोशों का निर्माण किया जाय

इतना ही गहीं, यदि मफ्यिग की प्राधीनतम समृद्ध भाषाओं में ग्रीक तथा लैटिन तथा पूर्व की सापाओों दें संस्कृत तथा अवेस्सा के परस्पर तुलनात्मक कोश तैयार किये जायें तो पता चलेया कि इनमें भाषागत्त अछ्ुर साम्य है। यही नहीं, हमें वह जानकर युद्दद आश्चर्य होगा कि इस भ्राषाओं की छत्तठाया

मुँलिका

में पनपी संस्कृतियों में भी विज्क्षण साम्य है। तब गोरे और काले तथा पूर्ण और पश्दिम का अ<-भाव सतत; निर्मल हो जायगा तब हम देखेंगे कि समस्त पदेशों, देशों, जातिकों एवं धर्मों में केबल हिट मद हु मूलतः सभी एक ही धृर्दश से सम्बन्धित हैं। और ने एक ही सवात से चलकर विभिन्न पिश्याओं | कैफ हैं वक्षिणपूर्व एशिया के देश---वाईलैएड, ऋम्जोडिया, इ्ोचोन, दर्मो, जाना, मुमझा इत्माएि देश सी भारतीय संस्कृति से पूर्ण प्रभावित हैं। समीक्षकों की सम्मति है कि उक्त प्रकार के कोश सस्य जवश्यक दौक्षिक अथवा साहित्यिक कार्मी में तो सहायक घिड होगे ही, साथ-साथ कारिमाबयिक सखादती के सिमाम में इतका प्रचुर उपयोग किया जा संकता है | शोम्रकार्म की दिफा में घहु कौश अधिक उपदेश होगा

9. विधि [श0०८टतपरं

संस्कृत अधिसंक्य धराधुनिश भारतीय भाषाओों एवं शेल्लीग भाषाओं को जतगी है तथा समस्त भारतीय आयतर भाषाओं की सम्पोधिका है इप कारण संस्कृत के संगमय अस्सी अतिशत मर्द सात या तदभव रूप में भारत की सम भाषाओं में मित्य लेखन, दहद आया आाइड्आार में आये हैं। इश् कारण भाषा-शास्हीय दृष्टि से इसका प्रद्भर महृत्य है। संस्कुत-बाइमय को अछ-सम्पदा विज्ञान है और इसका व्याकरण अत्यन्त वैज्ञानिक है शब्द-सम्पदा की विशालसा एवं ब्याफरण की वैजञानिकोता जड़ा एक और संस्कृत की विशिष्टवा है, दूसरी ओर ऐेस्कृत के अचार-प्रसार में मे कुछ ढव्लाइयां भी तत्पक्ष करती हैं इसी कारण संस्कृत-शिक्षण के माधुतिकीकरण एवं सरचीकरण की भांग बराजर घठती रहुदी हैं

संस्कृत से धम्बद्ध शिक्षापिदों, भागाविरों, शिक्षात्रिक्षारियों एवं अंध्यवनों का परत है कि प्रस्तेक प्रादेशिक था क्षेज्ञीय भाषा में प्रच्ित संस्ृत फी तलाम शर्य तद॒भव शब्दावती का संकलन करके हद उस शेल के लिये संस्कृत का एक पृथक्‌ पाठ्यक्रम मिकसित किया जाय और सदगुझुष बोदद शामग्री प्रयाग फी जाय, तो उस दोक्ष के लोगों के लिये संस्क्षत-शिक्षण निष्िकत हम मै शर्त हीगा; पर्वीकि कई संसकात के मये शब्द सोददे का अतिरिक्त परित्रम जहीं करना परेशा ये शस्य उनके लिये लिए-पर्िषित होते

इस तष्य को ध्यान में रखकर शिक्षा-मम्ज्ाभय, भारत सरकार के तश्कालीर धाया-मिवेशक एवं राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के निदेशक श्रीमामु कै० के० बेठी में 9?0 हैं? मे शसब्दिय ईस्कू संस्षान के ल्चर्गद गज़नाव जा केंद्रीय संध्कत विद्यापीठ, दमाहाबाद के विद्वायु प्राचार्य आर मआाचरज लिफाडी के कुशल सिर्देशन में इसी विद्यापीठ के धाषानुभाग को यहु कार्य होपा भाषा-निदेशश है बह ठीक हो अनुभव किया कि उंकि पंजाब बैंदिक भाषा पूर्व संस्कृति का भुक्य केम् रह! है, अतरत फयन पंजाबी भाषा हे ही संस्कृत-सुल्षक एवं समासार्थक शब्दों का संच्यत करके इसके लाधार भर विक्ित पाठ्यक्रम द्वारा पंचावी-सेह में संस्कृत-शिक्षण का कार्य आत्म दिया शाय। इसडे लिये धर्वप्रयम जी ३५७ एल० स्तर अणीत “ए काम्परेटिव विकशनरी आक इस्डो आर्चेत सेलेजेज ', मिन्षा-मध्छानव, आपस सरकार द्वारा प्रकाशित हिन्दी वर्ड से कामल टू अदर इस्डियन सेंजिजेज' का द्विखी-एंजाजी-पकष्ड छत "नुककों बोली” से शुब्ध-संक्सम का कार्यविश्लेषण-सहित पृजक-पचक ऋथ-पहों एर किया गया ! उक्त कबों है सभ्रत तीन हुजार अब्द संकलित क्रिये जाने पर शण्द-पक्षों में पंजादी शब्दों को युदडुली लिपि, उसकी बारुबारता तथा 'लिझुतवि्याकरण-विश्लेषण छोर पजारी तथा संस्कृत सखों की अपाडाइंत।

भूमिका 8

निरणयत एत प्रमाणीकरण को कावध्यक जानकर राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के तत्कालीन निदेशक श्रीशेदी महोदय ते संस्केत एवं पंजाबी-भाषा के मर्मश विदानों, भाषाविदों एवं शिक्षाविदों को एक गोष्ठी क्योजित करने की स्वीकृति प्रदान को गीष्ठी द्वारा कार्य एक मेज से धतकर देश के विभिन्न कोने से पधारे विद्वानों के समक्ष जाता है। इससे एक ओर जहाँ विद्व्जनों के वैदुष्य का लाभ प्राप्त होता है, दूसरी श्र उक्त कार्य का अचार-पसार भी होता है

जक्त कांगे के लिये भायातभाग की प्रथम पंजाबी-संस्कृत-कार्यमोष्ठी” दिनाक ।09-3-80 से 20-3-80 की अवधि में विस्ली विश्वविद्यालय, दिल्‍ली में आयजित की गयी, जिसकी अध्यक्षता कुरुयेल विश्वविद्यालय के भमुतपुर्व संस्कृतविभागाध्यक्ष एवं व्योवुद्ध प्रोफेसर श्री साधुराम शास्त्री से की थी। उक्त गोष्दी के आदरी (धानरेरी) विदेशक ढा० शृरभवतत सिह, प्रोफेसर एवं अधन्यक्ष, आधुर्तिक भारतीम भाषा-विज्ञाग, दिलसी विश्वविद्वालय ने गोष्ठी का उद्घाटव किया था इस गोष्ठी में 3900 गबद-पश्नों का वाजन शव संशोधन-पुरत्तर प्रमाणीकरण किया गया! उक्त गौग्ठी के समापवसभा रोड़ की अध्यक्षता दिल्‍ली थिठ लिए के तत्कालीन कुलपति ग्रो० उदित धारायण सिंह ने की थी उसे प्रमारोह में मुख्य अतिथि के रूप में वक्तव्य देते हुए लोक-सभाव्यक्ष न्ीधरी भी बलराम जाखड़ ने कहा था कि संस्कृत देववाणी है और पंजानी शुर्वाणी अतएथ संस्कृत-पंजाबी का भाषाणास्लीय तुलनात्मक प्ध्ययन एक ओर जहाँ राष्ट्र में भाषात्मक एवं घावात्मक शकता की दिशा में खत्यच्त उपादेय होगा, दूसरी ओर इसके आधार पर विकसित पाठ्यक्रम हारा पंजाबी-शेल्ञ के लिये संस्कृत-शिक्षण सुकर हो सकेगा लोक- सन्नाध्यक्ष मे उस समय सरकारी भोजनाओं के कार्याक्यत पर निराशा खेव प्रकठ करते हुए कहा था कि योजनाएं प्रारम्भ शो होती हैं, किस्सु ततके परिणाम सामने हीं भाते उनका यह उद्‌दोधन हसारे लिये

सदा चुनौती का कार्य करता रहा

इसी कम में हितीय कार्यगौष्ठी गफ़ावाथ क्षा केख्रीय संस्कृत विद्यापीठ, इसाहाबाद के परिसर में बि० 5-]2-80 से व्रि० 20-2-80 की अवधि में सम्पन्न हुई। इस बीच भाषानुभाग ने पु) 4500 शब्दों का संकपतन कर लिया था। इस गोष्टी में 4500 शब्बपतों की पूर्वरीति से समीक्षा की गयी सथ! भावासुभाग द्वारा निधित 'पंजाबी-भाषा क्षेत्रीय संस्कृत-पाव्यक्रस” के आहूप का अपस दाचम करके अगैक्षित संशोधन भी किया ग्रया) इस सोष्ठी को अध्यक्षता भुद नानक देव विश्वविद्याशय, अमृतसर के सूद सादक अध्ययन-विभाग के भुतपूर्व अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डा० औतससिद्द ने की थी। इस गौष्ठी के अतिभागी विश्यानों से सुझाव दिया कि इस शब्दायती का संकलन-कार्य तब तक परिपूर्ण नहीं कहे? जा सकता, जब तक भाषा-विज्ञाग, पंशियाला का “परजामी-हिन्दी कोश”, तथा भाई कारछ सिंह के

अहादु कोश! से शब्द-संग्रढ् दे कर लिये जायें

इस गौप्डी शे तत्काल पश्चात भावानुभाग ने सर्वप्रथम “पंजाबी हिन्दी कोश” उपलब्ध करके पूर्व संकलित 7500 शब्दों के अतिरिक इस पंजाबी हिन्दी कोश' तथा भारतीय व्यवहार-कोश' से 4500 शह्दों का संदलन किया | इसी मच भाई कारहु सिंह फा विश्वुत, किन्‍्सू दुर्लस सहान्‌ कोश' पुन: मुद्रित हो. गया इसके घपलव्ध होते ही इससे तथा पंजाबी इंग्लिश डिक्शसरी से लगभग 4000 पब्दों का संकलन किया गया ठ400 नवकिभित शब्द-पक्षों के प्रमाणव एवं हितोग कार्य-गोष्की में

है अधिकता

विकसित पंजाबी क्षेत्नीय संस्कृत-जिक्षण-पात्पक्रम” को अ्रस्तिम झूप प्रवास करते के बिये गोफिकियों हो शद्धला में पंजाबी-संप्कृत-भाषाबिरों एवं गिक्षाविदों की तृतीय कार्बगोकी दिए पह>ी- 82 के आोजटव2 की अवधि में गंजावाब झा केज्ीय संस्कृत विद्यापीठ, इसाद्ायाद के परिसर में सम्पन्न हुई इस काद- शास्रा का उद्घाटन मुख्यातिथि के रूप में आमन्लित शीर्वर्प भाषाशिद बौ० उदय तारागण तियारी ने किया तथा अध्यक्षता वैयाकरण पंछ भुपेसमति खियाठी ने की अब दोनों दिबमढ़ हो पड़े हैं | इस भोप्ठी के समापनत-समारोह में मुख्य अतिथि के कय में ओर उबित तारायण गरिह, ततन्‍्काजीन कलपति, इलाहएबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाब पश्चारे थे तथा रामारोह की अध्यक्षता शधाहाबार विश्वविशनम के भूतपूर्व कुलदति औ० बाबुराम सकक्‍तेता ने की थी। इस गोप्ठी में अगधग 4907 शखद-पश्नों वा ह्रभामम ही पाया तथा पाख्यक्रम को अस्तिम रूप अद्वान बार दिया गंया। बोह़ी के विदामों थे वराकाई दिया कि भाषानुभागी अधिकारी भी कत्तिपय दिवसों हे लिये बंडीगढ आकर आयश्यकतानुमार पूरत- कालयों एवं विशेषज्ञों से परामर्श लेकर शेक् कार्य पूरा करें किर योष्ठी की अजशाकइला गह्ठी होदी

दृत्तीय गोब्ठी के अस्तावानुसार भावानुभाग के दोनों अधिकारियों ते मई, !9॥+ # सिललेंद सप्ताह में पंजाब विश्वविद्यालय, चण्ड्ीगत के परिमर में रहकर डा० ओमप्रकाश अशिप्द एड शाह फभदेर सिह के सहुभोद् से शेप अब्द-यत्नों का प्रभाणन किया | श्स प्रकार इस कोश हैं पजाडी है सरास-मुहक एवं समानार्थक कुल (600 ब्न्दों का संकल्म-विश्लेतण पुरस्तर क्रिया गया है। पत्र कहता सा अमुयगुक्त द्ोंगा कि पंजाओं में संस्कृत-मृूलक समातार्थों शहर माल इतने ही हैं। गदि पंआाओी की मनध्य प्राचीन एवं आधूर्ििक तथा ख्िखित एवं अभियित मोज-्याल के साहिटर एवं धागा | भवइ-हंक्णम किये जाये तो निश्चय ही अच्छी खासी संख्या में संस्कृतमूलक समागार्थक शब्द प्रात द्वोंगे

इयंचरूणा (जा तेआतुरातएवा

अभिष्नत्त

प्रस्तुत प्रन्‍्थ का ताम पंजाबी-संस्कत-धकोश (कप |क सिजाफपए सवजकाफ: ) इचा मजा हैं यहाँ यहूं शंका स्वाभाविक है कि शब्यकोंश! के लिये अंग्रेजी मे प्रवलित भ्क्नद हैं. ०4५26 कु (जिंपाक्रात्ा)) है फिर शब्दकोश के सिये अंग्रेजी अभिधान में “खॉगपरी' शछ्द का प्रमोद फिस हरृकथ से किया गया ? अथवा यदि इस कोश के आग्लभावीय जधिबाब "४िकककका 60:फ्रेल* (५४% को भाधार मातकर विधार किया जाय तो भी अंका की सूंजाइज रहेगी ही। अंग्रेजी स्हॉनरस' का इवालार है शब्दावली, शब्द-संग्रह 'शब्द-संकलम! इत्यादि। फिर क्यों नहीं फिदी अधभिधाम शअफाफरोशा के स्थान पर शब्दावली! 'शब्द-संग्रह' अथवा 'शख-मंस्वत' रखा गया ? सब्य महू है की साल दोनों विकह्मों में किसी एक विकल्प को स्वीकार कर लेते दर हमारी बात नहीं बहती | है 4 प्रत्य मे तो सम्पूर्णतवा शब्दकोश है और ते ही 'स्फॉयरी' 'अब्यकीश' में पामाध्यवशर भरकर क्रम से शब्द, आहदों का धप्चारण, उतकी सिशवित तथा ख्वाकुतियाँ, उसके पिनिन्न आर्य, उफ्के पर्वाय जौर विपयाय तथों उनसे. शम्बंद विभिन्न प्रयोग भी हिये गर्े होती है। इसके अलधंत उस भाषा के शब्दों के सम्बन्ध में हम्पूर्ण सृचनाएँ ही अभी ही सकती हैं अथवा सूचनाओं का केदस इक भाव भी विदा भया हो सकता है। फिलु इद कोश में तेशा नहीं है। एक जहहों

भूमिका ह॥

के आय हो अथवा तोन ही अर्थ दिये गये हैं। शब्दों के पर्याय एर्व विपर्याय तथा शब्दों से सम्बद्ध विभिन्न प्रयोगों का इसमें अधिकलतवा अभाव हैं। पुतरव पंजाबी शाया के अधिसंस्य शब्दों को इसमे स्‍्थात भी नहीं प्राप्त हुआ है। अतएवं इस कोश की तुलता दैनिक व्यवहार में प्रचलित सामाश्य कोशों से नहीं की जश सकती इसे स्लॉतरी' मात्त कहता भी समुचित तहीं है, वर्योकति स्लॉसरी' में अक्ारादि क्रम मे शब्द तो दिये गये होते हैं, किन्तु शब्दकोश के समाव इस शब्दों से सम्बद्ध अनेक मूचनाएँ नहीं दी गयी होती हैँ ग्लॉसरी प्रा: ग्रस्थास्त सें दी जाती है। किन्तु इस कोश में शब्दों के संग्रह के क्षतिरिक ध्वस्थजुन, ध्याक्ररणिक टिप्पणियाँ एवं अर्थ भी दिये गये हैं। बहु सब गजलॉसरी' में नहीं होता अतएव इस कोश के लिये श्लॉसटी' अभिधार भी समुचित नहीं है। इसका एक कारण यहूं भी है कि इसमें शल्दी का संकलन ते तो सामान्यतत्रा प्रचलित कोशों के अनुसार किया गया है औौर ने हू ग्लॉसरी' में संप्रद्दीस शब्दावली के समान वस्तुत: इसे पंजाबी-संस्कृत-शब्दों का विशिष्ट कोश कहता अधिक उपयुक्त होगा विशिष्टता का आधार यह है कि इस कोश में पंजाबी भाषा के उन्हीं शब्दों को स्थान दिया गया है, जो प्तेरकुत-भाषा से विकृत्तित होकर पंजाबी में आगे हैं तथा जिन्होंने अपने में एस्कत के अर्थ आज भी युरक्षित रुप हैं। तात्पयें यह है कि इस शब्दकोश में उन्हीं शब्दों का संचयन किया गया है, जी पंजाबी तथा संस्कृत में ध्वनि एवं अर्थ की हब्टि से समान हैं इस कोश में पंजाबी-भाषा के वे समग्र शक छोड़ दिये गये हैं, जिनका विकास संस्कृत से तल होकर किसी कअत्य भाषा से हुआ है कथन! मे शब्द देशभर हैं। इसमें उव शब्दों का भी संग्रह हीं किया गया है, जिसका अर्थ पंजाबी तथा संस्कृत-भाषा में शसमान हो इस कोश की शक विशिष्टता बह भी है कि इसमें नागरी तथा रोमन लिपि में शब्दों के अब्चारण का मधावत्‌ ध्वन्यकुन देने का प्रधास किया ग्रया है)

अतुफ़स

शस कोश # संग्रहीस शब्दावली का प्रारम्भ गुक्मुली लिपि में, भितद्ध पंजाबी-पन्दों से होता है। ऋकि पंजाबी-भाषा के हब्दों को आधार मानकर इनके संस्कृत-मु्ठ तक पहुँचने का श्रयाक् किया गया है, छतएव कोश का आरख्ध पंजाबी-शब्दों से होना स्वाभाविक था। इस प्रकार के कोशों की अक्रिया भी पही होती है। अनेक विवश्णों के साथ गुरुवाणी से प्ैवबाणी वक पहुँचने का यह अथम प्रयास है, महू विन प्रत्ापूर्त कहाँ जा संकता है।

कोप के विंवेश्त इन अमुख शब्दों (2०00 ४०१५४) के पश्चात्‌ मागरी तथा रोमन लिपि में इस शब्दों के उत्जारण का यथावत्‌ ध्वन्यतुत देने का प्शा्त किया यया है। पंजाबी-शब्दों के उच्चारणों का दो लिपियों में ध्वम्यद्ुत देसे के सूछ में मह उद्देश्य रहा है कि इस कोश का विपुत्ष प्रसार हो सके तथा इसके पाठकों की संख्या में पर्यास अभिवृद्धि हो सके “यथावत्‌ ध्वन्यछूत का प्रयास किया गया है --- यह स्थायया-शापेश्ष है। कोश में वस्थुत: हिसी भी भाषा के शब्दों के उच्चारण का मधावत ध्वस्थक्कृत करना दुस्तर कार् होता हैं। कारण, एक ही शब्द प्रदेश-धिश्नता एवं बबतृ-पिन्नता के कारण सिक्ष- भिन्न कप से एसआारित होता है। कीण में इसे समस्त भिन्न उच्दारणों का ध्वन्यकुत असम्भव है। अतपुव कोश में उसके भाभक़ उत्यारण का ही ध्वस्याकुत किया जाता है। ध्क्यश्जुन की यह कठिनाई तब ओर भी बढ़ जाती है, भड किसी धावा-विशेध की ज़िति में मे दिया आकर भाषात्तर की सिपि में दिया जाता है इसका कारण यह है कि सापा-विश्ेष के सकी दर्णों के श्िये शावास्तर में तो पर्भायवाची वर्ण होते

प्र

है

रा

3” बह

8 भूसिका

हैं और ही ध्यनि-्सकेत | प्रत्येक लि जिस भाषा के लिये मिभित होती है, उ्मी भागा की समस्य ध्वनियों को व्यक्त करते में अक्षम्र होती है, फिर अन्य भाषा की ध्वनियों की धनरिध्याक्त की मास सो दूर ही है। बोलने और लिखने में समस्यय का दावा करता प्र्ठता है। पक परराइरण--ऑंम्दत में बरा शब्द का उल्चारण पंजाबी में अन्य प्रकार से होता है | ग्ंजाग में 'घरा की 'ब' ध्यति का और गम के बीच की मिल्चित स्वनि-जँसी उच्दारित होगी इसका ध्वति-संकेत कुछ ( के हु. र) बैप्ा होगा पंजादी के 'भगवामां और भाभी आदि शब्दों का उत्दारण भी इसी प्रकार होगा पंशाबी-भावा में धड्य के प्रारम्भ में किसी वर्ग का सधोष महाप्राण वर्ण जाने पर उसका उच्चारण अशोष अन्‍्यमज्ञाभाभ को सरह होकर उस पर अधिक बल दिया जाता है

ध्वस्यकुत की इसी कठिनाई को हृष्टि में रखकर कतिपम फौशकार्रो ने झब्दों का मिष्यम्तरण» भान्न करके छोड़ दिया है इससे पाठक अथवा भावा सीखने वालों में भशुद्ध उम्जारण का अभ्यास बगुता जा रहा है। “अकरणात्‌ मचदकरण श्रेव:” इस सदुत्ति का अवलस्त नेकर प्रहुत कोश मे यदायवु ह्वन्प कूल देने का भवास किया गया हैं। हमारा तो यह भी उद्देश्य है कि पंशावीवश पाठक की पंजाबी भाषा के शब्दों का सही उच्चारण सीख सो सम्भव है, इस प्सझु में अनेक सवलों पर शुदियाँ रहू गधी ही, सुध्री पाठक क्षमा करेंगे

ध्वम्पशुन के पर्चात्‌ कोष्ठक में कहीं सो [3], कहीं [४], तथा कही [7] संत्या वर्शायी गयी हैं। कोष्ठकों के अख्दर को ये संस्यासें पंजाओी-भावा में प्रयोग तथा पदलय के आधार पर ततत्‌ शब्दों की बारस्थारता (ऐ:सपृपरवघए५: को सूचित करती ?ै। आरम्थारता का भिर्मार्ण केवल पंजाबी भाषा के शन्दों का ही किया गया है। पंजाबी-भावा में कथ प्रशलणित अण्गी! को संख्या [] से, प्रचलित शब्दों को [2] से तथा जतिप्रचलित शब्दों को [7] से बहाव गंगा है प्ररिशिष्ट भाग के शदों के भागे कोई भी कोष्ठक नहीं के इसका कारण बहु है कि परिधि शब्दों की वारम्भारता के विषय में विद्वामों में मतभेद है इस असकू में कुछ ब्रिदात कारबादी है शितक कथन है कि परिक्िष्टमत ये सभी शब्द वर्तमान प्रजाथी में बिःकु् अभप्रवर्शित हैं। इसका प्रजनन शुन्य की कोटि का है। लतएवं कीश के सरदर्भ में इत पर विश्वार करना तथा झहें कोश में ध्वात देसा व्यर्थ है। किन्तु विद्ानों का एक बृल्द उद्ारवादी है. जिसका हष्टिकोश है शि (जधभ्व के क्षा्रार पर बह कथन सर्व सश्यरहित है कि इस शब्दों का प्रथलम अब पंक्षाजी में नहीं होता ऐसा दफा कीई कर भी महीं सकता; क्योंकि पंजाबी-भाषा फी भोज कई बीलियाँ हैं बहस सम्भध है, फ्रिसी-म-किसों! औ्ी में इनका अचक्षत धब्र भी होता हो। थोड़ी देश के किये गज स्वीकार भी कर लिया जाम कि गंधाओी की किसी भी बोजी में इन शब्दों का अभोग अब गहीं होता, तो भी मह विधियाद है कोश हवा सांहिस्यिक-धार्मिक ब्न्यों में. इतका अगोग हुआ है. तथा इसका अध्ययत-मगन खब भी होता है तप बॉस्म्बासता की हृष्ठि से इनको शल्य कीटि में रखना तर्वासजुत नहीं प्रतीत होता है

,..... इस दो विरद्ध मतों में समस्वय कैसे किया जाय ? वास्तव में दोनों ही मतों में अण है दौरसों ही मतों का अपनो-अपना पुष्ट आधार है। निरवंधि काल एंव जिपुत् पुक्वी की इन्ति मे रुका परन्न 'कहुता समुद्ित पंतीत नहीं होता कि अपुकाशुक शब्दों का प्रचलन अत्र हहीं होता पुरी-मकगरी हिए आावा हक युए के. अन्तरास के बाद भी जब भचलप में भा सकती है, तो फिर हत्दों का ब्या कपः है

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है? जा रू

क्षण] रयं

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अताय प्रयोग की दृष्टि से जय कोटि का होते पर भी अमुकामुक शब्द शब्दकीश की सम्पत्ति होते मे बाधक नही हैं. और जहाँ तक भाषाशास्लीय आधार पर भाषा विकास का प्रश्त है यह सत्य है कि परिशिष्टगत पजानी-भव्द ससक्त-भाषा से विकसित है अतएवं थे इस काश की सम्पदा होने के अधिकारी है

यहाँ मह् कहू देना कषत्यन्त प्रासद्धिक होगा कि घारस्वारता के सिर्धारण के लिये यहाँ कोई निर्धारित वैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं अपनायी गयी है। यहाँ वारम्बास्ता का निर्धारण वस्तुनिष्ठ होकर व्यक्तिनिष्ठ है। वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार इस समस्त शब्दों के बारस्वास्ता-मिर्धारण में अपार समय अपेक्षित था और तब यहु कोश अधिक विज्वम्ब से प्रकाशित होता | बारस्वारता का मिर्धारण इस प्रसज भें आयोजित गोध्डियों में भाग लेने वासे पंजाबी-विहयनों ने किया है

बारस्थारता के पश्चाव पंजाबी-मब्दों की व्याकरशिक टिप्पणियाँ दी गई हैं इन शब्दों के सभा (नाम) जीने पर पूंस्लिंग धथवा स्व्रीलिफ के संकेताक्षर 'पुं०” अथवा 'सलो०' से, सर्वनाम होने पर सर्व० मे, विशिषण होने पर 'क्रिए से, अठ्यय होते पर 'आ०? से तथा क्रिया-विशेषण होने पर क्वि० वि०! में दर्शाया गया हैं शब्दों के क्रिया होने पर उनको सवार्मक अथवा अकर्मक के संकेसाक्षर 'सक० क्रि०' अशंवा अंश किंग से दिखाथा गया है।। पंजाबी की कोई किया थदि संस्कृत के किसी सिद्ध क्ियापद से विकसित हुई है, ही उसके बर्तगान-कालिक होने पर वर्त०, शृतकालिक होने पर 'भूत० और भविषध्यश्कासिक होने पर भवि>' से निद्िप्ट किया गया है। ब्रथा---

हम वेसध्ि ४छकछाओं भ्रविए बकर फ्रि० बत्स्यसि (वादि शक्कर जुट) रहेगा, निवास करेगा

पंजादी- शब्द के सामने की सूचनाएँ यहीं समाल होती हैं। पंजाजी-शब्दों का यूं विश्लेषण सधिकाशत्ं पूक ही पक्ति में समाप्त हो गया है, किन्तु कहीं-कही दो पंक्तियों तक भी चला ग्रया है

पंजाबी आम्यों के विश्लेषण के अमस्तरः द्वितीय पंक्ति ले संस्वृतत-शब्दों का विश्लेषण आरभ हीता है। मेस्कतनभाषा के जिस मूल शब्द से पंजाबी-शब्य का विकास हुआ है, उस संस्कृत-मुल को काले- भोटे धक्करों ते विश्वलावर गया है। यहाँ ध्यासब्य है कि संस्कृत-शब्दों के संज्ञा, विशेषण, सर्वनाम अथवा अश्यप होने ६९१ उनका छातिपत्रिक (मूल शब्द) छप ही दिया गया है, से कि पद) यथा---हिपएट को फुट ही विकास विखसाशा गया हैं, मे कि पद खिध्टू: से! हाँ, पंजाबी-फियाओों के विकास को विकसाने के लिए संसूत की मत बात से ने विखलाकर उस धातु के वर्तमान कामिक (सदू ज़कार) प्रथम पूथव के एक बचत के सय में विखलाना समूृखित प्मझा गया। यथा, पंजाबी के >बतवहा को संस्कृत की अत-पपमर्ग सहित क-धातु के मद-सक्वार अधम पुरुष शुकबतन के रूप 'उत्किरति' से विकसित दिखलाया सा है पंजातीफ़ियाओं के विकास को विज्ञलाने को यही प्रक्रिय इस कोश में सासबील अपतायी गयी है गैस परशालि मे दोनों ही धाषानओं की क्रियाओं का साम्बन्योध कटिति हो जाता है इस पद्धति से क्िद्रा. शाध्मोगद की है. अभबा परस्थैषद की-- इसका भी ज्ञात सत्काल हो आता है। इस कोश के अभ्यर्गत पंजाओी की जितनी भी कियायें संपड़ीत की पयी हैं, सभी प्रत्यथान्त हैं। जतएवं इनका संस्कृत- यू भी परह्मवात्त ही पिया गया हैं यदि पंजाबी-क्रियाणों का पंस्कृत-मूज केवल घातु का निर्देशे-माले करके दिलक्षाया जाता, मो कई विसंगतियों के ऊपत होने की संभावनाएं थीं। महाव्‌ कीशकार आरं० खत» दर ने भी जपने फोक में इसी प्रक्रिया को अपनाना है

0 अभिका

संस्कृत-शब्दों के बागे कीप्ठकों में पंजाबी-आऊों के समान हो उनकी व्याक्रणिक दिव्वजियाँ दी गयी हैं। संस्कृत-शब्दों के संज्ञा, सर्ववाम, विशेषण एवं अव्यव था क्िया-विशेषश होने पर पंकाओा शब्दों के समान ही संकेताझ्रों का प्रयोग किया गया हैं। किन्तु क्रिया होते पढे ओीग्टदा मे उस चालू के गण-निर्देश के साथ-साथ धातु के सकर्मक होने घर सक्ृ० तथा अकर्मक होने बर याद ही विरण दिया गया है | यदि यहु धातु प्रेस्मार्थक है ती इसका प्रर०' से उल्लेख किया गया है किन्तु पशामी-किया के संस्कृत के सिद्ध क्रिया-पद से विकास को स्थिति में संह्कृत-शब्दों के भागे कोप्डकों में कार एव इक का निर्देश किया गया है! यंधा--

खधग लखाम ॥ीछाश सके वैसेंक करिए सक्षयातरि (चुरांदि लू प० पु० सकण) मैं देखता हैं; में जानता हैं

इशके पश्चात्‌ शब्दार्यों की जारी आती है। गह पहने ही कहा गया है. कि हंस शष्द-कोश में पंजाबी-भाषा से उन्ही शब्दों का संक्षमत कर विम्शषण किया गया है, जो पश्राद्वी सदा संस्कृत में आर्य की हृष्टि से समान हैं। इस हप्टि से संस्कूसत-शक्दों के आगे जितने मी अर्थ दिये गये है, थे बशाओी तथा संस्कृत--दोनों भाषाओं में समावाएी हैं। हीं, वह तंस्य पृथ्रह हे शि सप्पतति किसी-कियों आशा का यदि संस्कृत में अर्थ-विस्तार हुआ है, तो गंजाओं में अर्थ-राकोत् और याद पंजावी मे अर्थ-विव्वार हुआ है तो! संस्कृत में अर्प-संकोच, पर मूलार्थ (अभिश्मार्स) प्रभयक्ष समाद है। अंहाँ एक ही शब्द के पी-पीम खिल अर्ध देने की क्ावश्यकता पत्नी है, वहाँ सेमीकीलम से उस सिक्ष ल्थों को शिखलाया गया है। पर्याव देंगे पर अर्ध विराम (कॉमा) का प्रयोग किया गया है।

सेस्कूस-शब्दों के आगे जितने शी अर्ध दिये गये हैं. तथा घमकों व्यक्त करने वाले हों में जा भो शब्द ध्वनि-साम्य की हप्ट मे संस्कत-शक्य के समीप है, उसको अर्थों की ह्रूदुजा मे सर्वेधयण शवाम दिया गया है। बचा, पंजाबी शाह के लिये संश्यत्त फत्वाग' के वर्थाभिध्यक्षक को में 'हुफाना हानि की दृष्टि से संस्कृत 'इत्थाव' से अधिक समीप है, उत्मति' आदि लुक (९ बचे गये है अहशब 'सटाना को बसे पहले रखा! गया है यही रोति सर्वक्ष अपनाणी गयी है

प्रस्तुत शोश में कहा-आही मुख्य शब्द (धमटों। ऋ0तात) के छार ॥, है, 3, वा + की संब्याएँ दर्शावी गयी हैं। पैसा विशेष स्थिति में ही करता पड़ा है! जब पंजाबी के एक पा अत साय वर्तवी एवं उत्यारण की हष्ठि से ती समान रहे हैं, फ्रिसतु अर्प-भिश्वदा के काश्ण पशढा अह्कात- हल अप भिन्रे रहे हों, तभी उसको इस संख्याों से निदिब्ठ करता पड़ा है। कधा--पैसठ पंजाशी में है; का विकास ऊंट के अर्थ में संस्कृत के रघ्टर' शब्द से हुआ है, किखु होंठ' के कर्च में इहुडा घंस्कृत-मूल्ल अप्क है जतपएुव इंस्कत-पुल्त की भिश्वणा के कारण शक ही शब्द का कावेश्न कई बार करनों पड हैं

व्यवस्था की इष्ठि से विचारणीय है शब्दों का क्रम प्रस्युत कोश में शब्दों का कम पंजाओ की. वर्णसाला के क्रमादुतार रखा गया है एंजाबी-बर्गशाला का कम इस अक्रार है->-

स्वर है हैं के भा माँ के मे हि है

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पंजाबी के स्वरादि शब्दों में सर्वप्रथम 9 ते आरंभ होते वाले शब्दों को रख? गया है, अभन्तर 9, जे भादि सरों से आरंध होगे वाले शब्दों को; क्योंकि पंजाबी की स्व॒र-माला में छु हो आदि स्वर है इसी प्रकार व्यंजनादि शब्दों में सर्वप्रथम प्र-/ से आरंभ होने वाले शब्दों को रखा गया' है, बाद में थ, आदि व्यंजनों से आरंभ होने वाले शब्दों को: क्योंकि पंजाबी की व्यंजन-माला में सर्वप्रथम स्थान प्र

का ही हैं!

यहाँ ध्यात्तव्य है कि स्वर से प्रारम्ध होने वाले शब्दों का क्रम तो पंजाबी-वर्णमाला के स्वरों के क्रमानुभार ही रखा गया है, किम्तु व्यंजन के साथ संयुक्त होते पर स्वरों का क्रम देवनागरी वर्णमाला के स्‍्थरों के क्रमामुसार रखा गया है | इस स्थिति में व्यंजन-संयूक्त स्वरों का क्रम होगा -- पर, पा, मर"! मं जो व्यंजन स्वर-रहित हैं, श्तको सबसे अच्त में स्थान प्राप्त हुआ है तात्पर्य है कि मे, भा, प्लि में की समाति के पश्चात्‌ ही स्व॒र-रहित व्यंजन आये हैँ यथा--स्थ, स्त आदि | पंजाबी-भाषा के सुप्रसिद्ध कोश महातु कोश' में भी उपयंक्त क्रम ही अपनाया गया है

4, आभार ((।पघरते८)

कोश-मिर्माण के हंस दीर्घ अस्तराल में अनेक बिद्वण्जनों का योगदान रहा है हम सबके हुदय ते अंमारी हैं। उसमें कुछ लोगों का नाम्तः स्मरण करता हम अपना पावन कर्तव्य समझते हैं। शस क्रम में सर्वप्रभम उस शब्यकोशों अभय शब्दावज्षियों के विद्वान सस्पावकों एवं लेखकों के प्रति हम अपनी अछणड अद्धा शपिल करते हैं, जिससे हमने इस कोश में पंजाबी के शब्दों का संचथत्त किया है हुए प्रसुझ में शिक्षा-मसहालय, भारत सरकार हारा प्रकाशित 'हित्दी वडू कामत हू अवर-इण्कियन लेणेलेज' का हिन्दी-पंजाबी प्रद्चह , खीयुत आार+ एल० धर्यर अ्ीत 'ए कम्परेटिव शिकानरी मॉफ इण्डो आर्यत सेस्ेजेज, सबकी बोली, श्रीविष्वसायथदिनकर परवणे द्वारा रचित भारतीय व्यवहार-कोश,' आई काश सिह दारा सम्पाधित महाद कोश, भाषा-विभाम पशथ्टवाला का “ंजाब-हिनदी कोश तथा 'पंजाबी-ईसशिलिश डिक्शनरी ,विशेषत: उल्लेखनीय है। कोशों की श्र छुला में स्व० चतुर्वेदी द्वारका प्रसाद शर्मा तथा पण्डित तारिणोश शा द्वारा सम्पातित संस्कृत-शब्दार्थ कौस्तुन्तः तथा सर मोतिबर विकियम द्वारा प्रभीत 'संस्कृत-इंश्तिश्न व्विकादरी' एवं डा० हरदेव ब्राहुरी का वृहुत्‌ अंग्रेजी-हिंदी कोश भी सांस्ता सस्लेखतीय है, जिनसे अ्थी के विर्धरिण एवं अवेकासेक शंक्राओं के समाधान में प्रचुर सहायता मराप्त हुई है। सिद्धात्त-पन्धों में भट्टोविदीक्षित द्वारा रचित 'सिद्धात्त कौंमुदी' ने हमारी अनेकानेक गुत्थियाँ सुलझाई हैँ ?

9 भूमिका

क्ैज्ञीय भाषाओं की शब्दावलियों के आधार पर विकसित पाठ्यक्रम द्वारा संस्कृत-शिक्षण की इस थोजना की घूल संकल्पना एवं कार्यान्वयन का सम्पूर्ण क्षेद राष्ट्रिय संस्कृत संस्थाव के तस्कालीन निदेशक एवं शिक्षा-मन्हालय, भारत सरकार के भाषा-निरदेशक श्रीयुत केवल कृष्ण सेठी, धाई० हुए एस० को जाता है, जिन्होंने फ्ेवल यह योजना दी, अपितु भाषानुभधाग हाथ विकसित मव्द-पत्नों में उल्सिखित तथ्यों के प्रमाणन-हितू मोष्ठी आयोजित करने की संस्वीक्षति भी प्रदान की, जिसके अक्नाव में बह कोश सम्भवत: पूरा नहीं होता जब तक संस्याव से उनका सम्बन्ध रहा, तब तक इस बोजना के विषय में औपचारिक पत्माचार, दुरक्षाय अथवा अन्या्य प्रकार से हुईं उवकी प्रेरणा तथा उत्साह प्राप्त होता रहा! ! संस्थान से उनका औपचाश्कि सम्बन्ध छूट जाते पर थी अनौपवारिक रूप से इस योजना के सम्बन्ध में दे जिज्ञासा करते रहे उसके प्रति आभार के ठकसाली दो शब्द कहुकर गदिं में हृदय- संभार को कुछ कम करना चाहूँ, तो छल के अतिरिक्त कुछ तहीं होगा। उनके प्रति हमारों असीम अड्डा विधयावनत है

पुर्बे्षचित योष्ठीलय में मुझय अतिथि तथा अध्यक्ष के रूप में पधारें शणमान्य बिद्वार्यों एवं मनीषियों, जिनका चामतः उल्लेख हम पिछले पृष्ठों में कर आये हैं, का अनुग्रह हम हृदय से स्वीकार करते हैं, जिवका उदबोधन तथा अनुप्रेश्ण-भाषण इमें सर्वदा अनुप्रेरित करता रहा और हम भागे बढ़ते रहे इस गोष्ठियों में देश के कोने-कोने से प्रतिभागी के रूप में समाभत विंद्वण्जनों के अमृत्य परामर्श, सुझाव एवं सहयोग संदा-सदा स्थृत होते रहेंगे इस सब के प्रति हम हादिक कृतशता झापित करते हैं। अस्थानीय प्रतिभागियों में पंजाब विश्वविद्यालय, चण्ड्रीगढ़ के पंजाबी इंग्लिश डिक्शनरी विभाग से पधारे शझब्दकोश-विज्ञान के दो विशेषज्ञों--डा० ओम प्रकाश बमिष्ठ, रीडर तथा डा० अजमेर सिंह, प्रवक्ता का नामतः उल्लेख करता चाहँगा, जिनके अभुह्य सुझाव एवं सहयोग से, वास्तव में, यह ग्रन्थ शब्दावली के धरातल से उस्तीत होकर कोश क्री समीपता का संस्पर्श कर सका है। इस विद्भा्ों ने पंजाओी-शब्दों के ध्वन्यदुन, बारम्वारता तथा लिजुतदि-निर्धारण में पर्यात सहायता प्रदान फी है हम इनके आभार-भार से संकुचित रहने में ही गौरव का अनुभव करते हैं। अस्थानीय प्रतिभागियों में ही श्री विद्यानिधि पाण्डेय तथा श्री धीकृष्ण क्षेमवाल के वास सहुस! मानस-पठल पर आए जाते हैं, जिन्होंने दिल्‍ली विश्वविद्यालय परिसर में बायीजित प्रथम गोघष्ठी के आापोजन में अनेकानेक मिःस्वार्थ सेवाएँ अपित की। स्वथातीय प्रतिभागियों में भाषा एवं शिक्षा के मर्मश श्ीम्ान्‌ महावीरबसाद लखेड़ए, जो अब संसार में नहीं है, का नाम भी निःसक्योच उल्सिखित करता चाहुगा।, जितके ओीपनारिक-शनीपचारिक छोटे-बड़े सुझाव एवं अवदान इस कोश को अत्यन्त सहज भाव से निरन्तर प्राप्त होते रहे हैं। सो पाठों में सौ शिक्षण-ब्रिच्दुओं द्वारा संस्कृत-शिक्षण की कल्पना इच्दीं के मस्तिष्क की उद्भावना है। कोश एवं पाव्यक्रम के प्रति स्व० लखेड़ा के समस्त बबदान के प्रति हम हृदय से आधभारी हैं। स्थावीय व्यक्तियों में ही भावरणीय डा० हरदेव बाहरी' के प्रति हम सप्रश्रयावतत हैं, जिन्होंने इफ कोश की झपरेसा तैयार करने तथा पंजाबी विद्वानों के नाम सुझाने में हमारी सहायता की है इसी क्रम में खालसा इण्टर कालेज, इलाहाबाद की प्राध्याविका श्रीमती अमरजोत कौर शोढ़ी साधुवादाह हैं, जिन्होंने पंजाबी-शब्दों के व्याकरण-सम्बन्धी बिन्दुओं का पूप्रीक्षण अत्यम्त सहुज भाव से सम्पन्न किया

कोई भी योजना कुशल निर्देशन एवं उदार शासल के सदभाव में ही सभुचित परिणाम देती

भूमिका 8

है। अन्यथा 'विन्ायक प्रकृर्वाणों रचवामास वानरम के समाव हास्यास्पद हो जातो है। प्तौभाग्य से इस योजना को इस विद्यापीठ के विद्वान प्राचार्य डा० गयावरण बल्िपाठी के कुशल सिर्देशन एवं उदार संरक्षण--दोनो ही मिरन्तर प्राप्त होते रहे डा० लिपाठी चूँकि पौरस्त्य एवं पाश्चात्य--अनेक भाषाओं के अधिकारी विद्वातु हैं और साथ ही भाषा-शास्ल्र में इतकी ग्रम्भीर पैठ भी है! अधएद इनके बेदृष्य का अनायाप्त लाभ इस कोश को क्षण-क्षण सिला है। राजकीय बत्धन को जितता भी शिथिल किया जा सकता था, शिधिल करके उन्होंने इस कोश के निर्माण के लिय्रे अवसर जुटाये हैं। उसके प्रति कृतशता- शञापन के दो शब्द कहकर इस सम्पूर्ण योजना के प्रति उनकी सहज आत्मीयत्ता एवं भाषानूभाग के प्रति स्तेहसिक्त अनुप्रह का अवमुल्यत करने का दृःसाहस मुझमें नहीं है

संस्थान के भुतपुर्थ निदेशक आवशणीय डा० रामकरण शर्मा मे कोश-निर्माण में पदे-पदे प्रोत्साहन दिया है तथा वर्तमात निदेशक माननीय डा० मण्डल म्िश्व ने इस कोश के प्रकाश्षत की संस्वीक्षति अत्यन्त सहज भाव से प्रदान कर हमारा अत्यक्षिक उत्साह-वर्दधतशं क्रिया हैं। हम इस विद्वानों के अति सप्रश्नवावसत हैं

स्वनस्व कर्म में तिरत रहते हुए भी अपने सुहृदर सर्वश्री बा० किशोरनाथ का प्रवाचक, डा० राषवप्रसाद चौधरी प्रवक्ता, डा० जगन्नाथ पाठक प्रवक्ता तथा सुथी अर्चना चतुर्बदी शोधसहायिका ने कोश के निर्माण में अनेक प्रकार की सेवाएं अपित की हैं। सम्प्रति डा० पाठक, रणवीर केन्रीय संस्कृत विशद्यारपीठ, जम्मू में प्राचार्य तथा डा० चौधरी शिक्षा-विभाग के अध्यक्ष हैं। हम इनके अत्यन्त आभारी हैं। पुस्त- कालयीय नियमों को ढीला करके आवश्यकतानुसार कोश एवं सिद्धान्त-ग्रल्थों को उपलब्ध कराने के लिए सामान्यत॒या पुस्तकालय के समस्त कर्मचारी ओर विशेषत॒या श्री यूरजबहादुर वर्मा, श्री रामानन्द थपलियात, श्री भतिल्कुमार सिह तथा श्री जशञानवच्ध श्रीवास्तव धन्यवादाह हैं!

श्रम एवं सावधानी से कोशन्सुद्रण-हैतु शाकुत्तल मुद्रणालय के प्रबन्धक श्री उपेन्द्र ल्िपाढी को धन्यवाद दिये बिचा रह नहीं सकता )

भाषानुभाग शिवकुमार मिश्र गंगानाथ झा केद्रीय संस्कृत विद्यापीठ अध्यक्ष चन्द्रशेव्र आजाद पाक, इलाहाबाद

संकेताज्षर-उची

अव्यय अकमेंक जआज्ञार्थक्‌ एकवचन उत्तम कर्मेवाच्य क्रिया द्रष्टन्य नपूंसकलि जज फुए्ष पुल्लिज़ प्रथम प्रेरणार्थेक्र बहुवचन' भविष्यत्‌ भाववाह्य भूत्तकाल भमाववाचक संज्ञा मध्यम वचत वर्तमान विशेषण संकर्मक सप्तम्यन्त स्त्रीलिज्ग

पंजाबी-संस्कृत शब्दकोश (॥२०४७-5.0२5६७६ (/ 0255,७२५)

छेआ उआ ए६ [!] सब०

अदस > असौ (सर्व०) उस, वह शब्द की विक्ृति जिसका नि! को! इत्यादि विभक्ति के साथ ही प्रयोग होता है।

छिज्ाः उआ एड [3] अ० ओह (अ०) ओह, विस्मय या कप्ट अथवा विषाद सूचक शब्द 8ष्टि उइ पाई [8] सबे० अदस्‌ (सर्व०) वह, दूरस्थ व्यक्ति या वस्तु का बोधक शब्द 82 53४ई 7 [3] ज० ओह (अ०) ओह, पीढ़ान्युचक शब्द ह8ैप उस (85 [3] सर्वे० अदस्‌ > असौ (सर्व०) वहू, उसने, दूरस्थ व्यक्ति या वस्तु | छैप्रबक उसकणा (४४608 [3] झक्क० क्रि०

उच्छबसिति (अदांदि अक०) उच्छूवास लगा, उसाँस भरता, लम्बी साँसे लेता |

छेप्बल उसकणा (50908 [85] अक० कि० उत्कर्षति (म्वांदि अक०) उभरना, ऊपर उठना ! छेप्तट'' उसद (52६