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(7५0. 2५] यस्य दर्शनतेनांमि परवादिमतिन्धनं । दृकृत्यग्यापि लोकस्य मानसानि तमांसि च ॥
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` य्यासमन्तानवचःशरौधां निघ्रति निशेषभवार्सिना)
त्रिधातुरृष्यभरिषमाद्धाना विनेयलोकत्य सदेवकस्य ॥ नागारुनार्य प्रणिपत्य त्त तत्कारिकाणां विवतिं करिष्ये! ऽत्तानसत्प्रक्रियवाक्यनडां तर्कानिलाव्याकलितां प्रसन्नां ॥
तत्न \ न स्वतो नापि परतो न दाभां \ इत्यादि व्थमाणो शालं । [1,9.०१] तस्य कानि तंबन्याभियेयप्रयोननानि ^ इति प्रभरे " मध्यमकावतार् विकितविधिना शरदयज्ञाना- लकते मदाकरष्योपाययर्ःषरं प्रघमचित्तोत्पादे तथागतज्नानोत्पत्तिरेतमािं कृवा पा-
1) २१ २] म् ६ मै 00 26४४ 1156; 28०५-7 8ना१2 ; 1187766 १९8३ € प्रदा == 2॥८४द् वादा; . उकारा (4 २४१. ६ 918४1६३ 1, 1); एण एष्केढ$णार १०९; एकवण == €णहणा 06 18 76 प्रणा (९. प्र.) = (1४, ०0०86 > सलु (6०१्6ा४88801९). 9) एफाण्डाभषर वृण ७२४० ९61, कुपागण्डर वण एग्णवदोंऽत, 7, 205, ४. &5:“: `
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- 28 प्रधम प्रकरणं 3 वदाचाधीर्बनागार््ुनस्य विदिताविपरीतप्रज्ञापारमितानीतिः' कहणया परावबोधार्थं शा- ल्रप्रणयनं , इत्येष तावच्छाल्रस्य सेबन्धः^ पच्छस्ति व] न्वोणरिपूलशेषान् सेन्रायते इगतितो भवच्च । तच्छपनान्चाणगुणानच्च शातं ' एतद्धयं चान्यमतेषु नास्ति ॥ ईति ॥
स्वयमेव चाचार्यो वत्यमाणतकलशाल्नाभिधेपार्ध सप्रयोतननमुपदूर्शयन् सद् विपरीत-
सप्रकाशवेन माकात्म्यमुद्राव्य तत्स्वभावाव्यतिरेकवर्तिनि ' पमगुरवे तथागताय शा-
छ्लप्रणयननिमित्तकं प्रणामं कर्तुकाम घा् " घरनिरोधमनुत्पाद्मनुच्छेदमशाश्चते। खनेकार्थमनानार्धमनागममनिर्ममं ॥ पः प्रतोत्यपमुत्पादं ' इत्यादि ^ [४५ तदन्नानितोधाख्ष्टविशेषणविशिष्टःप्रतीत्यमृत्याद्; शाल्नामि- पियार्थः।
1) दय == १४ = 4४ (ल-4९88४8 2. 6): १४ (००४४ €अ ४6६८९०६ 18 फढपदा९
वमक 1 किण कछड्श्ण्छा [& ?. २. (णण कलालः 16 8810६ 468 6८ ४पी 6१). 2) 0४08 16 ई ०१३०६४१8 79 16 5९१०वा2 (नेय) ९७॥ 18 1नेक्पण 606 19
€0086 2 १6०0६ (ल) [नद्रुदयो € [प्रप्य १6 60०08४०० (वच ‰46004- १45०); 1 > [णाः (बकन 16 0०४ नवव ल्छढ १७ ९९५8 १९ ६९०९8 (7. 20, ४८४१. ©01. १ ४८०४, 1861}; 7४8 ति इइ? ४१०1०१०, 2. 2. 1. 19: "वुगन्णकन््नन पवमव 4/07 5 एकवा; 16 54११2१10 ५००8१8४6 © €न्लं १४७५ 16 ६५ ४6 ९४६ ४४ 060 €००१९०४16 णण १6४1867 16 ४०६४ ~ &. ०१01५. 0. 9, ००४6 2; 1०४४४६7४. 2. 6; © 1४ ४6०16 ५1४8७4०९ १९४ ११४६७ ०११५००१५ 45 (1 ४1} ४8. (23.8.5.) ४. 70).
3) 6९४46 8५०06 ४०१०९ 0808 18 र6ाश ० ४१6६४०८. ~ 1/४ 1८6०९ श्म च्म १०४।९०8७९) ४ ? ०42. ~ (दह ~+ भढ = (212. 00 06०६ 6्फृभ्रध # 1000883 8, 14. 1; ००४ (१५१५ दब; ९६.¶ ४ ०६१४१ 7४. 174. 1. ~ फा दक, 2 ०५॥1५. 9. 76४.
4) 1.8 8४६ ४ 7०४६४५8 7681068 60 ९५५ १४१ > तना ८८६८९४४ 6086106 16 एध ४83४४02 8; ४१९५ 1४ 8८076 ।0प्र९ व रक्त भ्ड्पाप््दधम, 16 7५0६१ 68४ 1986} 97 8016060४ ४8806 (प्र भए 6०. 80 ए. 16).
8) १०१५४ 18 ४8१. € ९९४४९ ४६४०९6 १४०8 8२ 92 7 8} 8188 त्६८४ (पि &०}1० 106), € ७८००४, 6०6 वप १28१2०४, 9.9.
6) परभष 1५0४ 2. 11. 18.
10
10
4 ्रत्ययपरीता नाम छ सर्वप्पञचोपशमशिवलतणौ ” नि्वीपौ शालस्य प्रयोजने निर्दिष्ट ते बन्दे वदतां वरं * इत्यनेन प्रणामः। |
इत्येष तावच्छरोकडयर्यश्चमुयायार्ः ॥
शवयवार्धस्तु विम्यते ' [7५). 8१]
(8)
निहदिर्नितेधः \ तपरभङ्गो निरोध इत्युच्यते । उत्पाद्नमुत्पादः ' घात्मावोन्मन्नन[मित्यर्घः] । उच्ित्तिरष्डेदः' प्रबन्धविच्ित्तिएि्यर्थः ! शातो नित्यः ' सर्वकाले स्य स्थाणारित्यर्थः। एकशापावथंेत्येकार्थो ऽभिनरर्धः ' न पृथगित्यर्थः । नानार्थो “मिन्नः ' पृथगित्यर्थः । ` ्रागतिरागमः ' विप्रकृष्टेशावस्थितानां सेनिकष्टेशागमनं । निर्गतिर्निगमः ' सनिकृष्ेशावस्थितानां विप्रकृष्टेशगमनं ¢
1) एणी 1078 ए. 8, उडप. 24 € (णा. 20 इड णा. 30. ~ (णण). ड ७१४. ए. (फ ९४0९7) ध€णः 4८४१. १७6 58९1110 1864) 2. 338. 10: . . . चव विका, १द- अप्पति) + . , वपदकषकाा , , , 20वकल०वकीष्वकीण) कववको१. , ,
2) १०९ 1009 11. 18
3-- 3) (68 €2 0116४008 8१९०४, १8०8 16 भक, 18 01868800 तष ०४.294 ४1४454019410244. -- ए णद 2. 11, 0. 1 ।
4) एर 7९887011 64०९०४९ 80इ 168 80पा८९७ 09४01९8 , कता हौ इद्र ४18, 1; 8; ^ पा १३६६१४१र९]8, 2. 1. परह ४६०8०६8) ४11, 2. 16. 9 ९६. -- ४०१९ 018707060६ ¢1० 1 8.१ ह 1४. 2. 839: -/८ 20४ ऽक्रच्यकणाद्ुक्ष् [11711111 कवु । प्वव्छुवक ककल भ्व्य छद्मा कपना; ९४ 00. ए. 424 786. - €. उ,४१1६ १४४7४ (उ८११)8४ (1. 8.) 2. -48; ` बण््णद० श्षिकाष्वष्डणः १५0 द70 000र्वाई | ‰व्व ९४८ 0कककद्ाकभा०कवक (गोनवन्दा ©. ~ नह 0181106४00 ए0णः 1५ ददद € 18 577४४. ~ 0. १०४४8४२४ 1. 18 (प. उ ४५०१)).
8) 188. 5६210 (51725104?) ।
6) ४०१९2 79. 887 & 811, ४४१.) 72 ००16 2: कवक. -- 8 97२8१३7८ 8. 12.15; त ढ8१7६, १३४}. 480. 4 (1१. 1,9.84).
-2४] प्रधमं प्रकरण $
तिर्मत्यधः' प्रतिः प्रार्थ; । उपसर्गवशेन घावर्धविपरिणामातै उपसर्गेण धावर््ो बलादन्यत्र नीयते । गङ्गातलिलमाधर्थे सागरेण यथाम्भसा ॥ " प्रतीत्यशब्दो ऽन्न ल्यबत्; प्राप्तावपे्ायां वर्तते । समुत्पर्वः पदिः प्राभावार्धं इति समुत्पा्शब्द्ः प्राडभावे वर्तते ॥ ततश हेतुप्रत्यययपेक्तो भावानामृत्पाद्ः प्रतीत्यसमुत्या- 5 दार्थः॥ शवपे तु बरुवते ' इतिर्गमने विनाशः, शतो माघव इत्या प्रतिवीप्मीर्थः । इत्येवं तदितात्तमित्यशब् व्युत्पा 'प्रति प्रति इत्यानां विनाणिनां समृत्यट् इतिं वयति)
` 1) ¶#. छने " " " " © 70४ ४प}. 4. 55, ९६ 1008 6.7; १,९. ~ एणा ०९ 6९४४९
का8८णडशण, क०णकृक्षा€द 4 910 0 877 ४10 ४.१.) 148. 4९ 19 8०6. 48. गि. 252 १44-- १४०१९ ४14०१०४० १६६४, दरा 3.2.1.8. 1891, 2.. 1357: ए 2 ९४६ १6४1 ग 878८6 18 € ४0 (€ 60081608 9 "6 07 ४४८८४8धाप 7808)
2) 7 म् पि गुगे म् 4 9901020. ४, १.. वण कुवम ५४ 7 कष्वङ्णधव््व ॥; 0.11.
8) ^ 90100. १, ₹. कथका क कोदकण्थफे , कषम (फक्क छकद्०- (8.0... 111.1 1111... 1 2.1...
4) & 81400 2०४४४०००, 20 पा. 4, 18 (घ. २४८०४).
8) 259. णा. 1. 9. ~ (188. भकलम).
6) 4 91149. ह. १. ववा सवयकाव च दव ००2४2 ४.
7) ^ ४४1१9. ४. ¶. १०१४८५४ 2१720 अवबध्य) 27०४ च दन. 8) ©. 2६१. ४. 4, 9.
9 तंस; ॐ. २8.9.1. 4. 90. ९६ & ०1१४६॥ ८167, 0५५. 8.२०८. ०ाक्द्ता० (24409).
10) ©९५४€ € धप०छ 09 70०६ 2१० ९४६ 6९116 १०९ ए ४7००४ 7008 ४ ४ 6०००४1६९; अ1€ € अय ०६€ एका 114 90109 ११११ ४10०८४१. (9). 284 9 1) ४४ क919- 80006 8 पध्दण्ी> 07118009 (क 888. 2. 281; ¶ढ7.2.67); 1०४7०१० ८६।०१४ 20.628 (1910. ताह८ड०0 १९6 1 दपः अण पिकक्षंणट); ११४८ 2" धं , एव्व कप्त) - एकदा णऽकादद ४ , शक्ताठल्कनशाण वकदरमम 54४८९00 [/20१920700 299 णण प्न शष्ठ . दकः कका हिक 0/0वुक , १५५ 0412४ ददार चमः 12170 शदो ५ 0६.2१.710, „ चव -०११५३३क५ ऽदकूेद्वक्ः „ क्कश्वडन्कुषव चम ~ पच . 3का१-११05010 ०/८ ऽवकवश्द/ दाव व$/०00 वह , ५४ -ण्च् ४ ~ थक कवक वकापद१द6 एतः चा कद्वदः प्व हय्लः कम कुन क्म वव , ४/दाका एवष 5कष्वरत/6१० दवन, 0 ककक्का्ल्दक्) , ककल कफनमाकषव ९६५ ५4द(/०८८ ०0 ददवकभक्कककभ्द-
6 प्रत्ययपरीज्नानाम .. ७
तेषां, प्रतीत्यपमृत्पादे वो" मित्तवो देशपिष्यामि ' यः प्रतीत्यतम्त्पाद श्यति
प धरे पष्यति ' इत्येवमादौ विषये वीप्तार्थस्य संभवात् समापपरद्वावाच्च स्याञ्यायती व्यत्पत्तिः । इ त [४] ' चतः प्रतीत्य व्रपाणि परते चलर्विक्ताने ' इत्येवमादौ विषये सत्ता ्गोकृताधविशेषे चतुः प्रतीत्येति प्रतीत्यशब्द् एकचतुरिन्द्ियकेतुकायाम-
£ प्येकवित्तानोत्यत्तावमीष्टाया कुतो वीप्र्थता ॥ पातयर्थस्वन ङ्गीकृतार्विशेषे ऽपि प्रती-
1) 7४. ठिपपय ; 088. एणव ए ७०. , , , -- 0९46 एश्पदि९ गिण्णेर (. , , च
४०५५४९११) = 887. पि. प्र. 1. 5. 2. 18. == ^ 90169. ॥. १, (2868 6) , , , . 27ब४व्5द- 11412409, €द (8९) ९76४० वनवा ४ वा १4 ।
2) 1.6 ९118१४1 ४88त्४78 {६ 2०१. 210 रा, 9). 1909, © 4०2०1०0. ४.१ 281४ 9; ~ *०१९द 2010४ ए €, ८66८068, 218 ०. 2) 16766 प०6 0णा€ अ्लहय०6; = 411 दतः (क्ा-११० 217011९0/10 ए०क्कषरवन{छवा ९दव् कण्ण्ल्वम : (लाक ०४य- 1०94, {7९00 ए0वद्ववण्वयठ 0057, उको पदक चद्व ९/०, फ0क्कढण्न, 1141245१ दद व, 52 कद्वद), ववद ४0 ` काक 26४६ 5
` एकवा 20 द्व ६/ भद्णद एव्व ६67 एबच््द.
(९४४८ णण] €8४ १०००६€ 17 63४९०8० 1008 2 छा. 16 त भइ 11 व; 70४ 18 86८0०१९ कक (४० - कोकः , , „ 5 एषवदौका)) व्ण). 1४१०६४४६ 91, 18 (01927९1), #8152271019931 88. 60 (प. 01469967; 2०१0). 8०0. 677), 889 - ¶१०६४४४ द. [ा, 120 (§ 13), & 82१7087 7282 78200 62, 8 (उ. २. (7. 8. 1890); [पवलण४06कप्0प वप्र क्का 1@ €# वप व्क द्वक ००६ 68६ 6९००००6 ए 2 2110108 पि. 1. 191. 1 ए.
3) [४08 68 त€प्रड 601९8, 16 ०४ 7४८ ५४ 086 त'0ण ९०70०86, &४ 0 दण [ण अपण्य णा 8९08 त8 षध; 1९ण ` (दन्ता) = (्वकस्क्ध)ो 6ाल्डप्रगा
€ध्7०1० 4९ एष्प्भ६ ए€ि 16 (द््ड १ प).
4) 0606 87द्ुपा€०४४६०० 4 00101. 1, १, (2840 5); ऋक च्यऽकततक ‰‰/ दण्द - वश द्व्यच 110तएव 17४5०१41 5 = ‰ ५४८१९ - भव द्व्या वः एकवण: त्व्) द्व शद्छ ००0बद४त6 कवोष्ण ४४2 व 08 एव्व) दव ऽद्वा कावना कव्ादकवक् सककद्छव$/ - कान्छुण्वरल्यः त्वतः क ककव तपत्यां 2१४८ ०८/१८ (वष्ाण्द्रपक्िप्वा ४४/09 120 04११०६९. (प९ ९७ 6९
` ए72{1क ४880 प्४१ 2१४8१६२४, ¶०९8 8०४ 1९8 ३४९8 १६७९8 (ततप्रह०(78: 2120 ह 01. १३०२१27 ए 38४79; 5४0९६१88 072४४ 28801089 28 त्त ६718) 0860168 १8०8 14.910. ४. १. € ०000868 - ४ण एलणाशध, ०००8३ 6888167003 06 19. 416 १४०8 प०९ ०0४6 7०४16 -- 88105 ध0णटणिं8 16 (कपा: (मष्क, कव्८ श्चरव्लणं ८०कनव१८ दण कवा्वश्क-0 आनोरव्मद च ८ ४०८१ (4 ४ 9149. 1. १, 2279 2).
8) 1.6 (70. प्रक्वणः ल्व शकष € क ४4. ~ पणणा९०868 1666०6९8; 8871. त. 1 2. 72 6४ भ्ण.) 1४. 88, 67. 86; 117०१४56. 96; ९४९.
= वुनिटेस पसप" कण, वाणा, -- 16 9९05 चठ ९९ कष
९8६ 60916 091 16016900, 2. 8, 5.
- २४] प्रधमं प्रकरणं ¶
त्यश्दे (7४. 9४] संभवति प्राप्य संभवः प्रतीत्य समुत्था इति । र्गीकृतार्घविशेषे ऽपि सेभवति + चतु प्रतीत्य चतुः प्राप्य चलतु पर्येति ” व्याव्यानात् । तद्धितीतत चेत्य शब्दे ' चतुः प्रतीत्य ब्पाणि चोत्यते चतुर्विक्ानं इत्यत्र प्रतीत्यशब्दस्याव्ययलामा- वात् पमासासद्रावाच्च विभक्तिग्रुतो सत्यां ' चतु प्रतीत्यं “ विन्तान पाणि च ! इति नि पा, स्यात् । न वैेतेवं। इत्यव्ययस्यैव ल्यबत्त्य व्युल्पततिरभ्युपेा॥ =
ष ' वीप्पार्ात्प्तरपतर्गस्य ' एतः प्राप्यर्थवात् ' समुत्याटशब्द्स्य च संभ ार्घव्ात , तास्तान् प्रत्ययान् प्रतोत्य समुतवोदः प्राप्य तेभव इत्येके । प्रति प्रति वि-
2) = नुम
9 मेगृ प्र गुङुगृमतयः परमम = नवश वमा
9 = रविप्रमुष 0५५ = पमाणे
4) = गठेमृप ग्थण़966 16 पमु 06 18 णिणार 6०६९०४१९, 1. 8. ~ प
&४{ 16 801-01880; 2111616 € शु76४60४6 ।लं 1४ रंणिशचं तण 0ता८€ तकडणश् ; १८5 ९68६ फ१ण- 0166 0४ ९०० (== ४१४),
8) = ४0 प्श््णेक्ष गि, [श्ण [4 2४९}; 7 जपमुष = 2270, 1600 ४ 70108 8088 788€0018918
6) 1/"उल्व्8 069४6 86 अं इ०फाणक्नोा6 4० ए 6४०१7३17 ४1 र 66 अशफा6. 8४8१४१1१ ९19 (0४११४), ४०४९४7१6 18 27810807 0 त्ा9 020 ४72४2१४५ (४०११०४१, 2106 इ णा, गि. 44 9-299 9) [षा€ 0०0४ ९8४ 6४ 16 066०४ 09889 6
(11 7,111.1. ४५४ 4९) (891. 459 3), ए06 ¶क1४76 1०६67९७४४०६९ ेमुसमः २८॥ पन्दुर वेषञपन [परेव यरे तम्र वेषदपे गुणो श्दमे त्रंभपरे य पपिर |" ४ नमु (= शमे
7) 9५४ = म् ३
8) = पिपगिप, क्वषर४९ण अतीलथ; 0णल-098 ०6 एरणय (०ा९भ००ता९ १४३ 90१४, ¢. 8१९००१४, 06...
9) गरेर
8 | प्रत्ययपरोत्ता नाम । ९४- नाशिनामुत्पाद्ः प्रतोत्यतमुत्पाद् इत्यन्ये । इति परव्याब्यानमनृश द्रषणमभिघत्ते। तस्य पपत्ानुबाद्ाकोशलमेव तावत्संभाव्यति ॥ किं कार्णं । यो कि प्रात्र प्रतीत्यशब्द" व्याचष्टे नासी प्रतिं वीप्पार्थे व्याचष्टे ' नाप्येतिं प्रत्यर्थ । किं तरि भ्रति प्रात्थ ' समुदितं च प्रतीत्यशबदं प्राप्तावेव वर्णयति । ।
5 = तेनेदानों प्ाप्यतभवःप्रतोत्यसमृतयाई^त्यव व्ुत्यादितेन प्रतीत्यसमुत्यादश- बेन पदि 1५४. ५] निवशेषसंभ विषयार्घपरमर्धो विवतितः ' तदा तां तां के- तुप्रत्यवाममों प्राप्य पेभवः प्रतीत्य समुत्पार् इत वीप्सासेबन्धः क्रियते । श्रथ वि-
[ऽेषपरामर्धः ' तदा चतुः प्राप्यं इपाणि चेतिन वोप्सायाः सेबन्थ इति ॥ एवं ताबद्- नृवादाकोशलमाचार्यस्य ॥ = ` ।
10 = दय वायक, विं शधुक्तमेतत् ^ चुः प्रतत्य बरपाणि चोत्यग्यते चतुर्वि. ज्ञानमिति ' घत्रार्बदपातेभवात् ५१ति यडक्तं द्रषणं तदपि नोपपय्यते । किं कारणं ।
1) 1.6 (0. ऋ: 13094521 004 ववे वता१.
2) निदु = 51001000. = 50१५0222.
8) अवश प, ए, ए. ठा = चद्वल्छाषकथतकव, ५१४१५७४ (4 ००३९). द. र. % जुग्रङेगयेडगृसय
8) ¶४. दसस => कण,
6--6) 04४०१०७ ०४०३ "19. |
¶-2) एष्या8, 0910. , ,. णछकष्णाः ककन $ककव्छकषफोकदद च च्छ व कमाण, णोत, नवन्छात्काकष्वाददं, , , ग9.; मो मेख मेषः गष मम गग मपसमेमम पञ नेशनुनमयपेसुय् भेपुपनि धन &४ 168 ०6068 16610768 १४०8 28 12 १४१११९1४ (ण. 460 8, ४१९५ 18 8४९०1९6 ¶४718.016 ग् ङुगुममुमम न == ¶"प्५), ०४ 66 98888 8४१४ 168 €> 011९8००४ शू०वप ४९8 एण 08०६ एषाः 0979117४} 0. 7, ०४. 6), 7166666 ४7 168 0०४8 गुमुमुम परमपदे; ९१९४४-४-176, 114678160€०४, ककव: 6९ (श76 0680४1६ 20 ह ए 2१; १९1६३,
2597);
फ णहणा [पणक6, एषा ०0 00भप्तणा कण्ड् दढ 6४० ०११४८ (7. 7, 8.1). ~ ©. 9.९.
-3१] | प्रघम प्रकृ | 9
कमन त्रो ्तमातः) सभव इति युह्वनुपादानिन प्रतिजञामात्रवात् ॥ खधायमभिघरायः स्यात् ' श्रद्रपिवादिक्तानस्य चतुषा प्राप्तिरस्ति ' ब्पिणामेव तत्परा्तिर्शनादिति । एतदपि न युक्तं ' प्राप्तफलो ऽथे भितः इत्यत्रापि प्रा्ययुपगमात् प्राप्यशब्दृस्य चा- पेत्यगन्दप्ीयलात् 'परात्यरवसयेव घचाधीर्यनागा्तुनेन प्रतीत्यशब्दस्य' तत्तत्प्राप्य पडत्यन [नोत्यने] तत्स्वभावतः५
इत्यभ्युपगमात् । [ततो)*द्रषणमपि नोपपग्यते ' इत्यपरे ॥
यच्चापि स्वमतं व्यवस्थापितं । किं तर ' स्मिन् सति इं भवति 'ध्रस्योत्या- राद इदमुत्पष्यत इति इेप्रत्ययतार्थः प्रतीत्यतमुत्यादार्थ इति । तदपि नोपपग्यत ' प्रती-
1) त 88., दी ०११०९०१९) [1/1 1.8 16८१९ €8४ एण8 १०९ वन्ण- ४००४९; तथ 18 ¶‰9. £ रि मेम ठेखयुपवि रगुसन्प सपम्" " = षका
वक्व (= 0वाकवश 2) चह भ्न 2) 79728 1९ व. छकटक दय म) गेम मस ॐ मग 9 ५
8) ०४6 १४०8 8 ४) 2 81४8821) 7 202४ 28 (क४"णष्व्दुन् {4१8} == १ ४- ४४०8६119 87113, 209 (० षा. 9. 2891)
% बविेसः वदिस दम | देस म एन"
8) == १०४8 2४४९8 , , . ©. 1४ 6४6 शिफचा९ 91. 10 & 19 796 €† }. 8, ००६५९ ¶
6) © 7888946 (60 ६४ किवम द्व च) इणो [पणते कलफर्छ 0908 8} 8 ? ४१7१6} 8 (णि. 489 5) 1४ फी7886 &४६€ 8इण7४ 2. 8, ००४८९ ¶.
7--7) ६९४४6 गि णा& 68६ ९०11< ¶०९ ००४४ 18008 १2०8 16 (ह 118६8 7928. (09768 2400 दष); वव द्वकव = [्चकवडक्द्दन्न] 2 ववद शकक [४०द् 5दक9४ 5 वका+ 5वढ, वका ए7तर्, ०5४०४द्दट्द चदव {४/८ ], &०द ध्वना ०९१ सवक कशल... . . . 1.९8 71018 € का€० ७९8 तग 1€ 9. 15 ऋ४वृ्कछौ 808 18 कका 4 0014). 1८. १. 2819 2, ~ प्याह ९७६ १०४००६९ एण्ड ९००1666 वकष 21 21 ह ए ४8६४ 1. 285. 7: ‰८द् स्वकः भाष्य ॐव, पववत ठेककश्य; ४1090 08010, 8 वदा १ एफवस्व; १११८९४० ४क्वदद शवक, १११कद्क४वदट; #११व७%व १४+0दद्व १९ १५५7४ ४ 2४ , वण्वङ्दमक्न्व्त्। कचच्द्त . . , ^+ ९९ प॑ 8€ इप्) ०७९ 00८8160६ 21101028 प. 1. 68. 96.
1.९5 €काादकमा8, 4 ) 0149. 1६. २. 2849 € 285, 8० 19६67९9७४०६९8.
०१९४ 80887 8०१16. {--307. 9: ववीद्कुत्क। वक१वरक११९।0 ‰दव व 54 १ {१दत‰/व{क १८४ . ९612 21 वक्वदवकछ्व भ्वकाणवङ्वुकनाष्व्व्प$वत्, लछम ०१०० ४ ० -~ ©. ००११०१५. 0. ¶1. 27; ९४ न-4९७8००8 णि. 15 ४ 1०४. € 44 (प्रा. 15)
8) वभ टेम प्दवमेयषम ५. ४9२. आ. 31494; 8०4) 16. ००९ #
949. 19; 00110978, 3. १०५. ध्वकवलल्वल; 8४००६१५ 2.1. 25; 5३०१०१३7. 8 31. 1. (४५4. ४३६०४, 1901, ००१८ 135).
|, कै
10 | प्रत्ययपरोत्ता नाम [8५- त्यसमुत्पारशन्द्योः प्रत्येकमर्धविशेषानमिधानात * तद्युत्पादृस्य [7 4४] च विवक्ति-
(4) तत्नात् ।
्रधापि उषं परतीत्यतमुत्याशन्दमम्युेत्य म्रपयेतिलकादिवदेवमुचयते । तदपि नोपपन्न श्रवयवाधानुगतत्यैव प्रतीत्यसमुत्यादस्य श्राचापेण ' ह १ तत्तत्प्राच्य यडत्यननं नोत्यत्रे तत्स्वभावतः ॥ इत्यभ्य॒पगमात् । खथ ! | ` | परस्मिन् सतीदं भवति स्वे टीर्घ यथा पतति ' इति व्याव्यायानेन ननु तदेवाभ्युषणतं भवति , करस्व प्रतीत्य स्व प्रप्य कस्वमपे- त्य दीर्वे भवतीति ' ततश्च यदेव [8१] दूष्यते तदेवाभ्युपगम्यत् इति न युव्यते ॥ 40~ सत्यलं प्रसङ्गेन ॥
तदेवं कतप्रत्येयपित्तं भावानामत्यादं परिरौपयता भगवता शङेतेकरेतुवि षमकतुरपमूततं स्वपरोभयकृतलै च भावानां निषदे भवति ' तनिषेधाच्च सांवृतानां पदानां पधावस्थितं सांवतं स्वद्भयमुदधावितं भवति । स एवेदानीं पांवृतः प्रतीत्यतमु-
४ ०५. णरणटणण्ः; ग. वुहुदुवम दपि
2) प ईगुम०म £| तइ १४०९४) 8. १०५. #प्दछ; ०0०86 > यकप &240 (४. १०५. $थ 8). -- ¶ 27 ह 88317208; ए. 348.
9 गप. यमम पेषेगृषि. - © २5०. 7. 1. 44.
4) 1/6 गभ. 1६. निचडथ्के - कक) कवकक्यकः किक. - - -- (णण). 182६8१8 ४६४ 59. 9; प ४३त४०६४8 १. 1. 39, 1. 1. 4
6) ८०. १18०१४1 १६६ ३, उषा, धत. एः स 87760, एषतो, 2. 169 ~ ^ ४४1१४. 1. *. (2819 7); -#० ($+ = , कवक्वर्माथयल्दवक . , शक्वदकापनर्छ्म (== क्वान) कके छकाप्क$वः€
6) इणां भकान्णिं ९६ अककण, €, कप उष. 8 € अण; 020. 8. 95; 5०११५. ४. 1, 10९ 8. १०९.; 118. 264. 8; प 258111९1, 298; ए ९१०, क्ण, 197; 60110 ९78, 8. २०८६. कका, ~ (1918२ 571. 217 (15 अद्दोकश्णा> अता उष. 8 68४ 6४6 218, (फा. 1. 10); -ए80ढ 0 ४६ (€. 1891) 372. 5; ए ९4. ६212४६४7 986. ४; & ६० ६६.४६१ ४९1 ९ ९} ४ (60. 1873) 84. 10; 8. 7.92. 15. ५4 &६ 2 1. 167.
-8४] प्रथमं प्रकरणं 11
त्याट्, ' स्वभावेनानुत्यत्नव्ाद् घ्रा्य्ञानापेत्तया नाप्मिन्निरोधो विगते ' यावत्राप्मिन्नि- गमो विग्यते ' इत्यनिरोधादिभिर्टाभिर्विशेषणीर्विशिष्यते [7,0.5५ । पथा च निरोधा- ट्योभ सत्ति प्रतीत्यसमुत्पा्स्य तथा सकलशाल्रेण प्रतिपा पिष्यति । श्नत्तविरोषणतेभवे ऽपि प्रतीत्यसमुत्पादस्य ' श्ष्टानामेवोपादानमेषां प्राधान्येन विवादाङ्गमूतवात् ॥ 5 पयावस्थितप्रतीत्यमृत्याददर्षने सति प्रा्णामभिेषीदिललणप्य परप्॑चस्य स- ्वधोपमात , प्रपञ्चानामुषशमो ऽप्मितनिति ' प एव प्रतीत्यतमत्पाद्ः प्रपञ्चोपशम इत्यु- च्यते ॥ चित्तवे्तौनां च तस्मिनप्रवृत्ौ ततानतेयव्यवराएनिवृत्त नातित्ररामरणादिनिरव- शेषोपद्रवर्कितवरात् \ शिवः ॥ 10 * यथाभिरितविशेषणत्य प्रतत्यसम्त्पादृस्य देणनाक्रिपया रेप्सिततमबरात् क- मणा निर्देशः एल धनिरोधमनुत्पाद्मनच्देदमणाग्ते । घनेकार्थमनानार्थमनागममनिर्गमे ॥ यः प्रतोत्यतमुत्पाट् प्रपञ्चोपशमं शिवं । 16 देषयामात सेब॒दस्तं बन्दे वद्तां बरं ॥
1) 1५ 86 019660६ १४०8 1९ (9. 168 €> 116४४008 0000668 198 08६ 2. 4, 5-13.
2) 08168 110. (एएनवानुन्छवाप्साव्पवकमष्व्द$ ४2010620 541४०26 - 21924.
8) 2१7००१८५, 2104८०४, ¢. 008 इ. 6, उणा. 9.
4) ऽप्य 6९8 १९४३ ६९768 ९६ [€णाः १४]6पा' १९८) ०4४९, €. 1072 18} :)} 1016 (५11, 6०१६५5५); ^ 91109. 1८, इ; (7 ए] 18017 2, ए०पवतशा€ 90098, }. 5 ५॥ 10. ऽ. 27-
2९०016९); 827 ४808714. 8. 20. 9; तद 8०1०१४१. 14. 4; &०४०१8४९171 0 872). 8. 1. 2. 91.
$) & ९.8४. 1 4. 49. ~ ¶४. भिसः पमे
6) 7४. पुरबोस 39 | निगुगु पमष य शै मरप| रप्
12 ` प्रत्ययपरीत्तानाम 9४- योयवितिप्रतत्यपमुत्पादावगक चच तथागतस्येवकत्याविपरीतार्थवादिवं (79. ६४] पश्यन् सर्वपरप्रवादां् बा[५भलप्रलापानिवावेत्य ' घरतोव प्रसादानुगत भ्ाचार्यो भूयो भगवत्तं विशेषयति ' वदतां वमिति ॥ सरन्न च निरोधस्य पूर्वे प्रतिषेधः ' उत्याद्निरोधयोः पीरवीपयावत्यायाः ति्यभावे 5 ग्योतपितुं । व्यति कि ` | पूव ब्रातिपदि भवेन् नरमदणम्त्तर। नि््ररामरणा ातिभवेत् त्रायेत चामृतः ॥ इतिं । । ` तप्मान्नायै नियमो पत्पूवमुत्यादेन भवितव्ये पशातिरोधेनेति॥ इ्दानीमनिर- धादिवििष्टप्रतीत्यसमत्याद्प्रतिपियाट्यिषया ' उत्यदृप्रतिषेधेन निरोधादिप्रतिषेध- 10 सौकर्य मन्यमान घ्ाचार्ः प्रयममेवोत्याप्रतिषेधमाएभते । उत्पादो डि परः परिकल्प्यमानः स्वतो वा परिकल्प्येत ' परत उभयतो ऽेतु- तो वा परिकल्प्येत ¢पर्वधा च नोपपग्चत इति नित्याद् " न स्वतो नापि परतो न दाभ्यां नाप्यकेतुतः। उत्पत नातु विग्यते भावाः क्रचन के चन ॥९
र
पेम दगमेमप[तिरपमेसम तलमेमय|| पथम ससिभम| रुष =
प (कः मः सद्म | हगृसपमेसनसकुस र दसस श | समप देवि छः व्व | १५. दुगुभसुदपेड | 2 ४०५ = प रवते
9) ता. 8. प. णद गृष्म् -- णथञ ग. मुकर, परः प
- न्यु #) 70. यं वधाद तनिष्ठा एव्व तककाकावम, 2०6. 8) 1.6 ४606 ०6606 6 त18५०890 ण 8 शा. 1
9 7४. पदुषुस मप्र ॥ | भेम् | पुषप्िस मप् वु भेम
-49] प्रथमं प्रकरण 13
तत्र ब्ाविति कदा चिदित्ययः। कचनणब्द् ्ाधार्वचनः ' कचिच्छन्द्प्ायः। किचनशब्द् घ्रायेयवचनः ' केचिच्डुन्दपर्यापेः] ॥ ततचचेवं संबन्धः , तैव स्वत उत्यत्ा जातु विग्यत्ते भावाः क चन के चन । एवं प्रतिन्नात्रयमपि योब्यं ॥
नन् च , नेव स्वत उत्पन्ना ' इत्यवधार्यमाणे परत उत्पन्ना इत्यनिष्टं प्राप्रोति । न प्राप्तोति, प्रसन्य्रनिनेयस्य विव्तितव्ात् (79. 6°] पतो ऽप्युत्याट्स्य प्रतिषेत्स्य- - मानबात् । पया चोपपतया स्वत उत्पादो न सेमवति * सा
तस्मादि तस्ये भवने न गुणों ऽत्ति कथित् ` बातत्य न्म पुनरेव च तरेवःयुक्तै† इत्यादिना मध्यमकावतारादिदरिणावसेया ॥
मव पतव गुरु गुमः | ज्व वमप कमण] ~ 0, न = ©४6 8०४1५. 2. 12. 249. + 847. 3, 368. 3 &४ 8०४) ह 81४88. 17. 8, ०६ 19 ५९७6 ७७४ 1०णडुषलफटण €१९ 07९. 11 ९ वणा ९डडकण 0९ दण्णकृक्दः 18 व18८णष्डा० वैण त इ इर ४-8प्६त३
४. 1. 22: कायदा @कद्ष्ण्कनव द्वमव्कव्यव्ददकवकाद्वणव; तइ ०8० - 9181 1.4.
४ 7४. गुरयुगु ठेस कु दरेमपरि गदे | सुगु उेषपमे न मसमवुन्मम | 42५40200, (०फणा९छ॑97€ 0९ क इ ड ००४ (0० इरा, गा. 84-119; गुप सेसघपषे सृ्मर्यमबुरप्पन द् |
9 7». मेषुन.सगुणृ यप पहपुयन रुप; ५ शा. ट. ए, +.१०८९. ० ए (१०- भ्कक्ितकः 270 858नवठ, २४६. 20 एद. 1. 4. 57); - पत इ ४1०९४. 8, १०६.) ऋवविकावः 09746 {४५१7227 दक @/4 धदव 0740 कदमो, उका ऽका दफौ दणक (तन्व 0 #व = व्ल);
&. 78788. }. 369; 8020४४1 299. 9; तह ४१. ६इ४}. 282. 19, 496. 11, 511. 41; 9. ४६. 199.19; = ०68णा 8828 7198. -- 01676 कदटुपराशाम 0४०8 ए 03९४१1१९ ४
(७.५७५9;दृगुप नेमे मेदवपमुगुपम दूर पदप | गुगुय पारकि |
8) = ४१87४४११ ए, 8. ~ एगु€य 1४०७६००, 1900, 9. 280.
14 भरत्ययपरौत्ता नाम [५५--
घाचार्बुदपौलितत्वाक् । न स्वत उत्यग्यतते भावाः! तडत्पादतेय्यीत् , घतिप्र पङ्करोषाच्च।न कि स्वात्मना [4४] विश्चमानानां पदाथानां पुनहत्पार प्रयोनमत्ति \ श्रथ सन्नपि तायेत ' न कदा चिन्न त्रायेत ' उति
>~ (4) ~ (5) न | _ (6) श्रत्रके द षणमा्ः ' तदयुक्तं ' चेतुदृष्टात्तानमिधानात् ' परोक्तदोषापरिराराचच।
1) 1.8 800872४ 8१४६7 06 8०११987 दह11४8 (000; 68४०78४ द्म 08778818 16क€व6 पण गलप्ल्ाद्प्रभा, ¶ इद. 2. 137) 86 धा९णा€ १2०४ 1 22 0}0 पय, 100 उणा णि. 1786--317. ¶ 180 ४118 6084816 ००९ 76] १०६८०1९ €0४९ €€ 006९ € © ४०१727८४ @. 148). 1.6 29888 &€ प्कूरण्वणे॥ 1लं 8१६८६816 16दलणचय४ 00 ५६४१6 06 8०११९118 (‰); 1828 1. 6): ॐ ल्य ॥6€ कदावडवकाद्द्यं ००४
2१९0118 .410001दाव४्वद्षद्ः ९४ 19 176 ९ 2.41 स् नुनपसि गोफ ९ निमुर् २ -- “9 एप € १6 ८९8 वल एभपका॥68 ९8६ 60फीता€€ कष 8 02 ए 8१1१९1६8 (91.48) 4) पण एनूणवण४ एणाः 16 दमण ९, 16 उभो8णा06€ा6०६ 06 8०११०२३ ३11४२ निस निस
गुदम् मै (== ८०११४ 87811४३) सुनि प ममम 1 च भग म् यि (== श्दवण्ो) ममे |" प्र | रेव बुगुममेवुन नुक | वेच कष स्मितम् [रग शगु मवे | कूमर् 114. | 9) 2088. १०४३६. -- 2050 १४०१०९७ १2०8 1१9.
99. पुर्सरवद्मस पुणु स्प भेदुम् | भुमगुणृ शरैय सुषमेमु ह %२ ् ^. (= ऋ म~ मे ६ सुभि वननु यान <न, | गरम [| भर ग्पगुषर्ः पिवद्कमसनमु पनश्ैपत पुरुप मयुम्| सदे एस ॐग गुम (^ मग पन, ०नयुन |
00णफष्ः९ 12 केकतपडणा 06 18 8१४१8 पकृ, 0908 04.116. 1१. ए. १41, 8४) 281४2881 &7203 € 4 20114}. (६. ₹. (91. 2829): भ कादड व षः ४६व६द४ पमएककााक्ककङ्ुका ककव, णवडवष्न्क्ः च्छट १११४८ 15८ 2५१4 धकाः ४4 व४८८ ४८४ ११510725 407
4} €४€ == ए ४8१2१1१6} 2-११2१४५.
| र भवि प =
9) 7. पुत्रमदधगुष युर स्पे मुदुसनिङठेर स | गुषुशेम
शुषतः केष मपसमपडधरर् | नवनपनयुन्पनेः छगु पेमपनेदिर |
प्षरेदुबयस प्रस शुपकय ८" तिद्धेस पङ्गु परभ मदम्
- 4) प्रधमं प्रकरणं ` 18 प्रङ्वाकाताचच प्रकृतार्धविपर्ययेण विपताधासाध्यतडर्मव्यक्तो धरस्माइत्पन्ाश्रावा अन्मपाफल्यात् ' न्मनिरोधाचेति ककी्तविरोधः स्यात् ॥ `
पर्वमेतदूषणमवुव्यमाने वयै पश्यामः । कथं कला , तत्र पत्तावडक्तं केत््टात्तान- मिधानादिति तद्युक्तं । किं काणं ' यसमात्पर्ः स्वत उत्यत्तिमभ्युपगच्छ विमानस्य ` पुनरृत परमोत“ पृच्छ्यते । स्वत इति केतुमेन तदेव चोत्यग्चत इति , न च विग्य- मानस्य पुनरत्यत्त प्रयो्नं ष्याम घनवस्थां च पश्यामः । न च लयोत्यत्नस्य पुनह- त्पाट् इष्यते ऽनावस्या] चाप्यनि्ेति ! तस्मानिहूयपत्तिक एव तदद्ः स्वाभयुपगम विहदशेति 1 [7,४. 6४} किं [तन्मात्रेण] चोदिते परो नाभयुपैति पतो हेतुदष्टात्तोपादा नताफल्यं स्यात् । चथ स्वाभयुपगमविरोधचोद्नयापि ोधचो हो न निवर्तते ' तदापि निलन्न तवा केतुदष्टात्ताभ्यामपि मैव निवर्तत । न चोन्मत्तकेन सहास्माकं विवाद् इति ॥
पस | दुनसर्तोद्मस गुधुमृत्यस जीप र्युपत्र| (1 रिपुस गुररः
ये पुमु युय गुर | जप सुष(ोपणतुपननयुन्पनिःठेर् | युप पतिम ९६.
तगुगि् छुप् | ~ पतर 0७०७ ए0ढरणर०८०,- प्रुगृसपसपतिद्ु '
| [फिकका6 ्पृण्भल्णतः अश्ना; 7054925]. (कणकृष्चलड 1९8 7988268 79791168, 197४ 9]. 10. |
6) 2098. गद. -- 1६670086 २ ९९४९ विटफपटेक€ - ०6८०४, 18. 3.
1) ¶19.; = ण्य. -- एल्)००8८ > ९९४४८ गुश्ट््णण.
2) 2188. (शुवद्0, धक. -- ऋ४६०४-245 ~ ०४९.
3) 188. पस0.
4) (19. == 9 वदा, ५०; १९ 0676 1702 24 145; ०४१३80१ ४१1969; + ~ भा त्ठवोद्ध ०96 ल्भा्टगृणाते [४8 २५ ग. ७1१९-४ पणणण्ड(भि-१...: 12१४१ - * ९1४ 1६ ४1,"4-1+0 ; एलण्यं ९९ 24 -7द (ववर्$).
8) ¶9. == भध.
6-6) 2१०१०९८ १४०४ (१
¶) ० ६ण्वदणण्ट्कया. - 158. ईैव्वव्््दन्. -- 17 (9) र ॥ प] न
8} (क्का). क ४ ००4८; एषाम, ©916. क्षा ४ ००९. - 119 (म सम]
४ गुम पसः
9) 20898. श्दककल०्वकष्वक्ट, €. 100४ 11. 14, 13. 5. - + क९क6 १०४० ०0 [ण 067०0६४५ १४१ द € ल०्वप्रकवा 9 . , >.
16 ्रत्ययपरीता नाम ऋ {1} नश [ र ॐ प्रवेशन ४ तस्मात् प्रिपानमानतामेवात्मन ग्राचार्थः प्रकटयति ' शरस्याने ऽच्यनमानं प्रवेपन ।
न च माध्यामकस्य स्वतः स्वतन्नमनमानं कत् यक्तं पत्नात्तरम्यपगमाभावात् । तथोक्त
(4) मार्पटेवेन
सरसत्सद्सं्ेति.यस्य पत्ती न विग्यते । 5 उपालम्भशिरेणापि तस्य वक्ते न शक्यते ॥ वियरेव्यावतन्यां चोक्तो ' [5०] | यटि का चन प्रतिज्ञा स्यान्मे तत एव मे भवेदोषः। नास्ति चरम प्रतिज्ञा तस्मात्रैवास्ति मे दोषः॥ यदि किं चिडपलमेयं प्रवर्तयेयं निवर्तयेयं वा । 10 परत्यतादिभिरधेष्तद्भावान्मे ऽनपालम्भः ॥ इति । या वैवं स्वतेलञानुमानानमिधापिलं माध्यमिकस्य तदा कृतो ' नाध्यात्मिकान्धा- यतनानि स्वत उत्तरानि \ इति स्वतन्ना प्रतिज्ञा पप्यां सांण्याः प्रत्यवस्थात्यत्ते [1५४
% -----------
¢ 4 ल € 1) 2088. कक््चतीठ ११४००. -- गप वेगि पौ 9) १०४९८४८० 94 ८2. -- 19. ९5? भनम् 9 801४: चके) एम [, .1 हसो78प्त्छ€) 3) ४०१०९ ०४०8 10. &. 1908 16.11, 18. 5.
4) 6१६५१ ९४१४6 शा. 25 (7४०१०४7, 1४० इरा, 9. 189) ~ ग्भ 7 ०३६००, 1900, 9, ए. 240
8) 8871668 29 & 80 (¶ &7१}06 07, 00 इषा, णि. 828), गणश 786००) तल, 2. 214. == 2 # 0110, 1951. ~ किर ^ १.
6) 188. ६१९९९७८. 7) 2188. १८. (01६८४००8 १९ #. प्र. उ ४९०१)). , 8) 209. 8. देशा; (60114678, 8 २०८. (नव गप द्दुणकष्डष, ऽनयद ६८१0१२). । 9 79. मुपि गुरसरुमुपपषुगोस ॐरपष्गुषपपयेपुयन्पन्युनप ९५४ ` 07४४17४1 586 ]काहुण्णशाधडधण 46 80२४१११९} 8; 000 1 गलु०तेणं 8०08 0808 80 ९४४९016; |
-5°] प्रथमं प्रकरणं `"
7} ' को ऽप प्रतित्नार्धः ' किं कायत्मकात् स्वत उत क़ णात्मकादिति । किं चातः ' कारयात्मकाचचेत् पिदसाधनं ¡ काएणात्मकाञचद् विहदार्थता ' कारणात्मना विग्यमानत्यैव
(*) सदेन सुपति सगु द्यु मे दुलभम्, बृरो्गोमकेपुुमस कपुगुजिस' जजुप' मेपयम सने | एमिपनिदर | वयेन्स्ः मेमपएदुवेम
पवर | ® णि गगरे (५. 48४) वुमद्धवृष प्रसुय्पु गे मेममुमुपरि' ठुंगुषप्मस
शगु मुम गुम सगसफम मरम् देम् | मेमि दुष्यासा हगुपमेदपस' तमः मूर सुमसरुम्न दस्य मेमुर | 0) ¦ निगु, गुर्स स्म् गु विस [र सग] ~+ पन्ये पुम परुब्प र्दन | (= ‰& ४५११ वकी 1447. -- 1०84९: 50१४45०0 ठ प्वस्दद्द च्छ); &६ दणड ७ेरेमु पच्य मपरमुत [पगृ जप इम गुषुगुपभे न |जुरि षु | फिपुयमम पर वुगृपुरुदुमु सुयुययस् युन सजय मेनि | मेम | पथ्रुपण्ेपु मैः मुमयनिमर्कम्िपुुर दवय परस सुपु पमेदेर् पानः रेष प भेषु | 8०४ 1197०९०४ १ ८०१०१४० ४7३1148 10४0्वण कभ ^ (१६, ॥.
(१०१९४ . 14, 11६76 8 १९ 18 ००16 1) ` 1» ४86 (४--9) ९8 कशण्वण € एकः 6874 12117४1 1002 7. 25. 9-- 26.1 (-४) = ०८1४८ ४ब्द द दककष्वा १2 06 "च , ८९४ . चफदण्डद ९४० 0 (ण्व काक [5९]. अवाशवाद ९2द05ब१. == 1.6 छप ए०- ` 0०86, श्ध्वद्काण्ककण) 21686 288 060) 22166 ¶४०१ ०९ प्०ा्€ 898 वृणी क भ णर - ४४०४ € &€ €प ४ 116 भ्त तप गभ [8१४६६ प ४००४]. -- 4 ९९४९ ०0८०, ०0४३ 76700008; 11 ४" 8 788 [06700880 वण] पार 209 [तप ४6प] > 16 भ्व 8९ ०९ [ग१४६४] 2४7 श्रा ४6 १6 18 700 € 86066 [१९ ५९ गंएष्38]: व००८ 7 ० ४ 88 र३66 € €€ षण . 7९४06 16 9८58 [इव कृ दध्णादणफ स ४४१01] ९४ ४०४९ ९०86 [6१४६४०१९] €--€£) == #@ {दव एदद्ाकी ४) 5ण्व्द ४ कद्दतव5९ वद, द्क्ावकद्कष्वदद््व १८४ दण्ष्ठ- 1129... 1.8.19 1.11 (त 8.1 11... १८दव ०4 ०0840. == 141 97्००९०६४्० १९४ दप 88 ९8६ 0286; 67 19 06पड. 1008 ६०४ प्रा 76४६ ¶०९ 18 €01086 ०8886 56116 610९, ‰ ती7€ १०७ 18 086 ०१६ ४2781 हा 82४) ९८४६ फलः 4०6 ०४88९ € 807 ०प वद्णत्ण [6४ 16 धद) ०९४ णां तिलप्रपपठ ४0 पद्य फ2) 01 ताला वेण एदा] दपडण ४ कला लवम्ुक्ण्ययै 1 68६ {60०५0४91
1) 2088. क वक्व रवव . , , (द्ध्व च | , , , ` कव्व व्य. . . ११4 ० . . , 7. टः सुगु भिस ठेसयुप >प॒सःयुतिः गु कपु सम न
% 11 € लक्षः १०९ 19 ९086 ०,७७६ 325 700४6 वःनाल९-णरटि € ६४०६ १०९ छण १९. ~ & 21. 9. ~ (ण). [क्व द्पा ४५00 त इ इ 7 १४३००१३४, 197. 10.
2
18 प्रत्ययपरीत्ता नाम 8*- सवस्योत्पत्तिमत उत्पादादिरति) कतो ऽप्माके विग्यमानलादिति केतुर्यस्य {सिदसाधन] विषदार्घता [वा] स्यात् ' यस्य सिदसाघनस्य यस्याश्च विर्ढार्घतायाः परिकारार्धे यनन करिष्यामः । तप्मात्यरोक्तरोषााप्रक्गदेव तत्परा श्राचार्यबह्पालितेन न) ब- णानीयः ॥ | 8 श्रधापि म्यात् ' माध्यमिकानां पततरंत॒दष्टात्तानामपिदेः स्वतन्लानुमानानभिघायि- ब्ात्स्वत उत्पत्तप्रतिषेधप्रतिञातीरवसाधने मा भूढभयतिदेन वानुमानेन पप्रतिक्षीनि- रकरण \ पा प्रतिज्ञायस्तु स्वत एवानुमानविरोधचोदनयां स्वत एव पतकेतुदष्टत्तदो- रितिः पकादििर्मवितव्यम् ॥ तत तद्नभिधानात् तदोषापरिकाराज्च स एव
दोष इति ॥
म्प पर मयकय म जुर्" एरय विं कपे २.८ -- 80 ए) ४९2: 86-08-69 , . . 100-08-128. -- (षा ४0०६8 168 ९0868
वणां एतलणला 7888766, एला€ण६ 27882066 [0,6]]९8-क7९७], एणा कपण वृषणला९्ह ९३8४९०६ 80४8 1४ णि०0९€ 0€ ०३०8९. -- 1४ १००१1€ ०४९८४०१ १९ 58241157 वा 2१0 € € ९११५०५12 {1क ठ €8४ € 81166 6-06880०8 7. 21. 11.
2) श्छुकक््वध्टः ९8६४ 0208 1,1770017686 तण (०0६ ४ताललणाः 16 0९६0 06 ९९४४९ अथ्यवरष् तव क हत 8711128: १८ दकोशतकाक्ल्काा , . . (16. 11, 26. 1).
9 7. सुपवम मे' रयु
4 7४. हुदुपनयुप' म पष | :
४) 001९6०४, ` 116६8 5--9,
| 6) 16 119. 1४ 7 कमदष्ि, 001 088 7१८,
7 गुम दमस्य र्गो देस सुपुपगुयस' तगुयिय शपुर म् युर्गुसयस मा, (11718117, 8, 1.1.19. 11 1017
8) @& ४ 2. 21. 18, -- ए९०४-६॥९; (ल्०वषद्+ 5९०८, , ,
9) "भद (0. ~ 088; भकवनमान्छमनपण्द, -- 5०1० (र< फरुपयो == ॐ
- 46 भण १6 २०९.
-5४] प्रधमं प्रकरणं 19
१ भ क -
च्यते तरतदेवं । किं कारणम् यप्माब्चो दि पमे प्रतिन्नानीति \ तेन स्वानेश्चयव- टन्येषां निश्चयोत्पाद्नेच्छया पयोपपत््याप्मवर्थो ऽधिगतः तैवोपपत्ति परस्मायुषदेष्व्या ए. तस्मादेष तावत्यापः " यत्पर तैव स्वायुपगतप्रतिज्ञातार्वस्ाधनमुपादयं [5४] । न चायं परं प्रति [रेत् । केतु्टात्तातेमवार्तश्रतित्तनसारतवेव केवलं स्वप्रति ातर्थताधनमु- पादत्त ^‰ति निहपयत्तिकयत्ताः युपगमात् स्वात्मानमेवायं केवलं विवान् न शक्रोति | परेषां निश्यमाधातुमिति इ्मेवास्य स्यष्टत्दषणं यड़त स्वप्रतिन्नाता्धताघनाताम- यमिति किमत्रानुमाननाोदावनया प्रयोत्ननम् ॥
धवाप्यवष्य स्वतो ऽनुमानविरोधदोष उद्वावनोपः ॥
1) 0086, 12०८8 1-7. 2) 2188. 20 वडल्व ५८०. - 1119. ५४ -- (धणाभय€ः प २१४४०१३१, 198. 18, &€€ भ -4€880प8 2. 28. ०. 3, 1. 11. ^ ।
ॐ) (0. पर्यर्ते = एणु९०५५०४, 1 उका). -- एम भ-१९३००४, 2.28, ०.3.
9 = वदेमि गुव गुत्वृष छर म पत् | गग सुर" युपे भेदुरिेन, ननौ मम्पररिरि सुमु ्णृे ्ैपपन्ञपप ठ [रस विस्पते. हेष सुतपुरस्पः दपरदेगु के क्पुमुयः पमु |
40 818 12 20678 81809 0"€21816 ४8 € €€ वृषणं २९६१7१९ 1४६८० : 1720१6788176) पणं अिप्९, वम( पणः, -- ००0 7४8 16 11 ह 403 ४711४; 6६ किप॑6 0९ एषदकट्णलः
भाष्टप 60४ € €ढलका]६, 19 ए€्णर€ वप व्कहलाप्र १6 88 एगृनभप्तमय ०61४ 0६ १०९ 800 ०0 81024100 > 8" २४६४606, 7 ४१०४6 णण ॐनम5द, . .
हो श. मरुग == 090१1409, ०2220. 6) 1088. 5ण्दवमपवि्ाद्ावरद्ाकववर८य = क्छवदका = उध्वकावद्धक्तापोकष् वा
7 `" हेम सुपपणृपस = काका,
8) 1⁄6 {9. $ण्ं € 064 € 14 कणकापदव (बे " "3 घ. 1 प४ 9. 21. 9), ५५
पुषं गछ कप फट6ः यढ ठकणरकालमा णोादाछय+6 ३ प्रजाह पकोष्जाकलया९६०. -- (6लं चश ८०९ गछफक्नपू्€ वप व्ण क्वाल््छणः.
1
` ्त्ययपरत्ना नाम ` छण सो ऽवयुदावित एवाचार्बुहपालिते । [कथमिति चेत्] न स्वत उत्यते भा- वाः, तडत्याद्वैयथ्यादिति वचनात् । भरने हि तटत्यनेन स्वात्मनां विश्वमानस्य परमशः। [कप्मारिति चेत् ^] तथा हि तत्य [पैपरङेणक्त।वाववस्यैतदिवरणवाकं ! दि स्वात्मना विश्वमानानां पनहत्याद् व्रयोत्रनमिति । चनेन च वाक्येन प्राध्यप्ताधनध मानगतत्य परप्रपिदस्य पाधम्यदृष्टात्तप्योपादानम् । तन्न स्वात्मना विग्बमानत्पेत्यनेन. केतुपदामशः। उत्पाट्वेपध्यादित्यनेन साध्यधमपहमशः॥
तत्र यथानित्यः शब्द् कृतकरलीत् । कृतकमनित्ये दष्ट, पथा घटः , तथा च कृ तकः शब्द् ' तस्मात्कृतकवाट्नित्य इति कृतकत्रमन्नोपनयाभिव्यक्तो रेतः।
1) & ण }. 14.1 | प ~ ४ न © 2) 2188. व. ४ 5श्यव च ०१८१2... ब. देष दुषु रमम निप णे न्लौ ग्पगु कर " " " व८-वनक न्णादशृणपतं > 2८-दव्क-कष (दक) ५९. 1५ 11986 16५6- १८०४७ (६८5४४ ५44९४ 70/ ८)
3) 2088.: {4८70 14 ०१4 . ककल = ४६ता॥५5द. . . . - + (व्वा 2८ 1५५४4... . . 14112 ‰‰ ८७८. . , . . - ~ 10०४-1] (द्यपलः पुण्प्लकपहतयण : द्वत क्वालष्य == न्ट शा~ 1०१२४१४ 1€ ०४ ५४» ? -- &. 1४ १०४८ १८८८५८४६९. -- 1.४ स्श्रपाण०य ६४ ९छ 13 ए०कातवृषण्ट ४9९ शाः 16 (ल्य
र |. „1 जम उप नितिम् मुपप कन् नु ममि नृनमन नु परस् = (117; १0 1४ 5१८१५०१८ १८४१०१2१ 2११11 दव८ 10/कव) ध, |
९८४४ 5477115 कृवपल्+ १११5}(84/८ शद्ध वडव 1त९/ व शद्णकवक्दश्ठछत ०. -- 1.8 10.086 %द 14 5श्ला १1... ....,.. १०४१९ 1९ ])116५(८०४ ॥९ (ब्दल्वकश्वुव दव -- (इक र. 100५. 28. 1; ददकक(कक वाव उत द्ष्व). `
4) 8८ (9. -- 88. कता 78... 3 पाड ल. #. 14.38.
2) 14>;€ा]01€ वणं वणा पथ - ८य४ भावलट्ाल; शव्वालद == 5४1१1 7 १८८४५ ; 5दद॥ ८ == १(१त4त६८१४( {1/८} कत्त त्कष्वकक; 16 क्षि १५ एष्टणता८ ९ ए्णणञंतर- 7४100
0) (0. उख्य मेषु पतद् = 4. ¶) 2188. ९९५०. रात कए, उणुदय्तका) ला पत्वम् ११९८. ववता एका१, (0 । क्न == १८1९१५4/५) ५. 1 871८ ४8. }. 265. {
चः | | प्रयमं प्रकरणं 21
एवमिरापि न स्वत उत्पस्यते भावाः स्वात्मना विग्यमानानां 110. 89] पुनह-
तपरा्वेयण्यात् , क स्वात्मना विमानं पुरो ऽवप्थितं घटादिकं पुनरृत्थादानयें दष्ट ' तथा च मृत्पिएडाग्यवक्यापामपि पद [64] स्वात्मना विग्यमानं घटयदिकमिति मन्यते तदापि तत्य स्वात्मना विमानस्य -नात्त्युत्याद् रात । एवं स्वात्मना विश्चमानवेनो पनयामिव्यक्तेन पुनहृत्याप्रतिषेधाव्यभिचारिणा ेतुना स्वत्र 'एव सांव्यत्ानुमान- विरोधोद्वावनमनुष्ठितमेवेति ॥ |
तत्किमच्यते , तदयुक्तं केतद शटात्तानमिधानारिति ॥
न च केवलं रेतुरष्टात्तानमिघानं न संभवति , परोक्तदोषापरिकःररोषो न सभ- वति। कथं कृता ताष्या हि तेवाभिव्यक्तदरपप्य प॒रो ऽवस्ितस्य घटस्य पनर्भिव्यक्ति मिच्छति ' तस्यैव चेर् टृष्टात्तवेनोपादानं सिदब्रपवात् ' श्रनभिव्यक्तद्पस्य च शक्तित, पान्नप्यात्पत्तिप्रतिषेधविशिष्टाध्यवात् कृतः तिदसाधनपत्तदोषाणङ्का कुतो वा सेतो- विदा्धताणङ्क ति
तप्मात्स्वतो अनुमान[वि]रोधर्चोदनायामपि पथोपवर्पिंतदोषाभावात्परोक्तदोषाप-
रिकरासेभव एव इत्यतसेबदमेवित दूषणमिति विज्ञेयम् ।
1) व. नकुणेस ह्मःसुः'''
2) एणं7 87४ 2. 14. 4. -- ए भप ग. सव्कृमप््ल० १९. ,.., ४. 9. 19, 9.8
99 देशपु रितम प्पे मु. युय पुर मि |; 1०००4 द 2949 ०९8६ 7४8 प्र ४0प४.
4) धरणी 5०0४ 2. 17. 3.
9 रगौ हेस सुःसुपवुपस तगुम पप्पु (नः = शण्कषणाानाषय एत (| 11171171. 11 8.1
6) 088. 005त07@एदद2, ०७१@९९4५९०६. = ¶10. = व०ुदकवफेकेषदला१द।.
प्र) ५०: ग. रमु (वण्थ) = 1९5 वरण एष्छलिरछ गेष्म, भे-त९७७०
४. 14. 4.
22 प्रत्ययपरीत्ता नाम ` (1
धटारिकमित्यारिशब्देन निरवशेषोत्पित्सुरार्घंपरकप्य विवन्तितवराटनेकात्ति-
कतापि पथदिभिनेव सभवति4 [7५0. 9]. ` घ्य वायमन्यः प्रयोगमणः ' पुह्षनव्यतिरिक्ताः पदाधाः स्वत उत्पत्तिवादिनिः ' एव ' न स्वत उत्पग्बत्त ' स्वात्मना विश्यमानबात् ' पुंषवत् ' इतीदमुदाररणम्
४ दारार्थम॥
- पग्यपि चामिव्यक्तिवािनि उत्पाद्प्रतिषेधो न बाधकः ' तथाच्यमिव्यक्तावत्पाद् ` शब्द निपात्य \ पूव पशाच्चानपलन्ध्यूपलन्धिप्ाधरम्येण उत्यादशब्द्[6ण]नाभिव्यक्तेरेवा- ` भिधानादयं प्रतिषेधो नाबाघकः ॥
कथे पने पथोक्ताधाभिधानं विना व्यस्तविचारो इति चेत् ' तड
1) ७, कनवाः. -- न. द्युः 2) 25८ == 5९५ ५६15५ वव क द् (@द११2), ४ == 5४ ` प्ण्य्रकक्वण्व, 415 == 210 1८८57914 कव्यद्कन्ा
3) 2१०८४०७८, ५ प # ह १ ४7190 प. 47. 6, 48. 4. -- ©€ ००४०१९४ 7006 १6 १६००० 88100 €077016॥€ 16 18980706ा160४; &४ 10000भप्णण €॥४ 7116 ४ 16 88 ए 10 $ ० (अव्य %८{0114४दव9) ९076 16 2१५95 ९४ 168 कण्68 ववद्य द, 67९४ प'€स्ल 1 गश्ल्धणः «ए 076 वद्ाडणाटफाह 68६ दटण््कष्वकुया) १००६ वक्ृढरका कका, एप8¶०७ 16 कुहलढ ९8४ 507४९.» [०४९ १6 क. प्र. ¶ ४ 6०01.] -- 7 ४728. }. 305.
4) 19. ००6४ {क{ढ ९४८. एधा फणः 668 व6€फ 082? 160 १७४४६.
9) 2088. 22017४45 कण्यवव्व ५व० ; र शव्वकश्वका ५.
8) 8८ = 2दवा47त7, 11९0 = ऽण्लकरदद ण्व्ककल्लकष्) वाद्वा = 2५- 1४54.
¶7) 10. == १८ ९4 बव, -- 1.९8 0१५8408 १९ 1 वणवा (णणािकबप्म 0१०९. ८110986 वृषं ९1816 धा+€<णालाक९छ४) ता०ण १०९ 19 16० १९ 1 न्वते ०6 168 2४६61०४ 28; ००४३ 008 १6 1वफकषणुव्४ ` ६6 १०८ ऋणपड ४१००३ 01४ १९ पकद्व ७४ 71076 गुटल्प्रणा एग ॥6€ा8 (०५ 80409४४). -- &. 8०016. ६ 12. 154, 1385, ० ५९ ष्भ- 800061९६ ९8६ १६१९०06.
8) 1083. १41701६९) 5०7 क्द्ा१द११ २१९३ ४ कडकाः णद्का०. 1.४ 60४ण्8०0 दकव = 9 ९४ पवृष्ल्ण, -- क. (१६ द्ुरश्चुसमने मसे हप्पन्येपुपमेम् पन् इमन्पपयुनिपः भद्रु रप् श्र म उम् | = "^ णणषमणक०
ण्द्ाब्). . , , . ~ ०/व{दण्ण्दद्ल.क, 6९४४6 का द्पा 60० 7 € {6०80 ?
-6] प्रयमं प्रकरृणौ 23
च्यते , घर्धवाकयानि तानि मक्ा्थीनि पथोदितमर्धे गृ प्रवृत्तानि , तानि च व्याव्या- यमानानि यथोक्तमधीत्मानं प्रमूयत्त इति नात्र किं चिदृनपातत पमाव्यते प्रसङ्गविपरीतिन चर्विन परस्यैव सबन्धः * नास्माके स्वप्रतित्ताया श्रमावात्“। ततश्च सितिविरोधासभवः ' पस्य च पावदरङवो ठोषाः प्रसङ्गविपरोतापत्यायग्यत तावदस्मामिरमीष्यत एवेति ।
1 1 नि पमु पस पवि मानधान्तष्च्द वीया, ,.. ~ मवत शा ९४०४९ ठ
16 २४{8000€€४४ १€ 8०११8४7 211४४, 6 -46885 7. 14. 1; 16 ऋव्फन्छ्ट्छछढ वप शदे ९) ९१९8४ 18 {0४16 06 त इ & 71००8, 2. 12. 18. ~ प्रग 0५४. 6 8४.- ए €लभण्पा द, 8. १०५६. {7462 दढ, १४774
2) 7४. 5 9१,४५. र , सेम म | १2. . , ०१140 ददा क. , , अककफकदण्यन, -- अद
0208 16 7606 €070101, ६८४१. 0४ प इ इ ए 2१०1०१४, १4 2. 3.5. 8
ॐ) तधा 6 20१68 817९*९5६ 16 > ए6 कूं9०४ वृण, 9 6००६६4०९०८९ 10०९, ९७६ 60णाताभपकन 0818 0008, पणां 078०००8 760...... हणम तप = वडकष्वद- क7,४५ (. 2. 15. 1, 19. 1, &४ लं 4688008 ०0४80 €०४ गि. 99, 109) ९8४ वल्ल १४०8 1४ त $ ४४३०१४1१, 198. 19: वव7०्८४य९; आ वडकदकरढद्ाकाकी ध्व; वर्वोद्करट्यपव १८१४ € + 5४4०७०5 दव7 १2/00 दकव ९, प {४४ क वकधव्कन्दवाष्व का; कट. 9925109 € {बव ५कदव्काष्छकववोवय ल्व कककषदकाफकम प्प्दकण सद्दवकुकष , दवा , १८११2१९0 धव १1081१2, १2 ‰/ ९८८ 247द कदश्व कवी ६कष्ऽद 72 = का172444/0, ऋक्व 5४व56व वाक कए ९५. कवरकव्वकक च -- वाव ए ठ्; क्व 27054 कडदककामा कद ६2द201/0द् चद? &यव‰ क्छ, एष्व्छ$/ ५ पम कादा काष््कककछ० पवकाव१४0, ९८८९४4११ णद ववद ; $ बव 19 काठक ९८) १९दद इश्व क्क्रवद्ककष 90 270९4406, 5९०१०००० कण्व ११४९७ ११४01074 4/1500/ 51005400 2 काीद्ल्व्तावर ४4 दण ९. , . . .
1.6 27050204व ०7681 8४8 07. 82479194: 1705व70 2४ १ उदद्ककक४, वर0ा/ कछष्कछ्छ अककण -0505 00705व0 शव ऋ वडववकढवकाषठाः (फ ए इ उ ४१ 7६. ४४7. 401. भ).
1.6 ४24 इ 87018 ०6 नोकश्कट पण फला 800 कतर्छा$ा€ € ल०षत्रकतलत्णण ४१९५ [प-616; 71 28 0 छदाच्र्ठि णं ॥५ वणं णं इगकणौ 7०068. 0९8६ 0णा तटा १०९ 68०११ ४१६१९४१ २९००७७९ 16 2१५४०७५ ०6 8} इ १४१1४९1४ (2. 16.18 € [पड
2. 25. 9).
8 2१8१1१९४ € 800 €८०1€ (इण्व्वान्दड) एकवाल कदा 19 ६2686 ऋष्व क (पि 8९87} ०१४) 6-68808 12. 18) 9 १68 का हुप्र€ा४8 06श0णाल्3) +एव. 8०१११४१ ह 11४३, तीर्थं १९४ 70 दक्र, 0'6णम6 १०९ 16 तकोऽ०ा0€क९०४ ए 180 8706 (25/29 200744004). 1.68 १९०२ 66०1९ पभेष्छछ६ [हणा 0० > ९९४७ गन्म 8 16 पशा 10६14०९. 6१९8 ९९ वप 0€0 १८ क 988111९1; 2. 820 (351) 90, 21676 १०९1१०९8 681४8108
$ 16 0वरक्क, न. ६. 199. 116, 8४75 8087489 88. (४.8. १४०३ प 8609 1901-2) 7. 13 १० 76 > एष.
4) एाण8 १४४ 10 (2, 15 ०. 4) ८०0४6 16 9,
10
24 प्रत्ययपरोत्ता नाम 1 ४४-
कृतो न् लल्वविपरोताचायनागात्ुनमतानुसारिण श्राचार्थब्ुडपालितस्य सावका- [व मिघापिवं 0 = ` 1 4 4 >.) ५ शवचन यतो ऽस्य पठे ऽवकाशं लभेत । निःस्वभावभाववादिना सस्वभावभा-
(प विपकीतार्थपरसङ्गितां 2). ` ` ङि । (3) ववादिनै प्रसङ्ग ्रापन्बमाने कुतः प्रसङ्गविपतोता्धप्रङ्खिता । न रि शब्दा दाएडधाशि-
का इव वक्ताएमस्वततयत्ति ' [70.9५] किं तरि सत्यां शक्तौ “क्तर्विवतामनुविधी- यत्ते । ततथ पट्प्रतिन्ताप्रतिषेधमात्रफलवात्प्रषङापाटसन्य नाप्ति प्रसङ्गविपरीता- धीप्ति। | तथा चाचार्यो भूवता प्रतङ्गापत्तिमुषेतैव परपतं निराकरोति स्म ' नाकाशे विष्यते किं चित्पर्वमाकाशलत्तणात् । श्रलल्तणं प्रप्त्येत स्यात्पूव पदि लत्तणात् ॥ दपकार्णनिर्मक्ते उपे उपे प्रसश्यते ।
खरसेतुकं न चास्त्यर्थः कथिद्केतुकः क चित्
तब्यधा
1) 2088. ०श्ददकपय, र्द्वह: &. 8०१४९. {., 1०९ 8. १०८
9) 70. सुथिपनस गणु प वमन् र्" कविर, गुनि निनुर्ने, = ०० $€ थतरक्ाकदला252 47 द्वप ; 801४, ९ 7676 168 धला०९8 €णामु6€8 एण्ड ०६ (7. 28. 3); फवन्वीद्व्छश्व्वव्लपष्द ऽवकाएककाकव्कवशव् द्रम
3) = एनााध्णपः 06 फ, ण्डृप्यलं ४0०8 16 6६19. 2.99, न. प्र. ए. ए. 8. १०८. वमककृनव्यषःद, वदद
4 ४. कषक, -- श. युप् उपोढ पर येद-तः म पततं |
ॐ) ४7128. }. 388. र
6) एाण8 0०६ ०2०४2 (28.4) = शः पम्, ८४०१८ (24.3) = ऋ पम
पलं गुम १ नद्य पमस १6 066 28.4 64९४८४८ = ५ -- वक्व,
ष्णाः तिह ०४०३87४ 1. 2. 1: नदद्द कृवा, क्व न, 21५0, 204 शदथ , $वदछकनदकुमापद१८ #7८ ‰#0 १४0 (व्, 21"व5प्् ४०१९) 50 111704६.
9} अय
8) == 1४१. 2. ~ 1.४ 1९66 १७ ५०४8 168 10858. ९81 दलपक, नाल; ५९ एला0९ 178. -- 231383९४ १द् 18. 9 कोण (ल एषः कध. व. 87067९7, ^ १४- १३०४९४६४ ॐ 76. ००16 9}. -- 88४05017} 9 14.89, 288{८2702187097101८५0 ` 16. 18, ९72 १7० इ? ४712 266. 19, 273. 9, ९६५. ; क्लपापक (क्तवा).
-2 ४] प्रधमं प्रकरणं 25
भावस्तावन्र निवीणं रामएणलत्तणम् ! प्र्येतास्ति भावो हि म जरामरणं विना॥ इत्यादिना ॥ घथार्धवाकावादाचायवाक्यानां मकार्थते सत्यनेकप्रपोगनिप्यत्तिरेतुवै परिक- ल्य्यते , घराचार्यबुदपालितव्याष्थानान्यपि किमिति न तथेव परिकल्य्यते"\ धथ त्यादृत्तिकाए़ाएमिष न्यायो [7१] पत्प्रयोगवाक्यविस्ताभिधानं कर्तव्यमिति॥ एतदपि नास्ति ^ वियर्व्याव्तन्या वृत्ति कूर्वताप्याचरयेण प्रयोगवाकयानमिधा- नात् ॥ शपि चात्मनस्तर्वशाल्ातिीशलमात्रमावि चिवरषया]ङगोकृतमव्यमवदर्थन- स्यापि पत्स्वतन्नप्रयोगवाक्यामिधानं तदतितंरामनेकदोषसमुदायास्पद्मस्य तार्किकस्यो- पलत्यते । कयै कृता ।{्त्र] यत्तावदेवमुक्ते ' घ्र] प्रयोगवाक्ं भवति, न प्(मार्घात
1) == उढष, 4.
2) ए87 1'8ण८्छ्पाः १6 18 07686706 परद्धै, ~ गृ " = ०४४५९.
9 नृप = व्व
4) € धशा]€ 8०{€ ¶प€ ००६76 2१००८ (6ं-१६8७०प8 1. 9) १०६ 98४06. ~ 0९४ 16 एकण्वछववण्दवता 80१९१९४६) पृण 812 79१९. ~ पससुः र्ग् = छम्य 224८१६९, |
8) 2००४6 ०४7९8 16 (7. ।
6) 088. ण्डामावणुन्छमन४क, ~ एम 2. 16, ०. 5. - 18 ए ६४), 14० उषा, गि 188- 166, ९४६ 06 व दहह 1००४.
¶) 2. ०४ (०1५. गुवमदक्ष, (ण). ०४ = (19. मैर्
8 कच, गव्काणावणेमछर, शपा, संमकेगुः पुमप पदुभिपस == ०१26१0१9 0९०64४2. |
9 3198, अथ वक्थ - कथ वः छवमुणणदुणत. व छोक्व, गुप), ५
या ग कऽ नोर हु ते| कक ०८ मषपणस पस, पविमृरभ वुद्ुसपः पेम | मर 0९ 818१४१1१९॥४),
26० ल-त 2. 17, 1. 1 06 19 ००४6. ++
26 प्रत्ययपरीत्ता नाम , [7५
ख्ाध्यात्मिकान्यायतनानि [77\. 9१४} स्वत उत्पत्तौरि ' विग्यमानवात् ' चेतन्यवदि ति। किमघं पनर्त्र पमाधत इति विशेषणमपादीते ।
लोकपेवृत्वाभयुपगतस्वोत्पादृप्याप्रतिषिध्यमानलात् "प्रतिषेधे चाभयुपेतवाधाप्र- सङ्गादिति चेत् । नेत्युकतं संवृत्यापि स्वत उत्पत्यनःयुपगमात्
~~~ _ ~ = प = द 5 यथोक्त सूत्रे "त चाय बीेतुको ऽए उत्पग्ममानो न स्वयंकृतो न पठ्कृतो नो- भवकृतो नाघच्यकेतुसमुत्पन्नो नेश्ररकालाणप्रकृतिस्वमावतंमूत इति । तथा '
चीनस्य सतो यथाङ्कृरो न च यो बीत्नु स चेव शङ्करो । न च घरन्य॒ ततो न चैव तदेवमनुच्ेद रणात धर्मता ॥ उति" 10 इहापि वत््यति । प्रतीत्य पश्चद्ववति न रि तावत्तदेव तत्। न चैन्यद्पि तत्तप्मात्ोच्क्न्रे नापि शाश्नतं ॥ इति। पमतपिततं" विशेषणमिति चेत् ' तद्युक्तं ' संव॒त्यापि तदोपव्यवस्यानभयुपग-
1) 2788. (व{वद्वण््वा, 2) पणी 100४ 2४. 8.
3) 7908 16 @& 115 १३१४8६८४; एम 280०016. ८ 2 द. 1498 (. 370. 28). @ 11888. 219. 10. - (© ¶0. [ कदुष्कव्ू० १८ वद्या. , .) (भका 1९ 8118४. ।
4) 1911४४१ 8६४7९, 210. 8-5; ५९५१९ 81४96९९8 6#6€€ 72 &त 1. 28, शा. 20; ५. ६1॥§ 28. 288. 10, 239. 4 ९४ 168 161" प7व¶९8 + (०८. गद४€ ४ ४1४२1१४ ५९ 818 1716870 ४2016 १€ >€ णाप 16 ¶०४६्दफ € एत (188. ९^१1८कव9+ वदव्ष्व्द्यो, ३ 0०8 06 117€ ५८५८. १११द१द -- €€ वृणा 6 १४ 98 8808 १८1४८
8) = णा. १ (ए, १०८ ८द०) 6) (१४. गये ६५) प्रुष स॑ गम पृदुरभ "^ (१)
- 7४] | प्रधमं प्रकरणं । 97 मात् । सत्यदपाविपरीतद्नपरिषष्टा एव हि तीर्धिका यावडमयवापि निषिध्यत्ते ता-
वदरण एव संभाव्यत इति} एवं पट्मतपितमपि विरोषणामिधानं न युव्यते। `
न चापि लोकः स्वत [7४] उत्पत्तिं प्रतिपन्नो यतस्तदपे्तयापि विशेषणपाफल्यं त्यात् › लोको कि स्वतः परत इत्येवमादिकं वि[ए9:109चाटमनवतायं कारणात्कार्मु- त्पग्चत इत्येतावन्मात्रं प्रतिपन्नः " एवमर्था ऽपि व्यवस्थापयामाप ' इति सर्वधा विशे षणवि्ील्यमेव निश्यति ॥ ॑
शपि च यदि सतृत्योत्यतिप्रतिषेधैनिराविकार्धणा विशेषणमेतइपादीयते "
(6)
[क् ऽतिद्याधरि ॐ ` "ह ~ ~ कः , 5) £ तदा स्वतो ऽतिद्धाधे पत्तदोष श्राग्रपामिद्धो वा केतुदोषः स्यात् ' परमार्थतः स्वतथतु-
दाव्यायतनानामनभयुधगमात् ॥ तवत्या चतुरादिसद्वावाद्रोष इति चेत् । परूमार्घत इत्येतत्तरि कप्य विशेषणो ॥ साव॒तानां चतुर्टीनां परमार्थत उत्यततिप्रतिषेधादू \ उत्प. तिप्रतिषेधविशेषणे परमारथरर्णमिति चेत् । एवं तरछेवमेव वक्तव्यं स्यात् ' साव-
1) ग. पमृनमफम, पीपर. गृषब ७ पणं व्ण्णीप्ण 18 ष्यप्र ठ (0६6 का€पालठः क क -वङच्लठ द्वप), 00 ए6९ण॥ ६४०7९: , . ४089 -109- ४८०8 118 पणणं १०७ ०0६ १४ 016४. - ५०१40 1 गुरि + मेष
2) 80.2१9 ४1१6४४?
3) 719. == ४०४7५.
4) 70८4 ०४०१०९७ ४०8 व.) रवर ९४६ ४7 66,
8) 1.8 1९60९ 068 088. 068 [8४8 €00818716, [लं € 078 80, 10. 15 (कन्दकद- 00245, ९९०6 ण्ठ १९१५०}. 11 मिण, 16 वणंड, [76 वभवक्ादल्करन्ल व्य 254० (५. 28. 4), 0०वद्ा० चठ. .., ©. ¶ ५1४३. 309; प इ7 ५0. 1. 68. ~ व. रत्य पृष मुपप ङग कषमत [नि मनुषमन कु कगृषये शम पयुप | ज 8 209४ € शप€ वप शदतोकभ्णो)प४. © ४९९80704 छकावकरद्तीवक ४6 एण णीः 0९
(९४ एप8्¶प९ 1४ 60086 06816 298 2 ककत कवके; १९ फ6क९) 08४05 162 सरणकुार ६188814 ०९) ८५१८ ६1४ तप 1०४४8 प्०6 ००-60086.
® व. र्नगेस सूमपमाप''' १) 2००८6 ५०68 79.
+
9
28 प्रत्ययपरोत्ता नाम । (४ तानां चततर्रीनां पमार्थ॑तो नास्त्युत्पत्तिरिति \ न चेवमुच्यते ॥ .उच्यमानि ऽपि परवस्त॒ सतामेव चतुरादीनामम्युपगमात् प्रतपिततामनभयुपणमात् परेतो ऽसिदधाधारः पकतदोषः स्यादिति न युक्तमेतत् ॥ |
श्रय स्यात् , यथानित्यः शब्द् इति धर्मधर्मिसामान्यमेव गृद्छते न विषः ।
1) 088. . , . वावा कका , , , अपमा, कोुनष्शदमोष्नषछव्काक, पशुम पत वनदयतपुणेम '""' हससुः एमयषेपुमु [पद्मिन् मर | पगु यप एमुषम् [पसमप्ुसपरिदेर | गुम"
-70245 == ४८७५) 4942 @. ४), फक्छा, ए€भ् = इप्रो8॥8०6५) पशश (ग ४8९४1६6
६. १०८.); 801६ ०5१४६ कचा गृणण्ड्तणा > व्व; ०04६008 0१65 १०७ गड (0. 31. 1} ९8६ प्रवण कृष्य मुम. --“ 2१004009, €. श 888. 2. 229 016 988 १०४४९
यगु 0४०8 16 88886 0180०४6 १6 ¶ 87.) €४ 281.
सवप == व्क, 8. प ०४. 245. 98. 94. -- 20णाः 16 8608 ०९ 16 7001 06867६6 808 706 98896, एग? ¢ 11 8 28. 257. १, शव्ण्वाक्तप्माप्दतका कद, १2 तऋककलुद्कष्दाकका) सवका) सवका) किमद्य -- 18 ~ १६४78 50. 16, 39. 5 (आद्र). -- 8०१16. {. 270. 6 (कमना). - ०12०४ त् 12. 58. भद 0 (र [गवडकाविठ [न्छप४० [भव्धणद्ाद [णवि व० $ छद एमा ८१ वकारा) ४. -- 14111948 25. 11. -- एण). 168 कशा९88०08 १७20244 27200019, ददद 11111717 + भ-06880४३ ०0६धण7९०४ गि. 659, 849, 909४, 1029-9 €६ # ४, 3 (01. 165४).
4 66 पणं 99 १०००७ €&18४९०66 त€ 78800, १6 (००, त'€0०0लकप्०छ, 8० 0०86 1९ 0व्मवक्कवस्) काकण४वकव, ०८९५५5८४ (ज 88६, 281, 80870361 13. 11).
2) 0 168 8५68; गुनेन = (00 208 &0१6821768; पुवं (५. 1४ ००४९
५4688०8 € 29, ०. 8}. ~ $ [भए00 1966 १७ 18 0० भवदा 6४ 86 19 रश्धय० दका, रण 1४ 01860880 नभ -46880प्३ 101. 99.
०१९८ 1४ 10 (पि ए > १-५१४. {. 68) न कद ४व अददद 54 76 6४ ध. प ०४. 199. 88 84१९.
3) 1 भष्ण्णलषन्डिपतंणण (कष्वमः३द) ए९ण 86 68 धणं; १०४० ए वच्लहणः 2007706: (वः (ष्वव, 1 16४6 16 कोप्वम८ ९४ 16 काोव्मा १४०३ 16 पा ४66कध्०य 86767816 (16 80 == ०8 वृ शक्यत् , , : &०एवद०८ व वदनम), ९४ 19 वो8तण्डडंभा ९७१ ०8716 606 ६१९५ प &तए७8 976 पृण अप्वा ण6, ४ 1 कक 6४ ३ 809 १6४ ण५‰€- ॐ८१४5 01067608: 16 54 &६ 16 एवदऽककक द 80०४ 5४व दाक; १6 ण66 १४०8 16 6४8 8४५1761. -- 8८ 18 इ४}€प्ाः १९६ धध68 रकाद 6४ ४६९७८ २०१९४ 168 (600. ४ 8 प - ४73६8४४. 138; क्क्ष ददयदक साणव्व0 चद) ०९७८ 77 च्णद्व० *9दद्थ ०० पवक णद्ध $ुव्क,... न्= (1676 18... 20 0180०८८ ४४०४६ €€ एण
- 8०] प्रधमं प्रकदृषौ 29
विशेष्रकणे ङि सत्यनुमानानुमेयव्यवकाराभावः स्यात् । तथा रि ' पदि चातुरमकामी- तिकः शब्दो गृद्ते स परस्थासिदध ' घ्थाकाशगुणो गुद्छते स बोदस्य स्वतो ऽपिदः। तथा ैरेषिकस्य शब्दानित्यता प्रतित्नानानस्य यदि कार्यः शब्दो गद्यते त पातो मिद [ग0. 109] ध व्यङ्य; स स्वतो ऽपिद्धः। एवे पथापेमवं वि(8भुनाशो ऽपि यदि सकेतुकः सर बदस्य स्वतो ऽसिद्ध} घथ निरदेतुकः स परस्यापि इति ॥ तस्माग्ययान्न घर्म- ्भिसामान्यमात्रमेव गृद्धते ' एावमिकापि धर्मिमात्नमुतमृषटविशेषणं प्ररीष्यत इति चेत्। न चेतदेवे'
2 391 ४8 80८) (अठषद्कभछुलधय {कथक काकार 94 पण्ट्दव्क) ण ४06 त18ण6 18 [०01)]
800४ 18 एद्लणाक्नं ४९8 (गन), कश््लाः 1४ 96 पाणात्णक्तण०ाइ भा ०१९... , -- भण ४ण- 860४716 [वलः ए 86छद] 6०९8 01068 8 86) लं उ््॥ ०0११६९४) [०फवकाण पणा धल १6 47४, जा€ १४886४०6 दप व<णहछछ 8६... ,.
1) ए०णाः 190 6ो8क्षि76 ४ -8०त011806; ~ 1/स्तणा6 = 3०766 8४7 16 9. देः पर्वकः मगुपपत
2 ए0'भूदेऽ 1० तष, 9५ एव४्ददोव्दकदद्ोनो, 7915 10778, 1, ् सम्सकुसप (१ मगुवप पमु | ~ एकणणाड वण केवत 05०5 165 काण्धातछ दणड एणः त ०००88१9 1. 2. 19, 2४६५8४४१. 287
8) ए०्णः 18२९ तप एकदस. ~ ¶१0. व्ण० काण फा . 28, ०. 2) मे पुमृमच मुपप
4) एण्णः 16 ११4९४. -- ०४०१ (= वठण्व्यकदोवावदठ) (कठव, ४686 00 णद ४ (. प ४1९. 8. 71. 2. 28, 50).
ह) 1.88 €60168 ०6 8९०६९०6६ फं इण 16 कल्म (42व2)) 9) णा 16 कदमाभ्य (०११20). 20 पाः 168 9०70त018068, 1४ तदश प्ण €8† मोन, वका १५. पए 017 108 दद्या. 4 ©. गा. +). - ^ ०१1१४४72 १. (08. १6 1४ 80५. 48.) 2699 6. . . ५००४ वशवा्काकथयनल श्, तदल्ववक्वं , व्११0 79 एक्का पकद्; वदव्कण्ल्द- एकत द्वाव, वकलक ४ कव् , सद्वा दद्द: वकल पद्म), वद्य ४६दव, वककभदफकद्छ्कश्य. -- 30४ 12 16800 १९ 1 गणा०प ०00०866. -- प ए इ १ ४४१०१ 106. 8, 37. 19 (ति ४४४००१४1 78). ~ न+ ४१४२६. 12४70. 383. 19 अश्वपलाष्नष्ट्व कव 000 पावदर्का0 42/0९, (णतवकण्वा० णद; णतकदर्काचद 661, सतक्कव+ 0 व ५4 2८५7 कदकवंद, . ,; कणकश द) , ^ + गद्कव कलभः कह ९/0 चकव्षमो पव- 1५१, -- 2110 ह प 98 10४४१. 786. ~ (४४878 8 878) 0४8६788 1. 2. 28.
6) ४88. 8 कका 'भदकाम. ग, भ प्रपि मगुषप पुन
80 प्रत्ययपरीत्ता नाम ४ [89- पै्माग्यरैवोत्याद्प्रतिषेधो ऽत्र साध्यधर्मो ऽभिप्रेतः ' तदैव धर्भिणस्तदाधारस्य विप्ीपमात्रासादितात्ममावस्य प्रच्युतिः स्वयमेवानेनाङ्गोकृता । भिन्नौ दि विपर्यीतावि- पर्याप । तम्यदा विपर्यासेनापत्सचचेन गृद्छते तिमिरिकेणेव केशादि + तदा कृतः सद्रूतपदा- धलेशस्याप्युपलन्धिः । यदा चाविपयीसाद्भूतं नाध्यारोपिते वितिमिरिकेणव कशादि ' 6 त्च कृतो ऽ पदरूलदा्यलेशस्यापयुलन्ध्येन तदानीं सेवति; स्यात्। धत एवोक्तमाचायपदि यदि किं चिडपलभेवं प्रवर्तपेयं निवतंपेये वा। ्रत्यततादिमि्यैः " तदभावान्मे ऽनुपालम्भः ॥ इति" यतथेवे मित्री विप्ास्ाविपर्ती , घतो विडषामविपरीतावस्थायां विषरोत- 10 त्यासभवात्कृतः सोवृतं चतुरस्य धर्मिनं स्यात् ' इति न व्यावर्तते ऽसिदाधारे पत्तरोषः प्राप्रयातिदो वा ेतुदोषः4 इत्यपरिदहार् एवाप । (70. 119] निदृशनप्यापि नास्ति साम्ये । तन्न हि शब्दमामान्यमनित्याता सामान्य चाविव- ` त्ितविरेषं दोपि संवि्यते । न तेवै चलुःसामान्यै शृन्यताशून्यतावादिभ्यां संबृत्या- ङ्गीकृते नापि पटूमा्थतः ' इति नात्ति निदूर्धनस्य साम्यं । ` 18 यश्यायमतिद्याधारपततदोषोद्धाबने विधिः" एष एव स्रादित्यप्य केतोरसिदार्धतो द्वावने [ऽपि] योन्यः ॥
1) (9. == म्न.
2) ०५०५2504, ₹017 8 ०१४१५... 289. 19 (== ऽण्, ००५2, ११०१०) ; छचपलण़ार 0९8 कावड (प्रद) 00812016 068 एलणड) ९8६ नढध्धद प्र, त, १५व. 245. 3-10, 248. ए.
3). एए णु7४ ]. 16. 9.
4) © 9. 27 ४.5.
8) 1088. %@ ० वणय अमोल, गष मेफिममे एप्प देर, १) करै गुतमद्धगुस पदे मगुपपतिः जुभे गदयति प पनसः
4 052 दा^द०७०द 0१2००१८ {५ 2. 82, ०. 4) $व{श्क = णवङ्कधकष्ण्वः (7. 26 1
-8४1 प्रधमं प्रकरणं 31
इत्यै वैतदेवं वतत्वयमप्यनेनायं ववोक्तार्थो भयुपगतप्ताकिंकेन । सत्येवाध्या- त्मिहणकायतनोत्याद्का देवादयः ' तथा तवोगतिन निर्देशात् \ पदि यथा तथागतेना- त्ति निष्ट तत्तया ' तथ्या शान्तं निवाणनिति ॥ श्रत्य परोपतिप्तस्य साधनत्येदं हष- पममिर्धितमनेन ‹ को कि भवताममिप्रेतो $> केवघंः ' सेवत्या तथा तथागतेन नि शात् ' उत परमार्थत इति । सेव्या चेत् ' स्वतो केतोरसिदार्धता" परमार्धतथ्ेत् " न तन्नासत्न सटृतंदरमो निर्वतते यदा । सदसड़भयात्मककार्वप्त्यपलनिराकरणात् तद ' ` कथं निर्वर्तको केतुरेवं सति हि यते #. नैवासौ निर्व्तको देत् ' रति वाकपार्धः । ततश्च पर्मधेतो निर्वत्यनिर्व्तकलासिदेः ' घ्र- तिद्ार्धता विहृदधाधता वा हेतोरिति । यतशैवं स्वयेवामुना (79. 110] न्यायेन केतोएिदिर्गीकृतानेन ' तस्मात्स वेवानुमानेषु वस्तुधरनोपन्य्तंेतुकेषु स्वत एव केबादीनामतिदरवात्सवीपयेव साघ- नानि व्याद्न्यते । तय्यृधा " न परमार्घतः पेयस्तत्परत्येभय ब्राध्यात्मिकायतनन्म ' पवात् ' तव्या पटस्यं। भ्रव वा ' न पटे परमार्थेन विवन्निताः चतुर्पाध्यात्मिकायत.
1) ४. 99५7४ 608101९8 य ९०86 168 €पना०ङ्€उ वप ०४ ष्फ 09078 ४०१०१४३ &11०६; च. 1. 4. 8. 1898, ए. 103 84१. ४०7 2. 106 (8०४8 16 ‰ 6) 1४ 10864 {ब{72४द८१(०/द 10 [8०२ ६१४१. 59. 31, 66; ©. 208 7 १1१४, 012107९3; 40 ०५1८, 78 ०४८ 2]. -- णोः धप प्र€०६९) (2३६३८) ००३8 ८1९४१1१ £}018६16, 9. 1. ¶. 8. 1858, . 7). वणं नल १0९4४78 20 40278 1०६४: "वद 54४८१ 191 विद्वः {5४4
2) * ०४३ १०१९४ प्1€ 18150 वष, ५१828 ४०६९ गणम पाला, 01671516 293.
3) ¶1४. == 1१7५1॥41/ 773.
4) = 1. 7 (ज. ‰4:\)}.
9 10. रन्न स गुतवृरदेगृषसु कपिपतिः दिसु"; च८-कामा्- ॥८।४-१1/८2 514 -५८/५१८10177१८८.
6) 1 ९. लुव्वतद्त्त्+ ०
7) "110. == 41/6५.
8) 10. (५ द्म गृक्सुटेस रह्सुपानमतुरयः मेगृ रक्ष
10
32 प्रत्ययपरौत्ता नाम [६४-
ननिर्बर्तकाः प्रत्यया इति प्रतोयत्ते " पर्बात् । तय्यधा तल्चाद्य इति । परबादिकमन त्वत एवासि । | | यथा चानेन ' उत्पन्ना वाध्यात्मिकश्ावाः ‹¶ृदिषपिवििष्व्यवकाएकरणाद इतय्य पठमिक्ति्य सेतोरमिदरथतामुदावपिषुणेरमक्तं 4 श्रय समार्तिस्य योगिनः £ प्रन्नाचत्तुषा, भावयाधात्म्यं पश्यत उत्पाद्गत्यादृषः सति परमार्थत इति साध्यते ' तद्। तदि्षपिविधिष्टव्यव्ाकर णादति सेतोरसिदार्थता ! गतेर्प्य्[9भत्पाद् निषेधादेव निषेधादिति + एवं स्वकृतताधने ऽपि ' (पर्मार्धतो। तं नैव गम्यते ' ब्रधरात् ' घवदिति ' भ्रघतहेतोः स्वत एवापिद्ाधेता योन्या । ¶ पमावत) [साग्रव] चत प पश्यति 'चतुरिन्दियत्रात् तम्वा तत्समागे।
भ ७ = । चः । ; ४ . , “ | ज यतिः बुरगोदचैमद्पु नगुपयस्केपुपमगु केमु ममु रेख | = ०४० णद 1. 1.1.111. 1.1... 111 17711111 77111 1./4.:4/.; 71 ०5६९८४८ १९८८2. -- 1/४ 16लपा6 वा-कथ्) ९8४ 1०66६88 9016. -- 1.6 110. उण६६दा6 1४ [९नप्€ क कच्व (= १५८४९); 10218 १०१९ 176 00106 वप 7०४ 21४4, 887 - ४४१४7 ¢. 8.. 21. 1--2. € 100४ ००४6 4 1. 2. (0. 229).
1) (10. == छकाप्यीच्ाा भुक्वद्मा४, -- एणा 16 009, इ पए 00 ९8४ ११8९०५६८ 18 ०० 0 वप मथ्य. 2) {१0. == ववक्द्दुध,
8) 1098. धव०्००कद०. ग ् रगृ पुम मूः शष् ५ म = स्बवेषपने न
4) (११०. = वशदकाण
8) 7४." यह्पुयननदुरिपस| सरश तिरे समुममप इुभिपुर् 6) ¶0. = ४४ ५४८१. ~ &. ००४९ 8 । 47) 1188. ४ | कठ ० ००० '9द द. गप. किसु'पन गुरम्िगृस चिम
8-5) 088, १८ 0वाककाष्ार०[६८] 2 अवफकद्वका तवद5 क कववः ल्वपककाव्मैण्क कृषा ध्न श. दुमदुमा, पठेमुपनुरर्डसपरिः मेगः गाङ्ुगुस
` व पिष मधे | मेषुगो पक पवद | ममं रे मर मुर
- 9५] प्रधमं प्रकरणं 33
तया ' न चतुः (19. 129] प्रेते बपं ' मीतिकलात् + पवत् । , छस्वभावा न मदो ' भूतलात् ' त्घानिल (त्यादिषु केबाग्यतिदिः स्वत व पोव्या ॥ सादिति चापं सेतुः पतो भनेकात्तिकं; । किं संच्ात् ' चैतन्यवनराध्यात्मि- कान्यापतनानि स्वत उत्पग्यत्तां ' उतारो घटाद्घत् स्वरत उत्यगबत्तामितिं । घटानां 6 पाध्यतमवान्रानिकांत्तिकतेति चेत् ' नेदेव तथानमिधानात् ॥
प + | -- 211९ = 0४०४4) गव; वर-दव-7क5-70 == कडा) ०७०१५८१८; ०8०व (५. 1.6 ६८१९ एषा अत) [अणललकृाधमा 68६ तािलो€, ~ पणयः #. १४०६. 109. 43 शदमच्कहदद्कव्द) 44 5) 51 व्फद्त) 114. 6 ऽव्फन्द्क४. -- 4 ४0100877 21603. 8. व6 1४ 806, 48. 359 1 (धप 60णा३ 0१००९ कष्ठपडमण पा 1८8 018 €0€7198, [02886, 1768601). ९7): द्वाः १ लषल्वा्क४ वकम दवा, शच्छदव्यत्द्कः बू कटदकाचव०द्वावयट्य)+ दद्ध , व्व द्वाः प णकाक. १८४ {कारक ४४८२८517 /44द (कवकश्डकय) 1०६5८07 द44/क 6८5४547 9 द्रक्वभ्ा2 ४4 वक४ दव्लवदव्यव$दककः रदवदयव चठ (का० १ब8407द्ाा तव5, चवर © चद 1. 1.1 11 1.3.71 1.18 1.8... १. पनल , 2144207 407470 (2) #४ , 14८ वव$ष्न 5/८ वनवत वाक)
बऽ), 211, ९व वव्वह(, ऋक क्वककद्यक वकष ववद एष्वद्न्कव्यकक € . ‰९द्‰ ८1" कस (व्दद्लादत+ ऋद द्ककाणत) क्वं ६४ 0िवदा॥ वका.
1) 121९8 710. - 088. अक्क, ~ १18०१1०६ 8 (8. 7.8.) 18. 9 (व + १ 2व55व) वल{बदद{ह; नक १0 2 वरम्वा, वल्बद्वकरथ्द्ढ{ढ = प ४7767 297 == ^ ६६1 &8 811४1 4600, 1 (०४ 1४ जगलण्रमा €भ् ३१८०९५४९). ©. 82. प ४7१३, ४५४४), 419.
2) 09071९8 19. -- 1488. .{44४0102 ११११५.
8) €. 16 7४180706€फ€छ६ ¶०€ ०0०९ 7 18 ० इ ४४ (वणार ९९01९ १९ ४८ ४११५4 (ए 26287) 8 ६101478, ¶ इ ४7 ४7१8१. 31.1) मद्धाम @कठदम्, कव्मवण्व) 9१८८८. -- &1० ४४४. 365.
4 7४. "'" पुतमु्गुस' नद पनः पमि ब्य |' "| वेम मदेमय धमत थ ववा कं वक्तव्य कव$८ | कष, , ॥ च १4 अर्णान् = च आण क्षो (व्य) 76७९०४९ ४४ 209४ १९ १०९ १९ 1५4१687९ 16 त भण॥ ववन्म््ठ, ८४7 1४ ०९७0 द्वि . , पववकक वकफ€पाट फिपक्लैला1966 (वमव == गमे = प्प).
34 प्रत्ययपरीता नाम | ,
नन् च पथा परकीपेघनुमानेष् दर षणमुक्तं ' एवं स्वानुमानेघपि पयोक्तद्र् षणप्र- पङ्के पति प्र एवासिद्वाधाएतिदरेवादिरोषः प्राप्रोति ' ततश्च य उभेोरटोषो न तेनै. कथचोगमो भवीति सर्वमेतदूषणमयुक्तं जायत इति । उच्यते । स्वतच्चमनुमानं ब्रुबतामवं दोषो जायते १ न वयं स्वतललमनमानं प्र्वश्ने ¢ पप्रतिन्तानिषेधफलल्ादसमदन्मानानाम् । तथा रि पां चततुः पश्यतोति प्रतिपन्नः स तत्प्रपिदेनैवानुमानेन निराक्रि- यते ' चननृपः स्वात्माद्एनधरनं मिच्छति ' परदर्शनधमीविनमाविवं चाङ्गोकतं ' तस्माद् यत्न त्र स्वात्मादृशेनं तत्र तत्र परृरृणनमपि नाप्ति ' तस्या घे! प्रत्ति च चततुषः स्वात्मार्थं ' तस्मात्परदृशंनमप्यस्य नैवास्ति । ततश्च [५४.129] स्वात्मा)दूर्णनविह 10 नीलादिपरदशनं स्वप्रसिदनेवानुमानेन विध्यत इति । एतावन्मात्रमस्मद्नुमनिहदरा्यै 9४]त इति कता ऽप्मत्यतते पथोक्तरोषावतापत यतः तमानदोषता स्यात् ।
[कक
(7) (~~ [र् (8) ~ {9} कि पुनट्ल्प्तातहनाप्यनुमाननाप्त्यनुमानताघा । ब्रघत्त्पाच त्वप्राक्च
, +} © ¶४द/क €8६ ल+€ ६४7 १2१२7८६ ६११३. 142. 9 ‰तई ८०2१7१/०7 54070 त०6०. . . . ~ 1. ए 6ै7ा6€ 67566 €8† &प०6€ १४8 16 ग्टा8 ल€ कषा ^ पोत्पत् व), व इद 0 $ 28. 1. 6. -- ४०7 &णड9ं & 1०४१४. }. 84} (७६०८९ 2६४).
० रनयः देस सुरगु, -- 0. ०७५. एष्व), 7, 820,
ॐ) 2188. 7०/५2 €.
4) 8 16 क. 214०6 ०८5दव९
8) 8. एकाच (व. 1.6 #एल्भेप ९, मे भग] त (५ नैस (0 न प म् म) ०6 (्णापि0€ [3 १९८९19९० ४ 12 ९०1९८00; 00 ३ {लाव् गृबुम् गि, १'भु128 1१०४ 10्€ १6 €6 १४; ऽप.
9 यहदूवन्पयुष्प परमुयस,
7) 70. 9 1 == ०११४१7८ (प'४ृ1ट8 व ४8८१९). -- र. ध. एक. 199. 88
१०४५. |
9) 2188. 5४ ऽक्च.
ॐ चः ॥
-9४] प्रथमं प्रकरणं 385
नेव हेतुना * न प्प्रसिद्ेन ' लोकत एव दृष्टतात् । कदा चिदि लोके ऽर्धिप्रत्यर्विभ्यां प्रमाणीकृतस्य सा्तिणो वचनेन यो भवति पर्त्नया वा ' कटु चितप्ववचनेन पटवच- नेन तु न ज्ञयो नापि पर्त्रयः। था च लोके तथा न्याये ऽपि ' लीकिकप्यैव व्यवकदस्य न्यायशाल्े प्रस्तुत् । श्रत एव च कैशिदुक्तं " न परतः प्रसिदिबलाट्नुमानवाधा , परि डेरेव निराचिकरो ितवािति ॥ यस्त मन्यते * य एव उभयविनिधितवाटा त प्रमाण द्रषणे वा ' नान्यतःप्रमिदमेदिग्धवाचीं ' इति ' तेनापि सीकिकों 4्यवस्याम- नृहध्यगैनिननुमानि। योक्त एव न्यायो भयुपेयः।
तिथा हि नोभवप्रतिद्ेनेवागमेन श्रागमनाधा किं तरि स्वप्रतिदधेनापि ।
स्वधानुमाने तु सर्वत्र [1,0.18] त्वप्रसिद्धिरेव गीती ' नोभयप्रसिदिः।
1) 19. गुभुमनि (॥ {४ " " " ~ [176 ‰70170454वदाल.
2) $ {४८ १११४९. . . . . 82४08 ००४९ 118 ०३९, एणी 1108६1०1. ९ ए87६0 8878 40101478 0978 पद ४7210 1812, ]. 289 ३११. 1.6 ए०तत8॥९ €ॐ 0086 ९४1९ 17286 4०९ 18 110100705104/4 80४ ४ 1४ ४2114116 वप १४18०00८; 2१7 ११२९११ 214 हव57वद112१91 ११०१/९दद))॥ ऽददाद४द१॥ 11002 27741767 ४१बतदर दक १/द (४८१९ ष्णात वादका... . 2470007 1१/क 74001 7६ 5द दद); , १९व 5/2 कद् अववा 2050) 4 क्क्छवदा ध" ९८४. -- 14 प 0 ह 7118 16000; कक पादः ऋङ्तुबणद ९/८ - ४? क्म] चकद्र ६0) 17व5१ वदाव द९4४0 ०}14१ १. . , एककरब्दर् ववद्य" ९४५ ‰४ 7) ४4 १ 2 4 द (लावान ५‰० शदवरवष्लका८० ८५1 5८ 56 74१९१५४ १६३ २८११८१११ , == 1४ ४8 112०४६३, ए0वस्द्दण्ददोष्य) ज)9 29706 ४3४ 89 06ण शलः 18 अवफाप्ैटव ४ 0०४0 भा ९8 19 & 18० फक्क 06 ३८८९}६९व ४३ कलफणड ४९ ९७) फला ण 3 एगान्भध्०ान. (द. 8. 2३६१४, व. 800 48. 306.) 1). ~ त 38४०17१५. 68. 1 अका #; 1९149750; {611 $ ॐा25/2 ऽदय द्। 5व 1८147 १य{ब४/ब. 1.8 060 णा्०४ वप एनडी ब्रापणकद्व०& 291 10195 £ 8; 201) ५१20१ १५ 5० व्${ 2 - एकवद्) (= 79729988 ४८८8१४ 111. 1) 8०77०86 ४ इरदतदञतिवपे ; ण्णः व 1... 8.111.111... 1111111.
3) 2188. ‰4 ९४८ 21८074९,
4) (प. तदवृरेगडे वशर हुमन्पपदुगुप = रपरो 0810.
6) 19. गेम == 217011/1/4 == ११५११८0 {/479द1८व.
6) 88. $वीढ कत अकवा वकदेद्षोनष्व १द0११८१. -- तद्वववक्तल = नन # ^ मुख गुगुमेन == 20401९11 एदवा8.
36 , प्रत्यधमरोत्ना नाम ¦ [9४-- (* - मिधानं ष ) तदवादत्लया बदिस्तद्नमि ) शरत एव तर्गालत्तण निःपरयोत्नं ' पथीस्वप्रतिद्धयोपपतया बुदिस्तद त्तविनेयतनापुयकात् । इत्यलं प्रसङ्ग ' प्रकृतमेव व्याण्यात्यामः ।
परतोऽपि नोत्पग्यतते भावाः ' पठाभावादेव । एतच्च ' न हि स्वभावो भावानां प्रत्ययारिषु विव्यते^ £ इत्यत्र प्रतिषादृपिष्यति ' ततशथ पराभावदेव नापि परत उत्प्यते । चपि च चन्यत्प्रतोत्य यदि नाम पते भविष्यत् ननायेत तरिं बङ़्लः शिखिनो ऽन्धकार्ः। सर्वस्य सन्म च भवेत्लु सर्वतश्च तल्यं परवमविल्ते [ऽ}जनके ऽपि यस्मात् ॥ 10 इत्यादिना [19९] [मध्यमकावतारात्] परत उत्पत्तिप्रतिषेधो ऽवतेयः ॥ प्राचायबुद्धपालितस्त व्याचष्टे " न परत उत्यग्यत्ते भावाः ' स्वतः सवषेभवप्र
(6)
पङ्त्।
न
४ प (8) [ध्यताधनविपर्वपं [७ घाचार्थमावविवेको द्वषणमाङ् † तदत प्रङ्गवाकलात् ^ प
1) €. ¶ 2788. 2. 361 € इपर.
2 १. पन्य हिष्रम गुषुखप'
9) ¶". दे किल् मेतसप == 0100ध्व्. 4) == 1. 5 (00४ 9}. 229 1णध्म).
8) 7097128 1& #€४४०. -- ९९४6 8४०५९ ९8४ 18 14र०० तेप 09]. ए; र्णः न~ 06888 }. 18, १. 3
6) 100० इ णा, 9. 1898४ 1.8 (५. . 14, ००16 1); (९07०0०४ १४०8 ए 0२४१). ४९४ (101. 499 5) ४१९८ 168 रश््7168; #व वाव (2६. , ,; 45४ 207; अकाण्वम. ...
¶१--7) दध १४ १6 ए08४ 2४1१९1४ रेष, मे @ घनन चनुन््परि नु एरमुपरिुर | 0 ४ पर.
उ र यन्मयः कगुपन समम् | गुरसतहुमसः परुगुगुम र सम युमेमपवस श्प तुय मुर | वृर ङगुप्मस जगुर पन्न,
-198) प्रधमं प्रकरणं 37
कृलरा ' स्वत उभयतो ऽकेततो वा उत्पश्चतते भावाः कृतश्ित्कस्य चिडत्पत्तः \ इति प्रा- कूपत्तविरोधः। श्न्यथा सवतः सर्वसभवप्रसङ्गात् ' सत्यस्य साधन षणानत्तःपातिलात् ' अरसंगतार्थमेतत्।
(4 (5)
एतर्ष्यसंगताध , पवमेव प्रतिपादितवात् ' हषणात्तःपातिबाच्च प्ूप्रतिन्ताता- धट्वषणेनेति यत्किं वचिरेतत् । इति न पुनयत्न घ्रात्थीयते ॥
पतिर दगुषवरिम १ मूर पगुषिय् पशुप | गुम सुं प कममर विस मससरुपु सपन नसु०१ | दुपसमु 9 देत पम मुर ७ सुम र्थि मेषु | भूमे मुमु ननि मेपुय एषति | 0०८७ 008१०.
४४९१३ (01. 49४ 5) 16 ४९४४९ एटऽ८०४€ १९४ १8112068 0८ प3वणलटणः; (३ 8
| पम् २1> सछप् ५) (४ 2. (¢ ~< (ध ९ उत (५८ १० ९७५ एाण३ 1 भे) ८ सममः
8) 1.68 ण णा€8 १८ 5८८ ५ ववकक1८ एदप्व्, #व कावा... , 800४ १९8३ 2१7५- 80१04 45 (१०7 ६-0९8808 }. 15. 1), 62 ९1168 ९णप्र कए ६ 468 ९०६6१०९०८९8 104१८: = ९५४६१४४ ०6. 7 206 [28 [९०0४ 16 ]०णा, १००८ 1 120६6 ९०१३०६४ 18 णण. (पमः ३१३00. 66.70. 24, ०. 6) ~ त 7 ३१. ४६६१. 483. 19; ४०१७८ 27254744 57470004)! ‰7द{15९10/470॥ 524041/042.
1) ४ ००४०१४९ १४०३ 18 ब.
2) ¶१9. = कवन.
3) 797६8 ¶79. . . -47त 5ददाकाव - व764१0द ०0 दरद.
4-% पम ध मुमुपदभय' मेप" म' परमे | बु िमृर पतेम पतिर 8४] मुर | गुक्ुब्ेम समप दुषु सुमृष्येमुपर वेदपद्यस,
< > » < © © [कृ = र पर | सगे एर मयर पे शेम | रेभम् शु पर
8) 2088. {दव क 7४. 1/९ पिदा ९०00० ल १०९ ०६६३६०0 ९०4 द} # 45८१
अत्त 4१ १250४ (८ == 163 7880णाला ९०१३ १९ ए ११४१ ६१३11\3, 60706 1. 3);
19818 011 [€९४॥ (०८: ०८६ == ५५ १४८ ए 2१२४११९४ ५९०१ १८ ११९. &. ५ १९४३०५४ }). 89 1. 4.
6) ४५८ - 11१४ © ०१८३४ 28 {1800४ १४१०३ 16 प€ढं9 पणं १०००९ कावकवपमा (ऋ) ९५८ [६1-9४-92].
38 प्रत्ययपरौत्ता नाम {10- द्यामपि नोपत्नायत्ते भावाः ' उभवपताभिकितरोषप्रसङ्गात्\ प्रत्येकमुत्पादाता- मथ्यीन्च । वत््यति ङि" स्याइभाभ्यां कृतं इः स्याट्केक।कतं] परि । इति ।
श्रङेतुतो $पि नोत्पग्यत्ते 5 रतावपि कारे च काएणे च न विग्यते^ इति वत्यमाणदोषप्रसङ्गात् ' गृ्धेत नेव च ग्द हेतुप्रन्यं | स्याग्रहदेव गगनोत्यलवर्णगन्धो ।" इत्यादिदोषप्रपङ्ाच्च। 10 श्राचार्थवुदपालितस्ताक् , घरेतुतो नोत्पग्यत्ते भावाः सद॒ च सर्वत सर्व्ेभव- प्र्ष्। -~~~ " खतराचार्थमावविवेको हरषणमार् ' घतरापि प्रसद्गवाकालात् ^धदि विपतोतसाध्य-
1) ४५4१0511: गुरि शस सुः सविव, चुनि न |
2) == ओ. 9.
9) = भा. 4.
4) 119. = ४४42.
2) ४४00६०३1 ३* 2८३८४, ४1. 99 (0). 2588 7); एणः पण३६००, 1०८. ५४
6) 8४११०811 १३ (9) 1629 1) 1०५४६ [11/71/1111 1 {1 11 56, ८५. €&† ५-१९६०४8 2. 39, 1. >.
7-7 गचिन पयस्तु डम पुग गृरष्यय नगु सूस उमन्मयन्निसुसम|ेनिढनिवश्रुर २ |पृरसवुरस जुस शम् नुव र| विसु मपु सनो चिस [र्न भरर न्यमप प्र | दमय न्वसमुुरयरुसप
“4 (र स; = 4 १५१ म ग (= य 4 हम 9१3 शु | नैष नत कभ ~ त
-190] प्रधमं प्रकरणं 39
पाधनव्यक्रिवाकाार्थं ष्यते तरेतइक्तं भवति ' हेतुत उत्पस्यते भावाः कदा चित्कत- धित्कस्य विदधत्यततेः , घारम्भषौफल्याच्च इति ' सेवै व्यौव्या न ुक्ता प्रागुक्तदोषा- दिति । |
तदेतदयक्त पूर्वो दि्ैरिकात्' सत्ये ॥
यञ्चापीश्ररादीनामुपसंमररार्थे तद्पि न युक्ते ' ई्रादीनां स्वपर्भेयपततषु य्ठाभ्यु- 5 पगममत्त10४भावादिति (7). 14] ॥ तस्मात्प्रताधितमेतत् ' नाप्त्युत्पाद् इति ॥ उत्या- दापेभवाच्च पिद ऽनत्पादादिविशिष्ट प्रतीत्यसमुत्पाद् इति ॥
शत्रार् ' वलेवमनतपादादविषि् प्रतीत्यसमृत्पादो व्यवस्थितो भवद्धिः ; यत्त- भगवतोक्तं । घवि्वाप्रत्ययाः संस्काराः घवि्यानिरोधात्संस्काएनिरोध इति
तधा) 10
घनित्याशच ते संस्कारा उत्पादृव्ययधर्मिणः। उत्य कि निहध्यतते तेषा व्युपशमः सुखः ॥
90४ १९ 1व्कलश्वकव 60४7९०९6 808 8 0 र 2१1१618 01. 502 5, 9४ गि. 539 3 णय 809४ 10६०0४४३ 168 8 प्! ४0 ¶ 88 (018०८४०० १९ 1५10४ ९४ १९ 1 वक्थ). -- 16 0१68९०४ 2288288 ४ 1०84 पल € १7706 ४ ०068 1660€1610९8.
8) ४५४... .... (ध्न ९8६ 16 व6श्नगृएन€फ€य४ १५ ए ०३४१7९३ शहा ४ (श्ण ४. 18. 1 ९४ १. 87, ०. 8}. 4 76076 (ण्ण 6 अदवाकथ 18 िणा€ वल ० व्व एकन्ण्य (== $@दा,‰५ १6 8०११४४१ ह 11४४), ०9 ०0्€ण॥ € ४६०४८१६९.
1) (0. = ०१४१९. ©. 15. 1. 2) 198. कावा2}05वकफ0 तण्डव १४, ९०० क४तव ध. ॐ) &१९8४-2-0116 1४ °४दद्र/2 १०९ १०0०6 8४०११४४} ह 11६४४ तप कष्ालण्द्क १९ ,. १ ल ©, © 4 ह्मम् परवमय ~ भरट (युदुरुर्षु)) थ. शफर 2.91. 5. ९) 7४. बुर एन" "'" "प यश्य ेम् धमरन केसपुप दे प" 6) एकप न४्०अवृ्€ वण एधतु ४७५28.
7) 0४६ १४०४ 8. एष्ध्लणः १९ 0198, ©" 44 (8३९०४१६) उ. ॥8., 8९६. 1896, 2. 300} ४१९८ रशा 2०६९8 क्ल्य श्वय . , , | चव तै ऋषिम १९४ चश्वुका१० ३५2० |
40 प्रत्यपयरौता नाम | [10४-
तवा उत्यादादया तघागतानामनत्पादादा तवागतानां स्विततरेषा घर्णा धर्मतां एको धर्मः पत्तस्थितये पड़त चलाः प्रादाः । दी घर्मो लोकं पालयतो हौश्ापन्राप्यं चे- त्यादि।
तथा ' पदृलोकादिद्धागमनमिदहलोकाच्च परलोकगमनमिति 1,
एवे नितेधादिविशिष्टः प्रतीत्यतमत्पारो देशितो भगवता ' त कवे न निर्यत इति ॥
“एवं निरेधा्यः प्रतीत्यपमृत्यादृस्योपलभ्यतत \. घत एवेदं मध्यमकशात्ं
1) एण 887१8१274 2128. 21.8 (४8. ४. 141), 8०११५. ६. ११1१. 150 (.477.7) 4 0 01008772]. १. (80५. 48.) 231 9 (२१९८ 12 [द्लणा९; ऽकधवालनछवा ... .), 11885. 236. 16; € [0४ 12 णि ्ण1९ "द्वद्द चष्ट &1॥828. 16.18, 2781189. 273. 21. €
प. (रन ममभयज कषर, गे ०१ रिम) 6०00716 18 1९८्व्ण76 ९$ढ; 110601९ ए8€ ६४00९६० १९ 0७0०) (८52) ` 0०१४ ९९ १०१०००६९. -- क. ४०४. 94. 15 8६/॥६(52 74१११८१2 ४5८241942. -- 1.2 {070प1€ वः 12 54 दव्म॑द १९३ व71द745, 1086166 4208 1९ (ह 118४४ १ ३३६7४ € 71€छ €०गाणप€ 0९8 (०फा१९६४६९०78 07211294 ९8, २४
भ प्€ वणा भणटाला (क्दवाकव्मकदद्कः एण 0०क€ा४ ^. पि. 1. 286. 6 (ा. 184), 8४१. ति. 11. 25. 19, ४2१४६६0 प ४. 2 € (मणा. 1, 91158४११ त्}8 144 10 0०6
2) 119. ११००६४९ तुच
ॐ) 7018, पप््© 0४ लव प०पाकणा९8. अ. 0087728. 1.22, ४, ४०४. 118, 60110678 209, (27760 248, 70. 8४9. § 58, 71, ९०१1१. 509, ४81). 8.1. 261. 4 ९८८८० १८ एककल ए्द्तादा१॥ णद 5वकव कुद 50१ 2८८७११५)१ ९ ०१४५0१4) {11९ (20. ,.. . + 4.9 0141. 1८. ४. (8०6९..48.) 9}. 2509 7, भ ४४. 77. 65. 17, 81-4०-10 - 420 प (ण€6 6पंण€॥) 2. 126, €॥६.
4) एणा [४1१०६११४ ६ 42. 2८८-१0८ एश्प्ा४८ 5 भ्न द ब\711901द (148. 7/., 40 ्रवददा८ 2७८2 ्क् व कद्रव्यूनणि ८८. 49. न. 1. 2. 81, 1» 2. 116 € 4 १६०३६1११ § 318 (४१९८ 1४ 1९0४प76 5044८ [= (ननु कन्दो. -- €. &11॥§ 88. 105, ०. 2, 136. 1; 192. 1, 21०० 208 7४१४1१8, 00.811, 7. 20 ००९, र. 1. 469. -
8) 1.6 ¶*» णपा एा€ 1€लप्ा€ ए क01€ ; ०५१५४४६८ (भगु च) 1.6 8९०8 09४ €्€ द्द १८ 5द्कण्ध०कोम
6) 20188. ४८1 ९४८) वद द्व्य.
4) ¶ ४. (पन पुस" निजुन्पः; 1110520 == ४, €ग1€88० [198 ६९०-
०14०९. -- ०©१९७॥ 287८6 ¶०९ क्लतणा€ ए9्ा]6 वप अण्दाद. , , , 9
- 118] प्रधमं प्रकरणे 41
प्रणीतमाचर्पिण नेषनोतार्धमूत्रात्तविभागोपदर्णनार्थ । तत्र प एते प्रतीत्यतमत्याद्(प्यो- त्ाद्टप उक्ता न ते विगताविश्वातिमिरानााल्नवविषयस्वभावापेत्तया \ किं (79. 149] तर्क विग्यातिमिरोपकतमतिनयनक्तानविषयापेनया । तचचटर्शनपिक्तया - तूक्तं भगवता ' एतरि भित्तवः पमं सत्यै पड़त श्रमोषधर्म
निवीणं ' सर्वसेस्कराश्च मृषा मोषधमाणः ` इत्यादि ।
तथा \ नास्त्यत्र तथता वा ' घविर्वधता का ' भोषधर्मकमप्येतत्ः प्रलोधर्मकम- प्येतत्' मृषाप्येतत् ' मपिषं बाललापिनी ' इति ।
तथा ' ° केनपिएडोपमं दं वेदना बुहुदोपमा । मरीचिषदृशी संज्ञा पप्काराः क्ली [11भ]निभाः। मायोपमं च वित्तानमक्तमादित्यबन्धना [इति
1) र<पमि. र्मे मर्; सपाः द मम् (८1०8 2.43. 4 ०४४१ ए 11 (091. 822 0९); ४. एप, 74.4, 8०016. 1, 8. १०८. १८४ {१वत, 4 2१0. ४४४ ४78, 01. 2589. -- & १४४०४ ६{३12फ ४79. 12.
2) ¶०7 100४ उ. 1; ५५6 १ 8०१1५. 12. 2 (0. 244. 13) ४१९८ 9"10201018910188 [दलप९७; ~ &. ॐ. प ०४५. 245. 907, 908 795द 10 3व वाका.
3) 2088. ४४४ । 4) (०6 कृषाः गूधो येम रमना ४ पदिस््ेरु' (= क्णरकनकममे,
8) &. ©1४8§ ढ8. 261. 8 #१$क्ा१०७दवाी क एव्ककन्व्कणा; क. प्प. 245. 906 एवबन्प्रल्छककवा ; ४ 8110. 11. 261 व१८ब्द . , . दद्द १५४८८ १ ४३द 70 व्वा, १2७2. क्रक ९1400) 00४८, एदन्बद्चबा१; 8०४४४०1१ 8४8 757.
6) 20४०4०९ १४०8 16 110. ~ &. 1,४111४९188४7४ 209. 4.
7) गा. र्दे (णण). ~ 6.8४. प. 1, 148. 8.
8--8) ©४€ १8४०8 8४7 ¶ ०४६४४०1४ इ १ ४ 111. 142 (22, 9४, 18) -- ५१८७ ५८४ १४180168; िन१४2 (6). ४, प १०४. 139. १), प्व्वव्बकद) वदद
9) प्रण ४. ए ०६. 189. 15 दव्दन्क१का५, ०१४१५. 1. 19, ' ६९0, [०६०8
9. 141, ए 7161017 2018116, 84. 58 (भ. 2.7. 8. 1866); 2१८१९१4, ९५९२५वद, कष्वच्ल,.
र. प्र ‡०४. 139, 94. 14. $ 10) 1.6 (9. ११०४९ दिसु वपन च्= ४, &# ९००६०१०९ € 07086: श्न ककष
[+^
10
10
42 प्रत्ययपरौत्ता नाम [11४ एवं धरमीन् वीक्ञमाणो मिततररन्धवोवान् द्वावा यदि वारात्रौ संप्रत्तानन् प्रतिस्मृतः" ्रतिविध्येत्यदं शातं ेत्कासेपशमं शिते ॥ इति निशात्मकलाच् धर्माणामित्यादि । यप्यैवं देशनाभिप्रायानभिज्नतया संदेहः स्यात् ' का छात्र देशना ताथा का नु खल््वाभिप्रापिकोति \ वश्ापि मन्दबुदधितया नेपाीं दशनां नीता्ीनवगच्छति , तपो- हमयोरपि विनेयनयोर् चार्यो यृत्चागेमाभ्यां संशयमिष्याक्ञानापाकर णा्यमिंदमाएल्य- वान् । तन्न न स्वरत इत्यादिना वुक्तिरपवर्पिता । तन्मृषा मोषधमं यद्वगवानित्यमाषत । स्वि च मोषधरमाणः संस्काराः ' तेन ते मृषा ॥' पूवी प्रन्नायते [1,४. 15५} कोधनित्युवाच मक्मूनिः। पेता ऽनवामो हि नास्त्यादिनीपि पिमं
। 9.१; + 0/1 1.111.111 समन्नयति सेन दण्ट शद्ध € कफयकाक्ः
। वाशकद्धनः (कसय सं सम्र) भः ) दततक) = उवी 25401८4८ -2 दतः
वारव ०१४११20४ 2१ ९८55४८६८ ८ गवन) १४०५४.
1/8 ९६२०८६९ पृषं ए7६व्टत€ (कष्ण १८०) ९४ ८८ ४88३९६6 -- १४९ }€ €701§ € 1088 ९8४8 1'01;&४४1 [16 एद्वत8 वकः कोर ध्ः$कणा १9 ९३६ {१९8 19८0766६} -~-- 8991 ९1६६8 1018 24 2 9. 3 ०४ 1९ ६9. 06४९४16 ४०६ 186४९
1) 458. ‰14170019186 ॐ८त९, 17१९१०१९. -- €. 618 इ 3. 195. 18, 317. 10, 214 7. 8; एषा: कणप्प्ट्वा ०, शश्च (उ. ९. ए, 8. 1884, 2. 72, 4 ६. 2. 1९. 228. 9 € {66४}.
2} एकः }€ 1४)80प्णलफटणय € क 1 हलाणप्छः १०१, ऽणः ९९१६ िष्यप्र€, ब. ^. 1902, 17 }. 268, 9. 8.
3) ४८४ {541०9 4) -4९६8४8 14. 3. ४) 1५1४ पा. 1. 6) 108 3. 1.
1. त
11४] प्रधमं प्रकूणं 48
कात्यायनाववादे चास्तीति नास्तीति चोभयं ।
प्रतिषिद्धे भगवता भावामावविमाविन ॥ इत्यादिना श्ागमो वर्पितः।
उक्ती चाया्तयमतिमून , कतमे सूत्रा्ता नेयाधीः कतमे नीता! पे सूत्ात्ता मा-
गीवताराय निर्दिष्टा सु उच्यते नेया्या। पे सू्नात्ताः फलावताराय निर्दिष्टा सम उच्यन्ते नीताधीः । यावग पूत्रात्ताः शून्यतानिमित्ताप्रणिितानभितंस्कारातनातानुत्यादाभाव[नि- रात्मानिःसल्नि्नी वनिःदरलास्वौमिकविमोतमुला निरष्टाः । त उच्यत्ते नीतार्धीः । इयमुच्यते भदत्त शारढत्तीपत्र नोतार्थमूत्रा्प्रतिशर् णता ' न नेयार्घसूत्रात्त प्रतिशर्ण- ता९इति । | |
1) 1008 ४. 7 (2188 : . - -€व ०804 १... .).
2) प्रभ छ &88., 7. 827, 328, १०४४ 18 8007166 ` ४०6०6 &४€ 14 1 § ४ 278४1 - ०1706६४: «016 8४) 7 $छलोाल€य ९०0 व्ण दाल्यत), ` ४6 १०४ [लो पण्ला ण्- 86016066 ^ णडा 6९ इनक कतत, क16: 100, 81९02, [९१९०, 1९€णवलाः 2160360, 2०१1४, त€ ०९61०4९, वलाः 000०१९०6 प. 8. भ.) १1९86 ए0ला€ाः € भह€ण व€य
8९117861 31१.
>। {€ ¢नु15॥€ 201882६. (19. सर गुरम्गु समगर सेमसरुडुम. | सुगर | गेण रिष पुनः | गृरजमु सः | मेरभसश्नेषपुर | मृसपममा सून ,
[किः प
येडप्यस | + | हमपश्कगृसणु वमेपय < | स्ुगुर्येमेम्, धाते समगृमेमि वरण वय मेम इयम से केः ङतं | 9
6 (11८5४ @१८-5८{{ ४८१६4 - 06८4-2 ९८१४6 4-"८ ववद -१ १८14-1 १0504 व्पःद-९८वव्प द भद्द वा लद ४द्/4१1९, ४९5४ (व्हावा $वडषक्धावघ्लाद भवा, १८१९४.
4) ४७७, पाष, राण. प्र, नार चु ममु प | स्पगुर्वेमेसु पसः ठ् | दम पुन्पतिः समि पसु, पशमुय दुम्गुिः ~ 19 भाण्9 26 ९96 काक 8781४ ्०ण1€€. - ए९क-10, एणृपंकण, [मव (अ ४8४९१1६९), 2102/॥४, व, वद्ीक्रच,
वव, (वववं (70. ३.) अदा (2118५. 8.). -- णाना, त. एए०४. 78: १४१, किष, व.
9रहभुय ४० 1४८6 ९०४१५९०८९) 10 €` ०४. ~ 1.68 १०६५९ 014 ६5817808, ४. ४१०६. § 74, 00870 83417४08 बना, ^ ०१1१). ४. ४. (8, 877. 4759), ५५6
च, ^ 8, 1902, 71 ?. 269.
५4 प्रत्ययपरीत्ता नाम [11१
तथा चार्थतमाधिर्तनत्रे । नीताधमूतरात्तविशेष ज्ा[11४]नति थोपदिष्टा सुगतेन शून्यता । पस्मिन् पनः द्लसदनपूरुषा ६ नेपार्धतो्नानति सर्वधरमीन् (। (7५9. 15४] तप्माइत्यादादिदिशनां मृषा्धीं प्रतिपा्पितं प्रतीत्यपमुत्पादानशनमारन्धवा- ज ं 0 | ` नेनु चोत्पादादीनामभवि तति दि सर्वधर्माणां मृषालप्रतिपाद्ना्धमिद्मार्न्धवा- नाचार्यः ' नन्वेवं तति यन्मृषा न तदस्तीति न सत्यकुशलानि कर्मणि ' तदभावान्न सत्ति 10 इर्गतपः , न सत्ति कुशलानि कर्मापि ' तदभावान्न सत्ति पुगतपः, सुगतिडर्गत्यतेभवाच्च नास्ति ससा इति सवारम्मवियध्यमेव स्यात् । उच्यते । सैवृतिपत्यव्ययेलया ल्ोक्येदेसत्धाभिनिवेशस्य प्रतिपक्ञभविन मृषार्थता भावानां प्रतिपाग्यते ऽस्मामिः। नेव बाधाः कृतकायाः किं चिडपलमत्ते यन्मृषा भ्र॑मृषा वा त्यादिति ॥ श्षपि च *येन कि सर्वधमाणां मृतं परिन्ातं , किं तस्य कम्पि सत्ति 15 संताप वास्ति ' नं चाप्यतो कस्य चिदर्मस्यास्तिवं नाप्तितं बोपलमते ।
2) रू, श्थुल कान, गत; श0. .तनि-ुम म् 2) (९४४ 8४८6 ९8४ ©1४6€ 100४ ४ 2 ए. 11 (828 10 ०९); €11€ ४6 86 ध०प € ४8
0878 12 22116 शल॑प्लालफाकण४ एपणाो€€ तप 82020017} 8 (२४३९, 1), ० 1४ 19916 244 5८1४०व १1१14, 68६ 6०फाणप्ा€
3) 1.6 119. & 16 एण.
4) 1188. ह ¶ ४. हेससुश्ुमय १८ वेग वेने
6) ४११०९ १४४०३ 1€ (४.
¶7) ¶190. = ११577.
8) 719. == 41144.
~:
4 = १॥ ४
--12४] प्रधमं प्रकरणं 45
यक्ते भगवतार्पलक्रटमत्र । चित्ते रि काश्यप परिगवेष्यमाणं न लभयते † यत्न लभ्यते तन्नोपलभ^यते यन्नोपलभ्यते तनेवातीते नानागते न प्रत्युत्यत्र ' पंत्ेवातीतं ना- नागते न प्रत्युत्पन्न तत्य नास्ति स्वभावः ' यस्व नास्ति त्वभावत्तत्य नात्त्युत्यादूः ' पत्य नास्त्युत्यादस्तस्य नास्ति नितेधः ' इति वित्तरः।
यत्तु विप्ासानुगमान् [10.169] मृषा धर्माणां नावगच्छति "प्रतीत्यमावानां 5 त्वमावममिनिविशते ' [1० तं धर्मे धिदंसत्याभिनिविशादभिनि)विष्टः तन् कर्मप्यपि
के क [र = कि क त [र (7) = च ~ कः ४ [र् ५ करति पतार् ऽपि प्ति विपयातावास्यततान्न भव्या नवाणमाघगतत ॥
,८ (न्क ४ ४७०७-९ [न ॐ [ने ( 8) किं पुनमृषास्वभावा श्रपि पदायाः सेत्तोशव्यवश॒ननिबन्धनं भवन्ति । तग्चधा मा- [० ~~ तमि्भितश्चोपचितकण (9) = ~ वायुवतिस्तत्स्वमावानभि ज्ञानां ' तथागतनिर्मितश्नोपचितकशलमूलानां ।
1) प्म्वण एक 3 ०7००, [०६7 562. ~ एणाः (11888. 283. 15 (235, 0. 1); €}. 261. 4; 8०१1५. { [‰. 106 (9. 338..16).
2) रः ++ ‰ वास्"
8) र |> >=
4) (४70. ५५॥४/५4471 द.
2) 2088. 27५६६०1, १2०१2१01. 10. == 01४7१29 5६व7द यव) 211४ ०११४४०२ रनपढस एम ङरगुसमस' न्मु परम्|
9 7१. कस दमन" नुपदेमयर मन्मिपनदिमु रये सुस भन पर दिग नयुग्सर |
¶) गे+ ठे ~ ©. & 1४$ 28. 209, ४. 7 (१५-२५-४५) € एदा ००४० (4 28. कि. 1४. 870. 9, 2०६8. 2. 1. 13, 14).
8) 1. == , . . ° एव्वं ४ ऋदु , , , , 8१११९१८५ एककरः, {५1,12- ` 1.4. ११/०९८८2११८1 ५१. -- 800 थव == गुममसदम मनसः ; ४४८१ स= ममननम
9) त. ~ © 1४. 1 0. 521; २८४} द. 442. 14; 1९०, 1०६४३, 2. 225,
४. 1; 137४१. 22.3; 01४. 166.7; 9. १०६. 139. 9; 1४।४द्र. इषा. 9 ०१४ १44101174६0 2९010.
46 ` प्रत्यय्वरोत्ता नाम (12४-
उक्तं कि दाध्याशयपरिपृच्छामूते " तथां कुलयुज्र मायाकारनाये प्रत्युपस्थिते मारयाकारनिर्भितां च्ियं दष्टा कथिद्रागपटीतचेताः पर्षच्छार्वभवेनोत्यायासनादपक्र मेत् " सो ऽपक्रम्य तामेव ल्रियमशुभतो मनपिकरुयात् ' ्ननित्यतो इःखतः शून्यतो ऽना- त्मतो मनि कुर्यात् ' इति विस्तर्ः॥ विनये च " यल्लकाए्कारिता यत्तयुवतिः सदूतयुवतिशून्या सद्रूतयुवतिद्रपेण प्रतिभासते \ तस्य च चित्रकारस्य कामरागात्यदीभूता ॥ तथा मृषात्वभावा श्रपि भावा बालानां संक्तेशव्यर्वदाननिबन्धनं भवत्ति ॥
1) दगु रेयसम्पदुषेय " " " " == (द्वत. € 12888 ९ ९8४ ५१४6 &१९८ १8112768, 0720768 16 {१४०६३९४ १६०, 1008 २५ इरा. 14 (नि. 1448 २५ 90९). -- ^+ 40१६९०४१ ६8811 ८०१४०४8प६7४ (*शै ४०६. € 11578.
2) #. १०६४. 248. ६ 4बप:50 द्व्य "कुव्कत्कल्यभदष्द्क ४८ - ए ०१५1६. 18. 81 (. 271. ४४): द्युक्षः +दद्वड वकद + व्क.
3) &@५व४ == 2811 ऽव्कद्ढ, &ा. ४114९78, 8. ४०८. & 11८5 28. 296. 7 € ए ०411६. 2. पा. 118; वव्फबयन्डकब्द क0 द्वः 5८ण्व्छ 4ध्व्यनवव् ऊव्नदल्लन्लव्व- २१४१४ @0/ 104116६008 449145/@ 77 == ९०६8६ 074०० ^ णग ४ ९००88676 800 0०) ए6णा' ¶०९€ 66 प € €. ,..,. -- दव ९१८१/द5 80४ 60668 7 0.- 8. 1.23 ‰1, 0818 1€8 16८7168 068 (88, ©00716 6५6]1€8 १€ 1€वा{लणर, 8०0६ 10८016८168; 14 ०४१५४. प. १. (8०५. 48. 9. 3079 8) ००३ (०06 -19 प्ाहैफ© 11516; दच्छद, व्व्रमढर (= (९), 0व्मवल्नील्यवव्/५ (== वल्कः दण कक), कष्ण कव, कावर, -- 1.6 त्णफा€0४क7€ १७ 2804116. # वा. 116 ०€81816 048 धा 880861६. ए०ण ३ 0४६ १०८७ 7९०6006 18 ४९78100 ५४९४1०९) 11 ॥०१४०€ व९पञ € ल्द््मा§ः 19. एलां द6 &०९89०पव
४ €९11€ १€ 14 90142. ६. >| == 1111) ; 1४ 8९6००१९ &105& निकिन्यः
(04.1.18. रिरगुष्य €&४ रिदिगृदमुप == (0४, 5०६४८, 1०4. ~ चण४्6 पिभ पाऽ, ९०९४४187. (५०. 80 7, ॐ1 (0४९8 7 ॥.- 8. 2. 50): 4५५४१५०, धवय, द्९७०, ५ ४2८००. -- ©०¶् पध 6ण78 (व फक्पा(76, ९४८.) 4 > ए. व, 1४. 406. - 1४888. 196. १-11) ५४९.
4) (9. निरुभिपनिसः
8) ०४४०९५० 2१५० 8०4०6 0४०३ 7‰0., 86 780०6 €ण की€४ ॐ }*९द€णफृाह ए6- ८6१९४०४,
-1२॥] प्रधमं प्रकूषे ,
® ~ {1} ~ ~ ~~ {| ष ¶ ^ तापर् लकरूटसूतर । खव वल् तानि पमात्रापि मिततशताननि भगवतो धमं देणना- मलतरतरत्यनवगाकमानान्यनधिमुच्यमानानि उत्यायाप्नेभचः [10.101 प्रक्तात्तानि । शव भगवान् [त्यां वेलायां) येन मर्गिणिति मित्तवो गच्छति स्म तस्मिन् मार्गे दी भित
निर्माति स्म।
र तानि पच्च भितशतानि चेन (मर्गिण। ती दी मित् [निर्नितकौ। तेनोपसंक्राम्ति स्म । उपतेक्रम्य ताववोचन् ' कत्रावष्मत्तौ गमिष्यवः ॥ निर्भितकाववाचनां ' गमिध्याव ग्रावामरएयायतनेष् \ तत्र ध्यानमुला1शप्यर्शविररीर्विररिष्यावः। यं कि मगवान् धर्मे टणपति तमावां नावतहावो नावगादावंहे नाधिमुच्यावके उन्नप्यावः संत्रातमापया- वद ॥ घरथ तानि पञ्च भितुशतान्येतवोचन् " वयमघ्यायुष्मत्तो भगवतो धर्मदेशनां नाव- तानो नावगाहामे नाधिमुच्यामङे उच्चस्यामः सेत्रत्यामः संत्रातमापव्चामहे । तेन वय- मरएयायतनेष ध्यानसुलस्पशविररि विररिष्यामः ॥ निर्भिंतक्राववोचतां ' तेन सयावु- ष्मः पंगाव्यामो न विवदिष्यामः। श्रविवाद्परमां कि भ्रमणस्य धर्माः। १५५५५ ॥ क- त्यनुष्मत्तः प्राणाय प्रतिपन्नाः तान्यवोचन् ' रगदेषमोरानां प्राणाय वयं प्रति-
1) {1४. सरगुर मकु प्डेगृष ८ चिब ~ एम 1€ 10616 {९४६९ ल€ 10४ २५ ++ 1. 33. । 2) 1.6 ¶10. १०४५९ पसमुृमिपय == ०0924 [70)1\4१, ९. 1२ ९६] इ १. ४. 38.85.
3) 1८5 110४8 €०४€ 0४1९०४0 €5€8, १265 16 चण € 19 लोप्विप्०य ४५ > गा.3३. ~~ ११11474, 1219102}. 442. 14
4) 5 दवाव शप्रो, एणः ४. एप. 245. 649, 255. 8. 5 ९६ &1॥४585. 200. 18 ०४ भ. 3९०१४11 ऽण9€ 1,91.१. 351. 19 € 24 र. 1. 628
2) व्धष्ट्वव. ©. &1॥5 88. 268. 18 दा 7८ पध्वददय ६८८ लपव्ाष्वश्वद्ीनमव 0११1८5५) ।१४ (€. 195. 2, 281.14) - #. ए $ ४६. 245. 1159 -- [.०६प8, शश. 38; व भा 10 पला 3॥ [फिट कलाव; करली णि तशृपत्ण् (४५३४) 76001४66 ११०३ 16 ‰13. 07 १६१४) ४00४ 1४: ५€ 8६८०८६९ ग (€ ¶ ४0 ब्४४ 18 ०९१०० ९४80019६, ~ दणश्त दत च्= (1८१८ (6001 १००8 16 8३7४४१३८. (15.11); वनवत. -- 1.68 819 धवध्दतव्चतर, $ 21) 9. न. 1. 2485. ~ 17०४४ 16 ००४१९ 86 01870४४९, 98 168 1001068, १११. 7. 120.
6) €. 1४0४ 9]. 1009. वमार १९४१७ ९४ १०766.
48 प्रत्ययपरौीत्ता नाम (12४-
पन्नाः ॥ [7४ 179] निर्भितकाववोचतां ' किं पुनरपुष्मतां तैविग्यतते रण्देषमोका यान् लपपिष्यथ । तान्यवोचन् ' न ते ऽध्यात्मं न बद्धा नोभयमत्तरेणोपलमयत्ते नापि तेऽ्य- रिकिल्यिता उत्पस्यते ॥ निर्भितकाववोचतां ' तेन खयायष्मत्तो मा कल्पयत [भा विक- ल्पत] ' पदा चायृष्मत्तो न कल्यपिष्यय न विक्रल्यपिष्यथ तदा न त्यथ न विरत्यव \ ` यश न शक्तो न तिक्तः स शात्त इत्युच्यते । शीलमायुष्मत्तो न संसरति न परिनिवांति " समाधिः प्रत्ता विमुक्तिर्थिमुक्तिञौनदू्शनमापुष्म्तो न सेतरति न परिनिर्वाति । एभिशा- युष्मत्तो धर्मैनिर्वाणं सूच्यते । एते च धर्मीःप्रन्याःप्रकतिविविक्त ' प्रनरीतितामायुष्मत्तः पत्ता यडत परिनिर्वाणमिति। मा च पं्तायां “ तंतं काष्ट " मा च तेत्तायां “घततां परित्ा- तिष्ट " यो हि तेत्ायां पततां परिनानाति सेन्ताबन्धनमेवास्य तदव [15५ृति ! संजञवेद्- 10 पितनिरोर्ध्मापत्तिमायुष्प्ः समापग्चध्वम्। संक्ञावेदयितनिरोधसमापत्तिषमापन्नस्य भि- लोनीप्त्यत्तरौकरं घीयमिति वदावः ॥ भथ तेषां पञ्चानां भितुशतातामनुपादायाभवेभयश्ित्तानि विमुक्तान्यमून् । तावि (ग). 170] विमुक्तचित्तानि पेन भगवांस्तेनोपसंक्रात्तानि ' उपसंक्रम्य भगवतः पादी शिरसाभिवन्ेकातते न्यसोदन् ।
1) ©€ 800६ 1९8 6०१ [नगवा ०१वाद७; रणो 7 0.-8. इ! दा € इताः ८८९४ 616९8 $ 10८, (€ धि, प्प 4.)
2) 058. अशरद्छुद; प्रा. रसुमेसनि
8) 09188 16 1४. 5वणप्र्द्द)॥ 24१0द१व7१ १.
4 799. रिनुैष दुर कश्य निनगुपति मसग" = ककय ८८/११ ०बा0, 6011468 2689 ३,
2) = एदा प्(वाा द्काककुकाा = ॥ उप
6) {€ ¶10. ((०फणफी6 ४०३81 नि. 1008); कक्+ द्वाव काव्दवा४४८ ०१७ /५- १1106 {९570 कलवा , , , ,
7) ८१५व्दद्/८; 1719. विरद पमेम् षन् = 1दद ५. ~~ 1.16 0168900 ९७६ छटा
€00०४९, १०९ भ. ¶ १ ०४. 129. 3.
-13)] प्रधमं प्रकरण 49
श्धापुष्मान् मुमूतिप्तान् भिनरूनेतदवोचत् ' कत्रायुष्मत्तो गताः कुतो वागताः तेऽवोचन् ' न क्र चिद्रमनाय न कुतश्िदाणमनाय भदृत्त सुभूते भगवता घर्मो देशितः ॥ खार् ' को नामायुष्मतां शास्ता । शराः ' यो नेत्पत्नो न परिनिरवास्यति ॥ श्राह \ कथे युष्मा- मर्धर्म भरतः । श्रा: \ न बन्धनाय न मेतां ॥ श्रा ' केन युयं विनीताः । घराकः , यस्य न कायो न चित्तं ॥ शराद् \ कं युयं प्रयुक्ताः । घ्ाङ्कः ' नावि्माप्रहाणाय न विग्बोत्पाट्- नाय ॥ श्राद , कल्य युं ग्रावकाः । ्राङ्धः ' पेन न प्रापतं नामिंनुदं ॥ घ्रा ' के युष्माकं सन्रद्धचारिणः। शराः ' ये त्धातिके नोपविचर्ति ॥ रार् ` कियच्चिरे णायप्मत्तः परि- निर्वास्यत्ति । श्राङ्कः ' यदा तथागतनिर्मिताः परिनिर्वास्यत्ति ॥ घ्राह ' कृतं युष्मामि कर्णोयं । श्राद्धः ' श्रैकारममकारपरि ज्ञानतः ॥ श्रा ' तीणा युष्माकं त्केशाः। बराः ' प्रत्यत्तत्यात्सर्वधर्माणां ॥ श्राह , घर्षितो यष्माभिर्मार्ः । राकः " स्कन्धमारनुपल- मभात् ॥ श्राक् , परिचरितो युष्माभिः शास्ता (79. 18१] । श्राङ्ः ' न केन न वाचा न मनप ॥ श्राक् ' विशोधिता युष्माभिर क्तिषीयभमिः^ [180] श्रः मार्तो ऽप्रतिपारतः ॥ श्रा ' उत्तणो युष्माभिः सताः श्राङ्ः ' घनुच्छ्दताऽशाश्चततः॥ घरार्' प्रतिपत्रा यष्मामिरदृ्तिणीयमभूमिः । घ्राङ्ः " पर्वमारविनिरमक्तितः ॥ श्राह । किंगा- मिन घ्रायुष्मततः । श्रा: ' वंगामिनस्तथागतनिर्मिताः ॥ इति खायुष्मतः सुपूतेः परि-
1) 2721४87. 22. १/5 व शद्ष्वा , . , चएतद्दवतवमा काधद्वा४.
2). ६५४. 2. 39 0९; कष्ट एषण १/०४5८ १,९0१2८१2 ४ ‰४- रद ८८.
8) 00 १8४०६०९ 16 &2१८०, 16 १० ९४ 1 कच्छद्श्व्लमव (700, 8101; 4 ००१४. 8४7. 1208 ¶. 2. 7. 8. 1884).
4) प्रण 11888. 198. 10 ९४ 0१. 1. 278. 9 € 281. 7, पण (ापफोकषक्षणा 6 ५२६८९ वद्वा ४8; अद्वद्द्, (५, १११११५९, 4९४१410०. 20 पा 168 8०४१५९8 0391168) 11146८8, 2. 241 (वफकदव्यपल्लदर).
5) (0. प्लिगुरमटे स सनस, पणर तापा ०७, १.१८. वक वनम; & 118 28. ववम.
6) 2¶01 व =. अुगृुभम
¶) 200१. 1. 206.16 वारभदवत एवा. , , (कौाङव्् श्वकः क, कवक वथ्कद्नन, . . ~ ६2६8१. ४. ए. 8 चमाञ्माण्यकभ्ुत.
4
. 50 प्रत्ययपरीत्ता नाम | [137- पृच्छ्तस्तेषां भिन्नां वितर्बयतां तप्यां पर्षदि ््टाना मितुणतानामनपादायाग्रवेभ्यश्ि- त्तानि विमुक्तानि दात्रिशतश् प्राणिसकलनाणां विर्नो विगतमलं धर्मेषु धर्मचतुः वि- शुदं । इति ॥ ¦ | | इत्येवं मृषास्वभावाभ्यां तघागतनिर्मिंताभ्यां मित्या पञ्चानां मितुशतानां व्यव. टाननिबन्धने कृतमिति | उक्त चार्यवज्रमएडा्ांशरारएयां । तम्बथा मज्ञपरीः काण्डं च प्रतीत्य मधनी च
प्रतीत्य पुहषस्य रस्तव्यायामं [च) प्रतीत्थ धूमः परार्भवतीति श्रधिर्भिनिर्व्तते ' प चात्नितंतपि न काएडतनिभ्रितो न मधनोपनिभरितो न पुहषरप्तव्यायामसंनिग्रितः एवमेव मञ्चप्रीरसदिपयापमोरितप्य पुषपुदरलप्योत्पश्यते रागपरिदारो देषपरिदाको मेदपरिदहः। प च परिदारो नाध्यात्मे न बहधा नोभवमत्तरष स्थितः॥
शपि तु मञ्जभरर्यडच्यते मोर इति तत्केन कार्गेनोच्यते मोक इति । [10.189]
॥ ~~ ८ {न ~ न = ~ (6) ्त्यत्तमुक्तो रि मज्ञग्रोः सवधम मेारप्तेनोच्यते मोर् इति ॥ तथा नरकमुला मञ्जुश्रीः + [क (2) ५ 0 क गीपदं सर्वधर्मा इदं घारणीपर् ॥ ब्रार । कथे भगवन्ति घारषीपद्ं ॥ प्राह ¦ नरका मञ्खुप्रीबां
1) € ८8६-४-वा८ १०18 ८१11६6४ 16 क्मावम८ क्ाल्लल४द(स (८.
2) प्रणाः ७-१६७७प४ 46. 6. 8) ग. ई शरवनिस = णाव, -- एनाः प 9) 1०, प, 979, 373
(887, ४24 4. 7.); & ४10} ०८, ० ॐ, 9. 455-474 (^. ४. 6. 11. 250); एप.) पधा. 0. 5485. एप पिश्हा९ा०६ 4९ ९९४८ लोक्दप्तेणा ९5 वदृष्ण्प्रा+ 1४8 ० चदा. 13. - उण }8 रक९पाः व 6६ १द१वृढ १४०३ 169९8810 ए०दा४१०१वृद, वकण (नाल-लं ९७४ १६११८६९) ०१116. ॥.) 9. 58, ०६४९ 3. ~ 0कव्लव्यथ्+ एने 1९२१, 10६08, 311) ००५; 8४८, 4 षण््ठा०३४8 0008८०८ -., 136. 9, 3; वाटा€ छकारं काटाच जंक मादु भदह्ामाप्ठ कणृरभोपिमा काला को इल ए८ 88 # ४९ ४0 धो1€ १९९] 81१0८०९५ ५ € 0ल्९४.
4) लि 60णावा8०भा 1,211६४ 911. 8-4. ६) 138. ऽकीपद्ाव, ०११४७८९) गद; न. 910१. 1. 488, 456.
6) ९पमोप तट फला विप्र हभाकापता९ कणा कणाः १९३ ध6म९8 चुं ०6 १४।ा1६ [83 ८प् €» (ए प्रत्ातण).
¶) ९. . ८८ वना€ (6 1४ फिक्तिभित) (िणा०प).
। 149] प्रधम प्रकरणं 51 ५ 0)
लयृधग्नरेसदिपर्वतविढपिताः स्वविकल्पसभूताः ॥ प्रार् । कत्र भगवत्रकाः समव- । = [14 गृरत्ति॥ भेगवानाक् । ख्ाकाशपमवपरृणा मज्ञभ्ीर्नरकाः । तत्किं मन्यते म्भः . ४ कतकरयोतैतं ॥
| स्वविकल्यसभूता नरका उत स्वभावभूताः ॥ रार् । स्वविकाल्येनैव भगवन् सर्वबा- “ नरकतियण्पोनियमलोकं [2 निने, भ ५ क न~
( लपृधग्ना पं तेनानत्ति । ते. चातत्तमारो पेण इःवां वेदनां वेदप-
| त्ति इःखमनुभवत्ति त्रिषुप्यपायेषु । 8 थथा चाके भगवत्नएकान् पश्यामि तथा नारके इलं । तव्या भगवन् किदेव
पुरषः स॒प्ः स्वप्रात्तरगतो नरकगतमात्मानं संतानो ' स तन्न कथितायां"तप्रन्नलि-
तायामनेकरीह्षायां लोरूकुमया प्रतिपतमात्मानं संन्नानीयात् , त तत्र खरां कटुकां
| तीव्रां डःां वेदनां बेदपेत् ' स तत्र मानसं परिदाकं पंनानीयात् [)0. 199] ' उच्नतेत्
५ ४ ९ = (5) न~
6 संत्रा्तमापयेत । स तत्र प्रतिविबुदधः तमानः ब्रहो डःखमको इःखमिति करन्देत् शोचेत् 10 ५ परिदेवेत् त 0 र न ६ वमिति ।
। ्॥ श्रग तस्य मितरज्ञातितालोकिताः परिपृच्छेः! केन तत्ते उवमिति ॥ स ता- ष वदेत् (8) तानाक्रोेत्परिभाषेत् न)
ध न्मित्रज्ञातितालोर्ितानेवं वदेत् ` नोपिकं इःखमनुमूतं । त त्परिभिषेत् ' नरपिके न (प)
¶ शरक च नाम नेरपिके इःखमनुभवामि । यू च मे उत्तरि परिपृच्छ्थ केनेतत्तव इःखमि- ॥ 1) ©. ०१०१2 (74, ए ए ०. 245, 87, 10. 9) = णडल (प. ए, ए.); गद, ४ (11८४ 2४. 180, ५, 286. 1; ५4०7१०९, ए ४7 ०३1१278, 1, (रए. 1. 18.
2) ४० ४. प ०६. 248. 7855-6. -- 2918 पमकद = ५१००४ ०० शा6 दण स (8 ४५४०४). +
| 8) 2414904 == 12 60876 व्प्ण #0प16 9९४५ ए० १९ (ए. भ .). ~ व. समु १ दुम पुर श्ेमेप = शरणा वणय
4) 6४). ५1; हेषुमे युम ; ५. 8०११४२१8 9. 8, & 11988. 75.8. 8०११५. ४. चा. 89.
8) $१0द9व, &. 3 ०7४. 10४8 409, 701१, ^ १, 6861. 6 (२. प्र,); 19 पण, 1 5क- ध ११द7१ (== ४१९० ०7्१९]). ड 6) 1098. ८९०७०; (1. शरवग ¶) ५५८४) ०, 0१. 11. 596. 9,
52 प्रत्थयपरीता नाम | [142- ति॥ चरथ ते मित्रत्तातिालोस््तस्तं पुरषमेवं वयमा र्भः पुरूष सुपो कि लं ' न ब मितो गृरात् क्र चितिर्गतः॥ तस्य पुनरपि स्भृतिरत्पश्ते सुप्तोऽममूं । वितथमेतन्मया परिकल्यितमिति + ष पनएपि सौमनस्यं प्रतिलभते । त्यग्रा भगवन् स पुषषोऽसत्समारोपेण सुप्तः स्वप्रात्तगतो नएकगतमात्मानं संन 8 नीयात् ' ए[+4४]वमेव भगवन् पर्वबालपृथग्ना शर्दरागपर्यवनदाः ल्नोनिमिततं कल्यय -त्त। ते ल्लीनिमित्ते कल्पपिवा ताभिः सार्धे एममाणमात्माने संनानत्ति । तत्य बालपथ ग्बनस्मैवं [7\9. 190] भवत्य पुरूष इयं ली मनषा घ्नो । तप्यं तेन च्ड्दरागपर्षव- स्थितेन चित्तेन मोगप्येष्टि“ चित्त क्रामयति । प ततोनिरानं कलकवियक्विवादं संबन- यति । तप्य प्र$टेन्बिस्य तै स्नायते। त तेन सं्नाविपर्यातिन कालगतः समानो बड्भनि 0 कल्पसरन्नाणि नरकेषु इःलों वेदनां वेद्यमानमात्माने संजानाति । तच्यधा भगवन् तस्य पुषस्य मित्रन्नातिपालोरिता एवै बदत्ति "माकर मातरः मोः पुरूष पुपतो रि वं न वमितो गृहात् कुतथिनिरगत इति । एवमेव भगवन् बुदा भग- वत्तशतुर्विधरथासविपर््स्तानां सन्लानामिवं धर्म देशयत्ति , नात्र ल्ली न पुरुषो न सल्लो न ीवो न पुरुषो न पुद्रलः । वितथा समे सर्वधर्माः ' ्रसत्त इमे सर्वधर्माः । विठपिता इमे
1) 2088. फक्वणदकाष्का५ठकच्क च.
2) 480 = पदेसपमःतपुस == ५8010, ४१९८ १०९1१०९ शण) 886.
3) द ४३०४९७४ 71 पीवष्दे ककण्यद्क, 210९५ १24० (4 00140. ह. २. 80०. &8., 286 १ 8).
4). 98. 0४००९ (= रद = एपानेनतर, ~ ए, स.) अमः न#. यप -ॐ= 0शष्नोले, एस " " " == ‰५१ ९७०१४.
8) 2१०4५82 = म् रुगु प, 4००० 0० ०५ ०४ पण 05 वण
6) 96 1188.
4) $प्ः 168 पप्र च्ूाङुदकवक) एणः .। ०86००, 1900, 2. 986 € १०६४8. 1. 5, 4.2 &. प. 11. 52, &118 88. 196. 11, 77169415 7018४16, 9 48, 4 90142. ४. »; (80०6. 48.) 347 ४ 5-- 8,
- 159] प्रथम प्रकरण 83
सर्वधर्माः \ मापोपमः. इमे सर्वधर्माः ' स्वप्रोपमा ङे सर्वधर्माः ' निर्मितोपमा सुमे सर्वधर्माः '
उटृकचन्दरोपमा इमे स्वंधर्मा इति विप्तरः॥ त इमा तप्तस्य धरम॑टशनां श्रूवा विगत
णान् सर्वधर्मान् पश्यत्ति, विगतमोकान् सर्वधर्मान् पश्यतति घस्वभावाननावर् णात् ।
(1५0. 90%] ते ्राकाणस्थितेन चेता कालं कुर्वत्ति ते“ कालगताः स[॥5भुमानाः नि-
कृषधिशेषे निवाणघाती परिनिवीत्ति। एवम भगवन्नएकान् पश्यामि । इति ॥ 5 उक्तं चार्योपालिपरिपुच्छयां (
भय दशित नैरपिकं मे पवर पवेन्नित नैके ।
न च वि्चति कथिक् सब यो च्यु गच्छति घोएमपायं ॥
न च काकु कारण सत्ति येरि कृता श्रतितोमरशल्रः।
कर्मवेन तु पश्यति तत्र कापि पत्ति श्रपापित शतल्राः॥ = "ण
1) ४. पक प४. 10. 14. 16. 9) ¶४. = शाकावकद्दयाकष पषण, 8) 770. = # पद्व क्रूणठ उकीष्वक्कप्रंावाा. .
4) 66 #ष्णलय ९8४ ०४६ 8 पा. 19 € शा. 10. ~ एणः ४०४ 1. 7, ए. 19. 1. 98112 97106८४३ ५४66 १808 (188. 68४ € 7086. (2. 18 2016 १७ 4. 8९० - 9911, 164. 8). ~ ९४6 ००१४४६४), नि€द्पानध) 1९8 08088 1709178 2016869 ४४०६ 16 86 ~ | -+* | -““ | --,
8) 088. 020१५४०0, 001. . , 70. = १०४८ 22446 १०४८ व शल्कं अवण्ककववडा द कषद. . .
भय सवम मप च | गर भग कग्नयके | त कगेर द| तुस नित मघ गुगु मुक मेम् ||
801; $ व-६074-045(0- कदम. व न्द्व-प्क्व्व्क) [षट] १८ काप; द्वएकण्वलष्य ०५100159 कक &@/८ छवः [वक] कवक; वाठ द्वाद १ अका. 4
54 प्रत्ययपरोत्ता नाम [15*-
[ने प [न्क ) श [न्वन्द प
चित्रमनोर्मसन्नितपुष्पाःस्वर्णविमान जलत्ति मनोन्ञाः।
तेपि काकु नास्ति कथि तेऽपि रच स्थापित कल्पवशेन ॥ (प ~ (2) ^~ 2 कन (3)
कल्पवशेन विकलित लोकः संन्तगरेप विकल्पितु बालः ।
[न (4) = [कक् (नप् स. । (5) ~~
सो च गरो गक श्रप्तमूतो मायमसोचिपमा हि विकल्पाः ॥ इति ।
5 तदेवमेते ऽस्वभावा भावाः स्वविपर्या्तविठपिता बालानां सेन्केशकेतवो भवत्ति # स्थितं 16) संसार् इति स्थितं ।
[अ ९ (र { यथा च मृषात्वभावानां पदार्थानां संक्तेशव्यवदानहेतुले तथा मध्यमकावतारा- दिस्तरेणावपेयं ।
खना \ दि स्वतः परत उभयतोभ्हेतुतश्च नास्ति भावानामुत्पादृस्तन्न कथम-
10 विशाप्रत्ययाः सेस्काहा सत्युक्तं भगवता ॥ उच्यते 7५0. 20१] । तेवतिरेव न तनं ¢ कि संृतर्व्यवस्यानं वक्तव्यं ॥ इग्रर्यतामान्ेण संवते सिद्धिर्*युपगम्यते । न तु पत्चतुष्टपाभ्युपगमेन सस्वभाववाप्रतङ्गात् ' तस्य चायुक्ततात् ' दप्रत्ययतामात्ना-
1) 98. ऽन्त. स्क कचान्; ग. भर्भृ [पयः ; भ = ण- व?
2) ०१4४० == दमन, छगु
8) 10७8. ण्ठम्, एनम्. ~ 79. यस्यः हमपन्ु (-क).
4) 1088. 01} ©, ऽद्तच, $ ©व, 50 ०. ~~ गभ). ४ ५१.
8) 088. ०७०१०. * * णद्वत; ९७८१८ . , , न्न.
6) पएणंए ५-068808 46. | 4
¶) ए ०7 6-0688४8 18. ४, 8.
8) 088. उवा ९४द १८..,, 09788 16 719. कव्व ९४ अककण 94 ६८ ४८ ९०५... ~¬ &007. 1०0४ 1११. 91. 269.
9) ¶ए ण ५-१९३६४३ 9. ४. 7 ९४ 8.
- 15] प्रधमं प्रकरणं 55
भगुपगमे रि पति सेतुफलयेटन्योन्यापेतव्रात्ात्ति स्वाभाविकी सिदिरितिं नास्ति | सप्वभाववाद्ः । घ्रत एवोक्तं स्वयं कृतं परकृतं दाभ्यां कृतमरेतुकं । तार्किकेरिष्यति उः बया तूक्त प्रतीत्यते ॥ इति + इकापि [15 व्यति । ` 6 | प्रतीत्य कारकः क्म तं प्रतीत्य च कारकं । कर्म प्रवर्तते नान्यत्पश्यामः सिदिकारणं ॥ इति ॥ `
४७५१ [प
भगवताप्येतावन्मात्रमेवाक्ते । तन्नाम धर्मकेतो यड़ताप्मिन् सतीदे भवति ' ्रस्योत्पादादिदमृत्पग्यते ' पडताविष्याप्रत्ययाः संस्काः पंस्कारप्रत्यवे विज्नानमि-
~ (2) त्यादि ॥ 10
श्रन्न के चित्यरिचोद्यत्ति । शरनुत्पत्ना भावा इति किमयं प्रमात्नो निश्चय उता- प्रमाणन्नः । तत्र यदि प्रमापात्न इष्यते तदेदं वक्तव्यं , कति प्रमाणानि किंलन्नणानि किंविषयापि किं स्वत उत्पन्नानि किं परत उभयतो शेतुतो वेति घ्रथाप्रमाण्गैः त न युक्तः प्रमाणाधीनवात्प्रमेाधिगमस्य । (1. 219} ्रनधिगतो स्यो न विना प्रमा- िरधिगनत्तुं शक्यत इति प्रमाणाभावाटूर्वाधिगमाभावे पति कुतोऽयं सम्यग्निश्चय इति न 1४ युक्तमेतदृनिंषणा भावा इति । यतो वायं निश्चयो भवतो ऽनुत्पत्ना भावा इति. भविभ्यति ` तत एव मम! ` र्वभावाः सत्तीति ' पथा चापे ते निश्चवाऽनुत्पत्नाः सर्वधर्मा इति तचैव
1) (कणा ००४ 146१५८९, फंड लमा). 16 ऽता शा. 1.
9) = भा. 12.
3) ४०९ प? 7. 9 9.7.
4) पणा ०1. च५८०४) [४परत ५१ द ३४) ४11. 2. 30 त्ताद्दोपकद ११९४८
शवक; 8४४2874. 3. 8. 13 कव्यते एिमद्विद 14 210111१9 १८ स्दव्य; पे ह - 7१४१६. 845. 11. #
86 प्रत्यपपरात्ता नाम [15४
ममापि सर्वभावोत्यत्तिर्मविष्यति!। श्रध ते नास्ति निश्योऽनत्यनाः सवभावा इति , तदा
स्वयमनिथितत्य पटूप्रत्या।पनापभवाच्छाल्राएम्भवेयण्यमेवेति सत्यप्रतिषिदाः सर्व- भावा इति ॥ उच्यते । पदि कथ्िनिश्यो नामा)स्माकं स्याति , त प्रमांणननो वा स्याटप्रमापत्नो 5 वा। न बस्ति। किं कारौ । इद्हानिश्चयपेभवे सति स्यात्तत्प्रतिपत्तप्तद्पे्तो निश्चयः । यदा वनिश्चय एव तावद् स्माकं नात्ति ' तदा [16४] कृतस्तदिषदाविहदयो निश्चय ` स्यात्पंबन्ध्यत्त् निएपेनत्ात् षर् विषाणस्य कर स्वदौघतावत् । पद् चेवं निश्यपत्या-
1) <ए०णड ०8९्द 88 १6 16१९8? ०008 & 0881 7008 ०0४8 € 98867008.» (@'€8॥ गद्लणा 707०866 ए 18780 ४११ ३१ ४7129.07, 81406618 (== कदा एाकरवल्ा, 1९९ 20४८ 5शव07दरदव8दक व्क, 5ध्वकद, व5 द्वक 010 1८८४८११० 5०११ दथ्य१, 58की४) € 7€&५66 8४. 69.
(णण पि १३ १४३१६४८२ वा. 1. 8 €४ णार.) € इप्{०णौ 168 € ग< द०णह १6 एह - ९१82 ४1011478 (ह 12081 ४६. 248. 2); ऽत्ययः ९४ रद्वा = ऽध्वकददा ०४४० ८507 0424८ 17411212 ००१, 4११८४४व्४, १८वकएद४ट १०४४४०५१ 1 ५ ६५ 5८ व:5@ ९४८ शधद्छव४, १5 1कधद््र0 १८ नवद: ध प्वभाव्छददण्य्व ^ 1.1.11 1781106 € ९8 0111086}00€8 ४०0 1पप्€8 ९8५ ९0114९८ ४१९९ ६५. 8100: . कुव 210 2१८०59१० 11 दए745व 7 क: वत ` व्यूह = शकाष्व णश्कध्षटक्ट८वकदैथवध्द दद 17127404 9 2 (ध7॥ कद व पषलक्ाव्डवका), वकष 1०ष््वक्वदद्श्‰/ दध 0वकष्काद्ध दवः द्व वकषक्तक्णुः 9तकव्वन्ल््व्ाक्यषलणं शष्कः १८ 8८126: 80 1४011. 27८027४ का 2470 ५ का 5९कथय०द१ ९४ ६य/वा क ऋ दद्ध *#ददा८ ५४ ~ 91. 6 ४८०6 ४ ए6€8प्ा)€ 12 08608810) १68 §दहफृा 28 €॥ १९8 कद्वत रक्षा ४88.
7016 8 हए ४-20.1108०70 916, ए. 208. 90. न स „९ न 2 7४. गुम विर सु्ुदपन्युपुय भे सरमनि-कैन, = छषक००९. एण 2960४119 हष, 8. १०८. 21049 द0/११द, कध. ए फ ०४. 245, 249 (रक्ाकव्क), ए०१०१९. 0. फा. 101, ४ ष.
9 0५1९. शूणवध्वकाठ; दण). एषा)8 दवद. व देखत, मदसर्येवमसः ८९ उष ८] भेषु ५२ [9 परम भ = षा 6600864 प ६०8. 168 €॥€8, ०64४४ ४8 0168, € शशौ
9 यायितैः विकरण रेसप वेसशु न्गुणृङ्गु पसवन - "294, शप९णाः एणा ‰40-
6) 79768 16 (19. दद ४्४दवा० शद्नव्प्म = म निगुय
-16*] ` प्रधमं प्रकरणं | 57
भावः, तदा कत्य प्रति्यर्धे प्रमाणानि परिकल्ययष्यामः। कुतो वेषां तेष्या लत्तणौ विषयो वा भविष्यति ' स्वतः परत उभयतो [ऽकेतुतो] वा पमृत्यत्तिरिति सर्वमेतन्न वक्तव्यमस्मामिः (7५0. 21४] ॥
ययेवं नियो नास्ति सर्वतः । कथे पुनरिदं निथितद्वपे वाकयमयलभयते भवतां न स्वतो नापि पतो न दाभ्या नाप्यरेतुतो भावा भवत्तीति ॥ उच्यते , निधितमिदे 5 वाक्यै लोकस्य स्वप्रसिदयेवोपपत््या नार्याणां ।
किं खल्वार्याणामुपत्ति्नास्ति । वेनितदक्मस्ति वा नात्ति वेति । पमार्घो सर्वाण तरष्णीभावः ' ततः कुतस्तत्र प्रप्चतेमवेो धडपपत्तिरनुपपत्िर्वा पयात् ।
यदि द्याया उपपत्तिं न वर्फीयत्ति केन खल्विदानीं परमार्थे लोकं बोधपिष्यत्ति॥ न खल्वार्या लोकसेव्यवक्रेणोपयत्ति वर्णयति , किं तु सोकत एव या प्रमिदधोयत्ति- 10 त्ता परावबोधार्थमभ्युेत्य तवव लोकं बोधयत्ति । यथेव रि विग्यमानामपि शरीराग्र चिता विपयापानृगता रागिणो नोपलभते प्रुभाकाएं चाभूतमध्याोप्य परि्िश्यत्ते " तिषा वैराग्यर्धे तथागतनिरमितो देवो वा प्रुभसक्तय प्राक् प्रच्छादितान् कौयरोषानुपवर्ण-
~ (5)
पेत् सत्यस्मिन्कापि केशा [इत्यादिना । ते च तस्याः ्रुभंननाया विर्मुक्ा वेराण्यमासाट्-
1) 2188. 245 1द्कच०; (0 भिपषुषपदुममटे ~ ^€. प. 1४. 168. 9
, ° 4401 ण्ठ {कछलण्मीः भद्रक, 4 ९6 भी€०66 8000०86 18 ककन द्वद
= 16 एममछकक्ा त ९४६ फतालणिल) बृमकण्छ््ठ. -- 00 अ{ क्ान्णाह १०९ 168 वृष्क 8४४88 &870670; 16 8116166, 1.४7 ए, 17. 16 ९६. कपा८९७ तं४6९्छ उ. ए. 4. 8. 1902, 9. 874, ०.1
9) 0970768 16 9. ५०द्द ४८८१०१६८ 4१000 $वक्दनठ कदश्व हदव च~
9) 2096, वत, काण ग. दे़ेपठम
4 म. एककण्वमत+, ग, तुस,
8) (०प्णृष्षध 8 ०416. { 295. + 74 9३9. त. पा. 90, 11828. 228, ९५६.
9 ४७, न्, णनः गर१,पृहैनपतेः तु स द मुरः कुनप +
98 परत्ययमरोत्ना नाम [16४-- पेयुः । एवमिराप्यर्थिः सर्वयाव्यनुपजःयमानात्मकं [16१] भावानामविग्यातिमिरोपकत- मतिनयनतया विपतं [1५४. 29०] स्वभावमध्यापप्य क्त चिच्च कं चिदिशेषमाततर - परिक्किश्यत्ति पृथण्ननाः । तानिदानीमायीस्तत्प्रतिष्यैनेपयत्या परिबोधपत्ति ' पधा ` विष्यमानत्य घटस्य न मृदादिभ्य उत्पा् इत्यभयुपेतमेवमृत्पायाल्पूव तिग्यमानल्य विन्य.
5 मानव्ान्नप्त्युत्पाट् इत्यवरपतां । धा च परभूतेभ्यो ज्वालाङ्गाहादि्यो ऽङ्करस्योत्य- तिनाप्तोत्ययुपेतमेवं विवक्तितेभयो ऽपि बीतरादिभ्यो नाप्तीत्यवपरोयतां । `
धरथापि स्यादनुभव एषोऽप्माकमिति ॥ एतदप्ययुक्त । यस्मादनुभव एष मृष
घरनभवतात् ' तेमिरिकदिचन्दराग्यनभावावदिति 1 ततश्चानुभवप्यापि साध्यतमलात्तेन प्रत्यवस्थाने न युक्तमिति
10 | तप्माट्नत्पन्ना भावा इत्येवं तावदिपरीतस्वद्याध्यारोपप्रतिपतेण प्रथमप्रकरणा- एम्भः। इदानीं क चिग्यः कथिदिशेषोऽध्यापतोपितस्तदिशेषापाकः् णा शेषप्रकरणारम्भः" गत्तगत्तव्यगमनादिकोऽपि निरृवक्षेषो विशेषो नास्ति प्रतोत्यमत्पादस्येति प्रतिपाद्- न्धे ॥
५ क । क रतो ~ । । ~ क्षा्तेण | थं स्यादेष एव प्रमाणप्रमेयव्यवरू पो लोकिकोऽस्माभिः [7५.99४] शात्रेणानव- ~ [शे + + 1 ॐ (1 ) किकी ५ शितो 15 पित इति ॥ तद्नुवण॑नप्य तरं फलं वाच्यं ॥ कुतार्विकिः त नाशितो विपहोतलक्नणा-
2.3. -०प्ला६ 7244590) वप फा०१०९ १४०३ 16 (0
) 110. == ११5 ाव, 8) 1.6 (४, 1४66 ल 168 7०18. {व्वलंददन्युककण्णकवत$द ए०ककव्छुवाय, (एमी ६।-५९8३४8 1. 8.)
4) 0०११४५९ 1. 8) € ०९ 8218 १€ ¶०९] (व्व 11 ९७४ ११९४६०४) णं पप ९8! पुन्न. -- 9. प्र स्गृगे पञममुप्ससु == काक 501८.
6) वष. गृ भे न" = (काय,
-16 १] प्रथमं प्रकरणं $9
भिधानेन ' तस्यास्माभिः पम्य्लत्तणमुक्तमिति वेत् ॥ एतदप्युक्तं । षदि रि कला- ्विकिर्विपरीतलत्तएप्रणयनं कृते लत्यवेपतीत्ये लोकस्य स्यात् ' तदर्थ प्रयत्रता- फल्यं स्यात् , न चैतदेवमिति व्य एवायं प्रयत्न इति । चपि च , पट प्रमाणाधीनः प्रमेयापिगम[17भ]त्तानि प्रमाणानि केन परिच्छ्पत्त इत्यादिना विपरव्यावर्तन्यां विरतो रोष । तद्परिद्हारात् पम्यलत्तणग्योतकवमपि नास्ति। किं च यदि स्वप्ामान्यलक्तणदयानुरोेन प्रमाणदयमुक्तं ' पस्य तज्लतदयं किं लर्त्भस्ति , शरव नास्ति । यद्यस्ति तदा तद्र परमेयमस्तीति कय प्रमा्॑दयं । चय नात्ति लकय ' तदा लक्षणमपि निराश्रये नास्तीति कये प्रमाणदय । वक्त्यति कि ' लक्नणासप्रवृत्ती च ने लत्यमुपपग्बते । लहयस्यानुपत्ती च लक्तणप्याय्यसेभवः ॥ इतिं ॥
४ 7४. गगेपमुप = कषमा 2) 098 719. शाण्वकद्धं (20; " ' ' र्टप््पस यस्पतिः ङगु १५१. 8) एणः 9. 16 ४. 5. (गणधर एणाः 16 8९08 18 81. 31 ०९ 18 ए 187208१ इ-
१8४7६801 (== $ व्यक वदः 27 काधद्वका दव 5१दाा४ककट) 0ककश्याकतककाण्डु क द्वक अद्वोक्व ण्यद्), पणाह र्थशं०ण पद्०€ (पणं वण्णे 0ताल्डत्रण
य्ुगु पप्यस) 68६ 2४8 7 ४7066. „¢ एनम (थय). १ [प्रमा फंड गू. मरमुषुवे
५ £ --
9 दवम. + = देपुमिसः वुतदुपति बुबना = ण 0/0 2 काथछवकदष्डः. . .. -- 9 1४ 61086 ४ 1४40९116 भूभद्चलालणौ 16 कद्वव € 16 अदाव 5 ९8६ प [व$क) 11 १९8 शिण 8198, ०८6 16 एषणद््)४ वणा ५०य- ०४४ 16 अध्यन्ेडवनढ (19 कद्व) ९६ वटो वपं 6०००४१६ 16 सक्ला्व्यनरदव (२२०८० [व~ ९/2), एण प्रः08द06 27072192 पण ९०००४1886 18 61088 ३ 124०९।1९ >] 091९००९०६ 168 0९४४ [व$वकवड (३दय७ क्ल). (द०ा९४४ ०१८ इ धपा भी वलाद् कतातद्ध त?
6) चरभीः ५-0&88०४§ 91. 20४ (7119. 269 ५५५). ~ छक दाक) पवप १४४ १४४४ कभ ऊसुम, ४ [6 ० € भार्डालषय ५ म ¶१) = भ, &
10
60 . ^ प्रत्घयपरोता नाम | (17*- ` शय स्यात्न लक््यतेऽनेनेति लतो ' किं तर कत्यल्युयो बज्लमिति “र्मणि ल्युट कवा लत्यते तदिति लल एवमपि तितत लत्यमाणतासभवायेनेत्लत्यते
` तस्य कणस्य कर्मणो श्त बत् ' त एव दोषः (7४. ९१ । ` सरथ स्यात् , स्ानप्य करणत्रात्तस्य च स्वलतणात्तमीवाद्यमदोष इति ॥ उ 5 च्छते । इक् भावानामन्याप्ताधार्णमात्मीयं पत्स्वद्रप तत्त्वलत्तणं ' त्था पृचिव्याः काटिन्यं वेद्नाया विषयानुभवो विन्ञानप्य विषपप्रतिवित्तप्तिः" तेन रि तल्लत्यतं^इति ` ` कृ्ा प्रतिदानुगतां च व्युत्यत्तिमवधूध कमसाधनमभयुपगच्छति । विज्ञानस्य च करण- भावं प्रतिपग्यमाननेत्यक्तं भवति ' स्वलक्तणस्यैव कर्मता स्वलत्तणात्तस्य करणभा7]-
४ एब. ा. ३.१४. ~ ठेपयमरतु त्वरतेः 2) 2088. {112 ९४0, ~ ६८८ 00214 € ०४०8 (19,
3) "भद (9. ६१९८.
4) 06णाप्र०ण वास्ड्शापृणः विरद १0०1०४६. 15. 19.
8) 06 णा्०णइ 6128810 ०६8. -- एठपः 16 दव्ृक्नन्व १6 1'लहणटणः पला९, ग्भः 006० 8277 ४१214. 8. 21. 5, 8०१16, {- 327. 12, &1४ 828. 248. 3 (पाणि ९०७९8 01४68), # 811). त. 1. 188. ~ ^ 01100. ॥. ¶.` (80५. 48.) 2419 7: ग्ध्व फढण्व १४; 11888. 233. 19. ~ 4.9 0140. ६. इ. (08. ए १००४) 28 ४: श्प [11.17.410 3.111.111 व, 1 1.8. 8, कद), € 80०८. 48. 2399 8 पपकत) कण्ण कक[ग]व्मुवमाष्का) 2 (व.
6 एर ८. -- ७. (८४ 7 10द ण्ठ + [०४०१९. -- ग. पमरप | रेढगु कपुर िद्नर बेस ये मक्मुपन्केदुपतिः ["'" सतिगसुव मु | कमि स्थ यु "ब्र वदु प टः रने त्क" बुर पमुप मेभ र षो मरमं
रेप धेमेस्| स्व दुगुणृसप युर हिस सुरत पति "= ५१०१७; वण व 9०
६८१८ १८ 15/५९, [. , -77 0 ४४व्द् ] दद्ध) ध्टवदकतद ०११४०0९०, , . , . ४४, दाक 1)... ४ 1० रश्व्पःवत 7वकदद्द्ा कककलकाः €... . -- एव्व १९8४ 8 {240६ १६०8 1९ (1 ., एषः (णाप € +र +), 7080406 १४०8 12 श्छाशंणा 82186716 ¶प€ ००8 8१018 1100०86९
= भसु पम
-17४] प्रधमं प्रकरणं 61
वथचेतिं ¦ तन्न यदि विज्ञानस्वलक्तणं करणै तत्य व्यतिरिक्तेन कर्मणा भवितव्यमिति ष एव दोषः। |
श्रथ स्यात् ' यत्प॒चधिव्यादिगते कादिन्यािके विज्ञानगम्यं तत्तस्य कमीपस्त्येव तच्च स्वलन्नणाव्यतिरिक्रमिति .॥ एवं तरि विज्ञानस्वलत्तणस्यं कर्मामात्रातप्रमेयतं न स्यात् ' करम्रपस्येव स्वलत्तणस्य प्रमेयतरात् । ततश्च दिवि प्रमेयं स्वलत्तणं सामा- न्यलन्नणं चै \ इत्येतदिशेष्य वक्तव्यं ' किं चितस्वलक्तणौ प्रमेयं पल्लत्यत सत्येवं व्यप- दिश्यते ' किं चिष्प्रमवं "यल्ल्यतेऽनेनेति व्यपदिश्यत इति ॥ श्रथ तदपि कर्मसाधनं ' तदय तम्यान्येन करणेन भवितव्यं त्तानात्तरस्य [70. 28४] कर्णभावपरिकल्पनापाम- नवत्थादोषश्चाप्यते !
्रथ मन्यते स्वतंवित्तिएप्ति ' त्तः ्वेवित्या मक्णात्कर्मतायां सत्यामस्त्येव परमेयातमाव इति ॥ उच्यते विस्तरेण मध्यमकावतरे' स्वसंवित्तिनिषेधात् , स्वलतणं
1) 1.6 व. ०९ 8746 ४8 16 हणं (गव्पवावर छव, रदकाकवञछव). 2188. ००५०१, ००० ००: म्यों मक्तदृदपु रिम वसषु एमृदकैः | नबे + गृम्षमे युस्पमिः त्वे परमन = शश्ष्ककाः ९०८ , भाद, ४०६ अध्वप्वकानम द्काथकककदण्चये, -- श == 00. |
2) एर €. -- ४88. = अकदक$ुव्यम$नावाः 7वोठुनव्वददठ, , , गूध. हति ग्निम् केषर] सने मरन सज्सगुमि ुभ् वष्र गुणत मेष छनन त समके मम वनु
= $कााद्ाुवावद 14100 लव , + अर्वव्यव्ताकशः द्व ला ककालवा४. , , , श्णव्मद्च॑न्क
1.2... 41.21. 9) 1188. पकनर, 79. ९1 3 परमे 4) 098. {44291922०5८ शुषुमेषुय 8) 0910188 719, {५५5 ४4४2 ४५९,
€) प्रभौ 5५770 2. 18, ०. 8. ©. 9. 232 ४ 2. = © स््दगु । ण्य
10
62 प्रत्यवरा नाम [171 -.
स्वललणात्तरेण लत्यते तदपि स्वपेवित्या इति न युत्यते । चपि च , तद्पि नाम ज्ञानं स्वलत्णव्यतिरेकेषासिदेरसवाल्लत्यामावे नित्रयलक्षणप्रवृत्यसंभवात् स्वधा ना- स्तीति कुतः ्वसेवित्तिः। तथा चोक्तमार्यरलच्उपरिपच्छपा+ स चित्तमसमनपश्यन् [18०] चित्तधारा ^ वप 5 षते कत्ित्त्योत्पत्तिरिति । तस्यैवे भवति । ब्रालम्बने सति चित्तमत्पय्चते । तत्किम न्यदालम्बनमन्यचचित ' श्रथ यदेवालम्बने तदेव चित्ते । यदि तावदृन्यदालम्बनमन्यच्चितत तद दिचित्तता भविष्यति । श्रध पदेवालम्बने तव चित्तं ' तत्कथं वितत चित्त समनुच- शयति । न च चिरतं चिते समनुपश्यति । तस्यधापि नाम तविवापिधार्वा पैवातिधाहा न
मएरमुम् == वडषट्द कडकाः 5९5४१०५४. -- णाः 12 ऊथ्वर्काः ण (= ०९८११०८.
६८), १०६१९ €88९€7५९1 068 ? ०९द६द्रा28, एण 86णा 668 6४668 . 62, ०. 3, € ००९ प८वप्टत०ण वप् 8४7९8087 8 (०8609 1901-2), ००४५8 7606-7; ४ ९५३०४३४ - ४६1४६४४7 298. $.
1) 119. == यथव कौ दवद शण्ड (नवव च... 2) 88. {+ . - 79. 4५1
3) 0४६९ प९प्लिा6 ४91६6 तप पर्नेमि.रदेगृष {8.&६०३॥६त्६४), वणक््पल
तं#810४ तप ४०१} ००१. 4. ध. 6. 0. 218. ~ (6४४८ लध्य्त०य & 606 प्रवण (€ एषः ए पय~ ००४१, 1०४. 561. -- १०१९ 8०01५. 9. ४0 इ. 18, &1§ 28. 285. 1, ००६९8 (1.४ 766- 76166 ॐ ^ 9 111. . ₹. 4४८ शपा ८6 ४. 5 € ४१४11 68४ 16 क€ड्पभ १९ 6०४. प्ि०). -- आ. १४६. 65. 38; पि 20110 28. + (4. 2. 265--816).
4) 088. € एणा 7कणा लका 54१०. ~ व (८ प्गृम हे स'सुममरपसः ०) कक = नुषः ५ ०-१०७०००७ जुमु ~ (०.18 21६ २४६. 51.10 शव (वकः < 3
श्वल वण्य मन्ता कव्वव्लक काव { १; 59. 16 -रण्यनव्ककन्यलव्ण्छषकवकद्व्मधोक. . -- 8४८४०; 16 प्छलोम्४ १९ 19 60866 ०४ १९ 1€्शृतं६ ~ न्न्कषद्छद == गद (= ५-१९७8०8, 638. 4) -- चवाप्काढ == 50124 == शयण्यद; र्भ १. 4.8. 1909, 11. 360, ४. 1. ;
6) अ 88. -- 115 28. (285. 9) ९४ 8०१४१1९. 9... , , व वक. . .
¶) अ८ १88. -- € 118 88. 6४ 8०16. . १८ कत नव.
8) 09168 1119. 0.
- 489) प्रथमं प्रकषं 63 शते तुं! न तेनवाङुल्यमेण तदेवाङ्ल्थयं शकते सपष्टे^ एवमेव न तेनैव चित्ते तदेव चित्त कं द्रष्ट । तस्यैवं योनिः प्रयुक्तस्य या चित्तस्यानवस्यानतानच्देदाणा्- तता (५४. ५५] न व्यता नाितुको न प्रत्ययविहदधा न ततो नान्यतो नं तैव ना- न्या ताँ चित्तधारा चित्तलतीं चित्तधर्मतां चित्तानवप्थिततां चित्तप्रचार्तां चित्तादृश्टयतां वित्तस्वलल्षणतां तथा नानाति तथा पष्यति यथा तथता न च निरोधयति तां च वि- ततविवेकतां तवा प्रतनानाति तथा पश्वति ' इवं कुलपुत्र बोधिसच्चत्य) चित्ते चित्तानुप- शयना मृ्युपस्थानमिति ॥
तदेवं नात्ति स्वसंवित्तिस्तद्भावात् किं केन लत्यते ॥
किं.च \ मदेन वा तल्नत्तणं लत्यात्स्यटिभेदेन बा । तत्र यदि तावद्ेदेन तदा सत्यादित्र्रादलत्तणवल्नत्तषणमपि न लतणं । लतणाच्च भिन्रलादलल्यवह्ह्यमपि न
1) ©९ €दशण्९€8 80०४ 1०14०६8 एष ए 2८४8४४1 (50208४1 379. 8, तए ए ४४. ६३ ६7. 255. 98, 406. 19. ~ & 1४४28. 285, ०. 5. -- 8787 &218९1188. 285 09९. ~ &1० ४३१४६7१. 287.
%) 21868. ०३१2 0८ व्वद्०. ~ १6 ०1086 (णाह = . , {25४८ वकदण्वडतिल् (१८०८१५११ द, (ण्व, , , ; 19 *6ा900 ४०८८४०6 ०008 इ 10१16 26१५.6६९. 3) 8 दए ४४8. ए. 18; 1 इ ४ वलणम ९१6८५९8 ९ १८४: ११४4 १2,
अकव न. ~ ए 0108) प. 26) 8१४० & 818१. 1. 106, 0146४. ४९५६, ८०४११४४० }. 379. ०६८
4) अ, कवु = दे मुः युम. मस,
6) 0. गृवठ, गकणठ, गकम. -- वरो9, निवि तेम.
(1 देपदिम् र्" म्िरप िमि' = पव 9०2 धद भवं ४ लणथाव०त त- भक, ४०72 29408, १४१...
¶) 488. °च १2७१11४०, 1९400 ¶४। ४ ०6 ए ०८००४ ~ व. ससु (# पगे पगुङ्गु प करय एन्ससुपगुपम == ,,, ०४११।४५०००द- शवक कावक्द. - 00. 09. 8. नप्र; ह९7०) ३००४1 246, 266; (11585.
१४}. > 11, 9. 228. ००6 9; १88९11८6 1899; ४०११४१५. 9. 1085-6; १1१४१११४. #& ९४ (4. 2. ¶. 3. 1886, 9. 1092-4, 161. 158).
„ भ प्रत्ययपटक्ता नाम {189-- ल्य । तथा लत््यादिनवाल्लन्तणस्य ललणनिपपेते लत्यं स्यात्ततश्च न तल्लयं लक्तषण- ` निपेत्तवात् पुष्पवत् [181] ॥ ्रथाभिनरे लत्यललणे ' तदा लत्तणादव्यतिरिक्रबाल्ल- लणस्वात्मवदिकोयते लत्यप्य लत््यता । लत्याच्चाच्यतिरिक्तबाल्लतय्वात्मवल्लत्तण- मपि [प४. 24४] न लत्तणस्वभावं । पधा चोक्तं ' | 5 लत्याल्लन्नणमन्यन्चेत् स्यात्तल्लत्यमलत्तणां ।
तयोरभात्रोऽ[नान्यवे विष्यष्टं कथिते बया ॥ इति । न च विना तत्त्वान्यब्ेन लत््यलत्तणसिद्ावन्या गतिरपितं ' तथा च वत््यति '
एकीभावेन वा सिदिनानामावेन वा पयोः । | |
न विन्ते ' तयोः सिद्धिः कर्थं [नु] बलु विते ॥ इतिं ॥
10 वोच्यते ' [अरवीव्यताया िदर्भविष्यतीति येनैतदेवं ।शरवाच्यता हि नाम पस्पविमागपरिज्ञानाभवि षति भवति। यत्र च विमागपरि्ञाने नाप्त ^ तत्रह लल- एमिर लत्यमिति विशेषतः परिच्छदासेभे सति दयोरप्यमाव एवेति । तस्माद्वाच्य तयापि नास्ति तिर्दिः
चपि च ' यरि न्नानं करणै विषयस्य परिच्छदे कः कता ' न च कताए्मत्तेणास्ति
1) 8५4०८९0० वला€€. ~ 278} ह. 10. 91 [वकककावरछवफिण्लणछ 1५१0 द१५ ण्व, मो$ङ्वडध्वफकदर्लषठ [कुकौ कावा ८0. ~ उपा 168 शृकग४8 तत [बय ` ९४ 0४ गद्य, पणत पिए १४ ४०१४1 (२१९४३१४]) 2१8४४०१9 58१२) 7. 28. 1.९ इगोंभाट एण्ण्ववोवप९. ९8 वक्षणाः वर्व्वद्मद्ु व्ल क्वल्ल व (वव४व्य्४; सवदन ५८५८५ 713... 5.1.71 2) = 17. 21
१ द्रऽ पवुरवर तडु वेः ~ (०१५.
१४९. ६ 297. 9 . . . भ कानकक्षयड ६4 ण्द्7 ४ ४८४) षवकमवत्तषद्त व्व पद्व, -- 7 0780210४ (ददककाद्वा) }. 288. (णावशुकवय्वकौ अकाय [बद एव्वदो क्क 270१, ~ ए ९१३०६३।.०10०४४70 284. 5. 20८वद- ११९2८१४४ ककाण्दद$न१गकथ१०0व दक) द्क्ाव) द्यावो कोषार्व्टवकः ५०४ ४६८ . ६८द क४भद्वकण, 2064 व7€ -20८वव्न{{ल' ०१९१ १5८व7८ € 07 द्वबा्डकोव्व ४ (कव एकवदकवना 2४ 20 वाव.
. - 19१] प्रथमं प्रकरणं 6४
कएणादीया कत्रः दिदिक्रियायामिव ॥ श्रव चित्तस्य तन्न कर्तृं परिकलयति ' तदपि = युक्तं ' यत्मार्वमान्दर्शने चित्तस्य व्यापारो ऽं विशेषदर्शने] चैतान ।
| तत्र्थ्टिर्विजतानं तदिशेषे तु वैतमाः। इत्फयुपगमात् । एकस्यां रि प्रधानक्रियायां साध्यायां यथास्वं गुणक्रियानिव्- त्तिढरेणाङ्गमावोपगमात् कर् णादीनां करणादिव! [प,). 25] न चेद ज्ञानविज्ञानगोरे- का प्रधानक्रिया ` धिं तच्चर्वमात्रपरिच््तिरविज्ञानस्य प्रधानक्रिया , ज्ञानस्य वर्थवि-
शेषपरिच्डेद् इति नास्ति ज्ञानस्य करण((9भवे नापि चित्तस्य कर्तृं ' ततश्च स एव
दोषः॥
` ` रय त्यात् ' शनात्मानः सवधमां इत्यागमात् कतुः स्वधाभावात् , कर्ताएमत्तरे णापि विश्वत एव क्रियादिव्य॒वार् इति ॥ एतदपि नास्ति ' घागमप्य सम्यगर्थानवधार् णात् । एतदेवोक्ते मध्यमकावतार् ॥
१) ऋ, क्ोन्वम्, - ग, ठेव पसक्गृसयदुमस प्लव (४. मपे
9 दुष 8म्य रे | 9 ७०४७.-- 79. मुपि वुमुमर्त इम पम्तेस | नेपः सुतस सेमसिस ~ | == , , -10वण क १५५. . -. ~ परभ ५-१९७७०३ 11, ००४6 4
इइ ४०१०१११४. 14. 4; अण्वकमष्ल्वदकः क्क क: लका ववषव्कय- शवा, (वद णरवध्वकन्कावना ०० 0. ~ १९१३०६२४ २१४१87४ 278. 96. ~ ४६४३१४६६ णा. 8. ~ 49014). 1. ¶. (४8. ए१९००४) म. 28 ग्छ्भ्क #00100 कका ०७५४११70 47 दा; १८वव११दद४/८5 ६४ (वकवरद छव्छवदापवकककरव्य्. -- प्रण १०६३२8३४ 1. 45--44 कम व0दन्द (णर) अवसः वथ शिकाकाठककावा0 क्ाकाुकाष्ठ वव, , . , कव् वान्त $वज्छुद (800 भद्ध).
60}. ^ ०४149. ४. १, 6४८ 20.83. उडणा ®. 41) कन्वाव्मोभ् [90192]. १491941404 १८७५५१0 / रैव स्ण९6० भवन्यण्स्व्म 1.4... ~~ भरभी ^ ४६४ ४ऽ8211४1 291, 306 &४ 16४ ००५९8 १९ ४» 208 12१1098 9१ 99. 8१2. & ४४} 4, 8. ~ 1⁄6 शप्र ८ ९8४ 080६ण6 १५ १219, अ -€88008 2 22 ए. 16 शम्प्ट- [८/1 ,1 1.7
80०16४४ 168 €4।१४1९०८९8; न्दा = श्व विद्वाणा == ऋकण्पषम्म्गव -= ा~ पवत्य काव्लोषः बका == तिद्ध = कण्वष्य विद्वा = व्यवश्ु-टवकव्
भ ५-06880४8 2. 74, 9. 6
4) "४728 1 (9. = द्मा वकढ कदा, $ {025९4१1 ४१1 , . , , कण्क्ाकाछ शव०४2 , , „ ,9740४@2/2 ०११४१ 2५०१04१द॥ पका 4१८ 1४7१.
66 प्रत्ययपरोता नाम {9५
` श्वापि स्यात् , यवा शिलेपुत्रकस्य शरी एाकोः शिर इति शरीएधिरोव्यतिरि- क्त विशेषणापंमवेऽपि विशेषणविशेष्यमावों त्त ! एवं पृथिव्याः स्वलक्षणमिति स्वल- तणव्यतिरिक्तपृथिव्यसेभवेऽपि भविष्यतीति ॥ नैतदेवमतुल्यवात्। शरोर णिषःशन्द्योः रि बुब्यादिपाप्यादिवत्सकभाविपदायां्तरतपितताप्रवृत्तो शतोरशिए-शब्दमात्रालम्बनो 5 बद्धुं ^ सङ्वारिपदावत्तसाकाङ्ग एव वर्तते ' कस्य शरोर कस्य शि् इति । इत- एे$पि विशेषणानत्तएसंबन्धनिर्चिको्षपा रिलापुत्रकर्ऊविरोषणध्वनिना लोकिकम- ` केतानुविधापिना प्रतिकर्तुः काङ्ञमपक्त्तोति युक्त । इर तु काटिन्यारिव्यतिरिक्तपृि- ` व्याप्सभवे [7 25] सति न युक्तो विदेषणविरेष्यमावः।
तोर्थितरव्यतिरिकतंलत्याभयुपगमात्दनुोधेन विकेषणाभिधानमडुष्टमिति चत् '
` ¬). पण. 245. 1109. - ४०57८११४, 1. 9. - 8 द ०४१. 00.
84. 2, 148. ए: ककम दकमु, दद्छषद्वमजव कका) 9५१५5०0 लक(कादुव्ाध; € ा6- 81008 . ०€६2770वण्ड [१४८४10४]: 9 भाल वल्य 8४४४6 श्वल अ0णाक्कलः 0०६९ भप्वे [१४४ 0886887९ ए शा) ३1४0188] १०7८) ` १४३. तादा [वल अंणणठडकरक्षा बलाकण्णहु] कल 168४, #€1<}9€8 १९४ 6९९९४३४० 1४ 860 छ्९०5८) ४१ [॥. 1. ता€ ¶0४५३३670€) १8४88 वल्य 1९भफृल 6 8६४०९ 28६, ] लालणण्टण [लाप पणत वलडोभो) [8६ [9 इगल९४ कद्ाहण] फणः लं ०७ 4 ०७वपलढक्रलं३€ ण्ण, एलं कलेलेलयः वा कष्डदरनााला 1वलणधतद् व8४8 8९ कणत ०५४ ०88€881१९४ एध) 1५015868 इदप त्व्. पल्णा ऋ20 भल 8284; 06४ &0-
) 8088. कूवक2१११०१९. -- 70, " " सगु्याद्व् रैम] ५९
8) 9188. 6ववदीद्छकुकष्का्व, ठषववा ११००. -- स्मय समेषुमणपे 0 पु (11 गन्गे ब् | स्वार्भृष व. 9 1८4- न १०४६ थणणृाष्न्लः 9०-०4-10, 1 9०700०6 > [6 ]न4-८05 (14४४ == 6४६४), € ००४8 ४१०४8; ^ एष
106 1णध्धाटणा (०-४९०-22? ठष्वकमाषद् [कध्वी) 6०४60 [71000४८९ 16 ००६ १९८९ €४ 88 १९००.१९: 12 ४&४€ 96 १०?
4) (न ह ५१। मृ रिवय" '' ६१५९-9 (11०९-29) 276५606 ॥€ 96-७४7
` ==. ‰0 2 -- «0908 16 त6 भा 0१6८५०५७ ।४ .96०866 १५४७ [16 ०४ ६९५९] € 1णक€- भभम हा-तभणः ४१९५ ४४ चला १४६६0
०) भर. गकष्द््मछ० 70. मकस गुते वेमृरुपर्, [पसद्ुनस पतिन
-19] प्रथमं प्रकरणं 67
नेदेव । न हि तीर्थिकपरिकल्िता युक्तिविधुराः परार्घाः स्वतमपेऽयुपगत्तं न्याय्याः ; परम्त्तरदरप्यमयुपगमप्रसङ्गात् । | |
श्रपि च पुदरलादिप्र्त्तिवत् दैशसतपतेषादानप्य शिलापुत्रक्रस्यीपादातु्लो किक- व्यवकाराङ्भूतस्य विशेषणस्याविचाएप्रतिदस्य “पद्रावाल् ' धिरडपादानस्य च राको- सषादातः [19४] सद्वावादृयुक्तमेतननिदर्शन ॥ ह
शरीर शिरव्यतिरिक्तप्यार्थत्तरस्यापिदेस्तन्मात्नस्योपलम्भात् सिद्धमेव निदूर्शन- मिति चेत् , नेतेवं । लीकिके व्यवकार् इत्थैविधीराप्रवत्तेरविचाएतय लौकिकपदार्या- नामप्तिवात् । वेव कि इपारिव्यतिरकेण विचार्यमाण चात्मा न संभवति ^ पि च लोकसवृत्या स्कन्धानपुदायास्यास्तितं ' एवं एाऊणिलायुत्रकयोपीति नाप्ति निर्ण नसिद्धिः॥ एवं पचिव्यारीनां पग्यपि काठिन्यारिव्यतिरिक्तं विचार्यमाणं लत्यं नास्ति 10 लत्यव्यतिरेकेण च ल्त निराप्यं तयापि सेवृततिरेवेति ' पर्स्पर्ापेततया तपोः तिच्या सिद्धिं कावस्याययांबम्वुतचायीः । अवश्यं चेतदेवमभयपेयं , चन्यथा रि सेवृतिह्प-
1) प०पड 80008 ४ 2006106 त '४प६९8 एकाश्च३8 १०९ 1९ वकम ९६ 11५ ष्वव, ॐ 885०7 16 &वफद्ठ (2. ~ प्रभः ५-१९४३००३ 69. 1.
ॐ) 188. 5@, 5८, ०`९8६ 28 ४80६ १४०६३ 18 १९18100 भ€ ६०९ €६ ९०६ € 6८४५€ (©. &४-प9). ~ ¶19. - = ४ © (= - दकव -१{९5८१[6#९] वनता /८- धतव -07454 वदा म[ ९४] १द्दद 1 -दवलषवरल[5४/ब] , = ९९१८-पदवत द [9४०] "द्वा 70 € 2५40-1 द्वप 5ववएकद्छद्ल) ११८1 ८दवाा सवद [;/ 144...
4 ऋच, कणकव्मकवान्णुक्रव्वर -- कः सुनपदुषुस् गु" १ परिः
9 भ्न = इुमपसयु्प
6) एणः 0९ अप्रा.
2) प्तुसपर्मशेसः = ०४१११९५०.
68 | प्रत्ययपरौोत्ता नप्र ॑ [199-- पत्या न वियुदयेत " [7. 26०] तदेव तत्त्वमेव स्यान्न सेवृति | न चोपपत्या विचार्पना- णानां शिलापन्नकादीनामेवासभवः ' किं तरं वत्यमाणया य्या उपवेदनाीनामपि नास्ति सेभव इति तेषामपि संवत्यौ शिलोप्नकारिवन्रात्तित्वमास्येयं स्यात् " न चैत टेवमित्यपदेतत्
घ्य स्यात् › किमना सूत्ेतिर्कथा "नेव दि वयं र्वप्रभीणप्रमेयव्यवकारं सत्य- मित्याचत्मरे ' किं तु लोकप्रसिद्धरिषीमुना न्यायेन व्यत्रत्थाप्यत इति}
उच्यते। वयमप्येवं ब्रुमः ' किमनया पृहमेत्तिकया लीकिकव्यवकरेऽवकिरिकिया,
~ (9)
तिष्ठतु तावदेषा विपर्यासमान्नासादितात्ममावपत्ताका संवृतिर्मुमूणां मोनावारूककुशल-
1) पवय नुम पु = ४. | 9 पतम् विक 3 नयु गृहन अयु 3) 1088. ९ चठ इद्वा दक7८४८१, ~ प. दे्गुयुः मयु संगृ
पपरु गुवहिपतु पवपमपपमयरु (्ष्गपनपनुे |
-4) 1.8 एशशं० प€कं€ भणण पटेमुदृसख गुम तन, ईुमपन्बुगु दः न्विप्परः पमुमव्ड्षुपतरस कुखपन पमुप दे दुषिस' एस सुपरुयि ययुनि | = च्व 9 शववतणतनकणव्कवडक्यष्ः शकाश्च ऋदु दके 9 ककव - (मेम 2) {८८ ९४८ 2 ४कध्वडद्ुष्माः
६) प मनपुडधमष $िणा 168 णिाशपे०8 शा -अ्दं (श्कव्ठ, रन्ष्म््,
प्र, गध्र), पणेः ०१४१०. ६, 878. % ९४ ७ इरा. 64; 1४58. 59. 6, 191. 6, 267. 15, 269. 9; 7१. 880..9. 07. ४४२. 1. 599, 1. 496
०) पर कमत कूणाृणर, -- ग, कतुम् सुर पुलुनिदति षु घमस" ख कषेमप धम | १ म, ऊण्कद्यमः कय, ००. 0. नत पुःगुगुसपः ५1 8) ९७४ 81216 @. भ.) 4०९ 08०8 16 ९००86 शकोद्वर, 1 1
- 29] 0 प्रधमं प्रकरणं | 69
मूलोपचयकेतुर्यावत्र तत्वाधिगम इति । भर्वास्वेतां सैवृति[0*परमार्थसत्यविभागडर्वि- दग्धनुद्धितया क्ष चिडपपत्तिमवतारवन्यायतो शयति । सोऽरे संवृति्त्यव्यवस्यावि- चतएयाल्लोकिक एष पते स्थिवा संवृतयेकदेशनिराकरणोपतिपतोपपत्तयत्तरौ तिरमुपपत्य- त्रेण विनिवर्तयन् लोक वदध स्व लोकाचारात्यरियश्यमानं भवत्तमेव निवर्तयामि न तु वृतिं ॥ तस्माग्बदि लौकिको व्यवन्ारस्तरावश्यं [7\४. 96४] लत्तणवल्लत्येणापि 5 भवितव्यं , ततश्च त एव टोषः। रथ पमार्थस्तदा लत््याभावाल्नत्तणदयमपि नास्तीति कृतः प्रमाणदयं ॥
थ शब्दानमिवे क्रियाकार्कपंबन्धपूर्विका व्युत्पत्तिनङ्गीक्रियते । तदिदमति- कष्ठ तरेव क्रियाकाएकसंबन्धप्रवृत्तैः शब्र्भवान् व्यवदति शब्दार्थे क्रियाकरणादिकं च नेच्छ्तीति ' घ्ररो बतेच्छामात्रप्रतिबदयप्रवृत्तितो भवतः ॥ + 10
पदा चैवं प्रमेयदयमव्यवस्थितंतदा (स्वातामान्यलतणविषयत्वेनागमादीनां प्रमाणात्तातं ॥
किं च घटः प्रत्यत इत्येवमादिकस्य लीकिकव्यवरारस्यापमराट् नार्यव्यव- काराभ्युपगमाच्चाव्यापितौं' लतएस्येति न युक्तमेतत् ।
1) व. = चूका ५१५०.
2) 7१, = एषुवयकणचदपणोरकक -- कषम = येद् परत
5-9 देति वुनवयक्गुषय स्र मुर दतिः महव कुभस्मं म परम् प्स 2 समस कमम गु स मप्पमुप मपेमत्| =... #2 +१७- 1. 1. 1.12. क तका मोक, रण ०।-१९७७००३ 71, 3. -- ०१.9० = विदुसः सु पम् पिः |
9 माढपपष्ेमुम्' नयु | गमु रमे मेरेगुस स - ५ = चवण
== ८5-11८.
70 प्रत्यययरोत्ता नाम [२०४-
घध स्यात् ' घटोपादाननीला्यः प्रत्यततः प्रत्यक्प्रमाणपरिच्दे्यवात् । ततश्च
यथेव कारणे कारयोपचीरं का बुद्धानां सुल उत्प इति व्यपदिश्यते ' एवं प्रत्यकतनी-
लादिनिमित्तकोऽपि घटः कार्थ कारणोपचां का प्रत्यत इति व्यपदिश्यते ॥ नैवंविध
विषय उपचार युक्तः । उत्पादो कि लोके सुखव्यतिरेेणोपलन्धः ' स च पंस्कृतलक
5 एस्व[20४भावलाट्नेक इष्कणतक्ेतुबादमुख एव , स सुं [1,0. 279] इति व्यपदिष्-
मानोऽपंबद्र एवेत्येवविषये युक्त उपचारः । घटः प्रत्यत इत्यत्र त न कि घटो नाम कशि- पयोऽप्रत्यत्ः पृथगुपलब्धो यप्योपचारातप्रत्यततं त्यात् ॥
नीलादिव्यतिरिक्तप्य घटत्याभावादीपशरिकं प्रत्यतवमिति चेत् ' एवमपि पृत-
+ एमुपचापते न युक्त उपचर्यमाणस्याश्रयस्यामावात् । न कि रएविषापतैयमुपचर्यते । 10 पि च ' लोकव्यवद्ाराङ्भूतो चो पदि नीलादिव्यतिरिक्तो नास्तीति कला तप्यौपचारिकं प्रत्यवे परिकल्प्यते ' नन्वेव पतति पधिव्यादिव्यतिरेकेण नीलादिक-
मपि नास्तीति नीलदिर्यीपचारिके प्रत्यवे कल्प्यतां । योक्त ।
1) त. ए४०६. 245. 1-8
2) 2188. १{240}/८. - 119. इ स युम ठम् ४,- [8 यदु दस नन)
एद€ा716 ५123814९. पए 18१1१११1०. णा (भि 2९०, 3०११४187, 194); एका 18 €8116त € 1३4९१८९ ९८६8९ 1४ ८१०8३९8 € 1६४९0९6, }ण8॥ 88 16 कणी) ० ॐ एप्त ४ 18 ९३11९ ४} ए ०९९६१७6 1६४ 708प्रो{8 19 9070688. -- 4 0 0100. 1. ¶. (8०५. 4.8.) 2413 2, 3१171८04 5० ¶बद्धं८ 5८० द४्॥/€ = वत्य१८ द क्ुणवदव्कवमा) अवक प; अद 5५6 एधवक्याक्कक्ताा १%दतद १११. -- 18086066 १6 एष्दद्ानद्वत 68६ णा वमकन@ (7 9.-8
31४) एषा ९८61९८९; एष्वदानफदव० (कलाव, (३०११५. 2. 10. 8, -- 168 2]0116६0४8 तप्र प01 574, ^ ४६४०8३8}. § 99 &४ 301
) ० (006 सा 4) देष य त दसः == {05171900 अपवकवः ¶४ == 5८ ऊक च,
9) 1. ¶ ८४. 245. 683. ~ ^+ ४0141. 1८. ¶. (8०८..॥8.) 389 8 7; वल 0४८ &४- 1. 171.
8) 2183. ई्णलव5४, ६८६९५१९५ -- १. गुं
7) == {2८11}; ६६१९४६४, १41586२४, शक. 14 (१७6००) 1900, 9. 240); ५१६९ ५४8 1& «09. वप 24१0 ¶ ४४12१४४. 3449 5.
-20#] | प्रधमं प्रकणं (9,
दपादिव्यतिरेकेण पधा कुम्भो न विगते । वायुदिव्यतिरेकेण तथा इं न विष्यते ॥ इति ।. तस्मादेवमारिकस्य लोकव्यवक्पस्य लल्षणेनारादृव्यापितव लत्तणस्येति । ` तच्नविद्ेत्तया रित्यत्र घदारीनां नीलादीनां च नेष्यते \ लोकसनृत्या बभ्युपगत् व्यमेव प्रत्यव घटाटोनां ॥ योक्त शतके । । 5 सवं एव धो ऽदृष्टो उषे दृष्टे ङ् जायते । यात् कस्तच्चविननाम घटः प्रत्यत इत्यपि एतेनैव विचारेण मुगन्धि मधुरं मृड । प्रतिषेधयितव्यानि सर्वापयुत्तमबुद्धिना [7४.27४] ॥ इति ॥ श्रपि चापरोत्तार्थवाचिवपत्प्रत्यत्तशन्दस्य सात्तादभिमुलो ऽथः प्रत्यतः , प्रतिगत- 10 मत्तमत्मिन्निति कृवा घटनीलादीनामपरोतताणां प्रत्यन्तं सिद भवति तत्यरिच्छ्द
1) © वकण ६1०४ (2) ९8 ध४पप ठ 7086 १४०8 16 (9. -- एणः त ए ३१४१२३१६. 49. 15 84१. 1४ प)8८०४अ०. १९ 1४ वेल्ीपरिमा वप्र कवक १०४००६९ एषः ए 28002०१0, एव्व वव 21४ (8). पि १27०४. ४३६१. 154. 91, 852. 13. 100, 13 9८४ 8, (1. 2.23... 9.2... {४5491 17वरद्ं ९12 . ६८व (0४ 71050 श्४व्वदकवा€, १2 - ६४ ईव कवव्मंढद ठकढण्व्यं
एष 1008, 0. 74, १. 6. ~ 1.6 श्ट दन्रनन्क्कृन्द८ (ण्व्य चठ), €88€0प€]ाकलण€ ए 100० 02016 (ककष ०18 6०09), ©8६ 27४54.
(४) = {410 † १ ४द्व शद्विम) 27 ४काकवा र, (9). 16 94८ ०6 इपर} 00४6 98 1९४ (रालद्ा४-०९2 08, ९०7 2. 67 1 7); 1 १०२१81९ ¶०€ ०४०8 18 (नकवभ (र्णा 9. 74 9. 1), ७९भ 2 0176 कण्टकान्. -- 16 ककव, 16 अण्णा, ०९ एण €प्र ७/५ १९ 1४ €001 8188४066, 6४7 16 अ १1४४6 ०68४ 2848 १८; € € क्त वेप 19 - 6106 च्व्वलप्नानाः ११5००१ {३ ०१४1९. 0. 12. 22).
2) 06 शा, 1. ४. ~ रमाः क 28911151, 3823 (964) १०४5 § 8.
ॐ) 1088. 00410 ब 5{0 . . . . 0 व 14 544 क वक्त (धं द्वश लक)... * ०५१० ^ २८७०८४५ + ऋ, -- पासके छद, पुमः मे | ममु तिद, मकरमेनयुर | पुमय मन्मसुम' वेसञुनर | रेपु रेगेमप सुकगु \॥।
4) १०17 01१6968 €> [0116४ ४००8 €६१ ०14814८३ 0४१8 ति ४३४६०९४, 061६ 27४4४8६४ ३१४ 0. 186. 19 (बकना) ७५१ एप्४नन्कव्न्यो; तड ४१३7६. 30. 4
,. छ
72 ` प्रत्ययपरीत्त नाम [४ 'क[भभत्य ज्ञानस्य तणतुषामनिवत्प्रत्यनकाणलात् प्रत्यतवै व्यपदिश्यते ॥ पप्लक्मतं प्रति वर्तत इति प्रत्यतशब्द व्युत्पादयति तप्य न्नानस्येन्दरियाविषयवा।द् विषयविषध- चाच्च न युक्ता व्युत्पत्तिः ' प्रतिविषयं तु स्यात् प्रत्यथमिति वा ॥ |
श्र त्यात् * यद्ोभयाधीनायामपि वित्नानप्रवृत्तावाग्रय्य पटुभन्दतानुविधानादि- ज्ञानानां तदिकार्विकारिवादा्रयेणिव व्यपदेशो भवति ' चतर्विजञानमिति एवे प्च-
८०. [य "ता ~ ~ _( कत प्यर्वम्ं प्रति वर्तते ' तथाप्यत्तमत्तमाित्य वर्तमानं विज्ञानमाग्रयेण व्केशात् प्रत्य
तमिति विष्यति ( न (क्क मेप (न् (0). ` तमिति भविष्यति । ट्टो साधारणेन व्यपदेशो मेतोशब्दो यकङ्क् इति ॥ ततत्पर्वेण तुल्यं । तन्न दि विषयेण विज्ञाने व्यपदिश्यमाने ्रपविन्तानमित्येवमा-
` दिना विज्ञानषटुष्य भेदे नोपदूर्णितः स्यात् " मनोविज्ञानस्य चलुरादिविजञानैः सेक
(गण्दवसुत छव णडव्ुव्ः णुः पकक...) आप्वीकवका, वकः 109 पवा); पिए ४१. ६2६}. 64. 96; 685. 6. 19. (गण्). प इ ह ४01०. 7. 15 [वकवम वद्मा [11 (17111111... 1111411... 4.3... 3.11 ` किदवा व्लाष्व ६४. , , {0५४८ 15४५९. ~ (6 == ०९806 १९४ 8678, णप 10062 वण प 278 ४८४71४9 (0४०8 च. 2. 4. 8. 1899 2. 5607)
1) €. ५40४ (१,५०44४, # 2110. प. 1. 259. 28. 30 9 नयः गु पुनन. एुयरमु मप्पमुपनद ९ | पुने पुनर्म
+ => = 1.6 र0िदणडे 708 788 [0 राक 168 88, 03 0शा 168 एक्भक8, =
9 प्युबसपनमः रषुससवषेतु उसयुपर म् मे शु... १ अठ क 06४०0 €8४ 0100५16 > €्एावृ््ः र
4) 24 = गुम प्..~ १०92 == 9
8) (०). प इह ४२ ६7६. ४३६१. 74. 16: #५102 कऽ 5 भषक्कलीव रतिव्त श्छव्छन्वकवट वकवः ध, . , ,; रण्वः वकद कचछकलदषछव ९४दकव८ सरिद्तम
9) ४०५. म००४००. -- ग. प्स यस
षर) प्र 27६. 34. 16 (ण्वम् द्ववना ५ १ ण्ट्ककन ०४०००द ४५९) ४ १० कल्काद्ा१९४य एला ४४८व्का( फक ककण
| आ 9} प्रथमं प्रकरण १78
1वषयप्रवृत्ततरात्। तथा रि नीलादि विज्नान[7.४6भृषट विज्ञानमित्युक्ते साका एव प्र त्ययान््ायते किमेतदूयीन्तरिभ्े विन्नानमाकोप्विन्मानसमिति । घरा्रयेण त॒ व्यपदेशे मनोविज्नानचततुएादिविन्नानविषयप्रवृत्तिसमवेऽपि पर्स्यप्भेद्ः सिद्धो मवति । इक् तु प्रमाणलत्तणविवत्तया कल्यनापोान्स्य प्रत्यत्त्राभयुपगमे सति विक
ह्पकादिव तदिशेध्ाभिमततादसाधारणकारणेन व्यपदेशे धति न किं चित्प्रयोजनमय- 5 लदथते । प्रमेयपरतच्लायां च भ्रमाणंव्याप्रवत्त प्रमेयाकारान्कारितामाध।णत्तया च पमौपादितात्मभावपत्ताकयोः प्रमो; स्वद्भपस्य.व्यवस्थायनानिन्तयेषय व्यपदेशः कि` चिडपकरोतीति सर्वधा विष्ेणेव व्यपदेशो न्याय्यः |
“पि प्रत्यत्तशब्दृस्य प्रमिदतादिवतितेर्े प्रत्यर्वशन्दस्याप्रसिद्धतादाश्रयेिव
1} 88. 1007 ४6 पवरन्वण्डष्छणडम् णर, -- (> हमरकेषयगुभ पे दम पेम गुण दमपसमेषप बमदम
2 नमय दय सर परमप प्पद-त्. ्षयुम्स्य
3) 088. १6४५, "च्चयः = ग उुगृबस्म्
4) 1.6 8608 68६ (लाद वश 0दा१5व , = - = = रछडकट
8) 060०४ १€ 2 0 877 211४1; मवद ब्वकव्न्वकृण्वुक्रव्यः, वक्रात् ष्णम १01०० 108. 9, 8. 90; 28108, 09 ४06 ००६००01 ४०९ वञ्-~ 9190, 4. ^. 3. एनणछभ्, 141. 56; &४ ए0णाः 168 अछ अयाच्टेड 3375 2१३३८३१४) ६११०९४००, ००६6 152. ~ ४. १ १ ०६.199. ®अ-6४.
6) दमवगृ पिस = ण्दरव्कन्य.
7) प्ण. ४०४९०००. ~ 70. रिदिमुप म्.
8) 00006 2 ०08 ६08 ९०70168; ००४०१०९ च> (र.
9) 10488. 024442०, अद्व4० "प॒ = 9. -- पज 68. &.
१८०५... ~- ग्र). पिहिषुदेमुमुः प्प.पन्रिदृपुपनि" दुमूष' मन्स्सुमथे र स्य गुषृमपनि ठेर मुर | ममक वेससुपतेः ङु म गुगुखपमेदेर "दयि मभ
।
74. ग्रत्ययपरोता नाम | (४1४- व्युत्यत्तरीयत इति चेत् * उच्यते , घ्र्त्ययं प्रत्यतशन्दो लोके प्रतिद्धः। म तु यथा तधास्मामिह्व्यत व \ यवास्थितलोकिकपदावतिरस्कारेण तु तदयुत्पाद् क्रिय माणे प्रसिदश्न्द्त्मिस्कष्टः प्रषिद्धः स्यात् ' ततश्च प्रत्यत्तमत्येवं [न] स्यात् । एकस्य ` च चलुर्विश्ानस्यैकेन्दिवपपरयस्य प्रत्यत्त्रं न स्यादीप्साधमिावात् ' एकैकस्य च प्रत्यत्तवाप्राके बद्धम न स्यात् ॥ ` कल्यनापोस्येव च ज्ञानस्य प्रत्यतलायुयगमात् ' तेन च री. 989] -लो- कप्य सव्यनकपानरावात् , लोक्िकस्य च प्रमापप्रमेयाव्यवरार्प्य व्याव्यातमि- ` तात् ' व्यवंव प्रत्यत्तप्रग्रणकल्यना संन्ायते ॥ चन्तुविनज्ञानसामाङ्गो नीलं जा- नाति नो तु जोखमिति चम्रमस्य ` प्रत्यत्तलक्नणाभिधानाघस्वाप्रत्तृतवात् ` पञ्चा-
1) थ्व्य खाेऽ क्छ 18 110. -- ए0दव्करम्वददं == भ€1116)0€ 40०7९) ९1८16 9}3 # णञ्काण्टोः कष्टदो अत, 0) हालत) अह छक्षण€ 6दणक्पाद्ापल॥ 19 अतो € ४1४ (च 288. 333 == ॐ64. प).
2) जड. थवा ० द, ~ व मू ठर मर्मुसुम' षदप
रर मे न्यु | 3) धणे ति कदुअ. 12. 21 844 ) ५ प्डनृेसरमे बश्रुरञेपय भेत युर. -- णावणण्ण्मोद्लव = फला 1८06 एल्कण्ण्णट (श ०७४. 392 == 364. 8) | ॐ) वक्र) 8) कड. के ददुष्णाष्यसव, -- 1.2 16616 एल्णः > लफट द 6०९८९, दथ भं भि एर १८ एण -- अ सेनु दजनतय गुर शमयसि मैस श श्य भमन् ये म एम् वेखःयुप>, २ प्फ „ , , भण क (भीध्यनतण)
` ५ दुदर (€ इश्क सी, सो क भन्हैऽ 124. ४ )14 8709 वकर त ४३) 01०१५१४४
$ ४.8२ ४ €> (१००. 4७ 43, 9. 1089) ४१६८ }> ९४११४२६९ 2१ 9 ६ य् 8५६.
एण ३ प्र सिगक गुषृम्म कुम य् पय् पिप्क >, ५ 0/8 धमम्
07 शरा त कव नि शकट दीद्या वकत उवद, ६६ प स्त्चकलाकएः कन्रद्क
2९५] . प्रथमं प्रकणै 5
नामिन्द्ियविन्ञानानां डवप्रतिपाद्कलराच्च , नागमोदपि कल्यनापोटस्येव विज्ञा नस्य प्त्यत्तवमिति न युक्तमेतत् ॥ तस्माल्लोके यटि लत्यं यदि वा स्वृ 'सा-
मान्यलन्नणं वा सर्वमेव सातताइपलभ्यमानवादपरोतं ' प्रतः प्रत्यत्नं व्यवस्थाप्यते त- `
दिकिवेण स्ञानेन पकर । दिचन्दरारीनां ततिमिरिकक्चानपित्तयाश्रत्यतवं ' तिमिरिका्पे- क्षया तु प्रत्यक्नवमेव ॥ `
पेत्तविषयं तु ज्ञाने साध्याव्यमिचारिलि्धोत्पन्रमन्मानं । सात्ताद्तीन्दरिया- धविदामाप्तानां यदचनं प श्रागमः। सादृश्याट्ननभूतार्घाधिगम उपमानं रिव गवय इति ` यथा।
तदेव प्रमाणएचतुष्टपाल््नोकस्याथाधिगमो व्यवस्थाप्यते ॥ |
तानि च परस्यरापेत्तया सिध्यत्ति ' सत्मु प्रमाणेषु प्रमेयाधाः ' सत्सु प्रमेयेधर्वेष प्रमाणानि [7)9. 29] । नो त् खल् स्वाभाविकी प्रमापप्रमेययोः तिदिरिति तत्माल्ली- किकमेवास्त यथाटृष्टमित्यले प्रसङ्केन ' प्र्ततमेव व्याण्यास्यामः , सोकिक एव ट्शने स्थिता बद्धानां भगवतां घमद्शना ॥
वक्व, क शक काष्ठा च्म 20420 वश्व `कणकूम्कष्मुवद्व- 92 कवफठका० ४/ [वरुन] ५९९1९. 92. {थ कतक $, ऋ वच्छ, अवकट- १द४ ४१/ <६द्छ7 ४2१ ०207४2४ बककब्द्यवरव माग काकवकावफवववकल्कन्यं व््वपव्न्ट- 20 का ४ ५८, (एमा तेकड 20190) 2. 10) ~ ^ ०४११). ४. १. (8०५. 43.) 2418 5. का का0ण्पुगिद्षलाा2 क्का णपुकभ्क४ 407ब्वलव णुद कय; श्म भ
@व श्पमष्म ०९४ 7ा(7480/6व418 कदल प्टठका, -- रिठा लव्ध = अवधो्णद्वपधशुड- `
` 070, ऋका च क्वा = अपोदक दण; ए०7 6-668808 7. 65 ०.3 ९४ 2. ¶1
४. 1. -- १६0. 1. 6, लकल्डशमा न्वा्णणप्रलवक्काप्मके ०50कण्टक कव 20 ॥ १.,-190९7 € 1. 396. `
^ फ०४ा€ ॐपद्टणा ०6 ¶०७ ८९४ दद्व 6६801886 16 प्प वनकवणय तप ध्छणो द्रवष्ण्द- 204
प) भप; == ्ुपममपमु पमे (< म
1) 2138. #वः चठ [वपकव्कष्या॥ रण्करदकध१$०्०्द8व११०)१ ९द.
9 देः पुङगद,
3) ववक्ष) 4०, 8०४16; ४ 246, 9. -- ए ० 6-१९७००8 2, 80, १. 2. 4} (०षश्नाटाः 185 प6पि००8 69861469. -- 2, ए ०४. 199. 5. +
76 प्रत्ययपरोत्तानाम [~ धन्ना स्व्ृ्याः | गाद न प्वतउत्पगतते भावा इति ' तकत प्वत ` उत्पत्तिवेय्यात् । यचचोक्तो म॑ाभ्यामिति , तदपि युक्तमेकाशविकर्थात् । रेत स्तेकात्तनिकृष्ट इति तत्प्रतिषेधोऽपि युक्तः । यत्तु खल्विदमुच्यते नापित इति ‹ तद्धुक्तं \ यस्मात्पप्भूता एव भगवता भावानामुत्पाट्का निर्दिष्टाः \ चलरार्ः प्रत्यया केतुश्ालम्बनमनत्तरं । तयेवाधिपतेयं च प्रत्ययो नाप्ति प्चमः॥ २
1) >< षो सपम् 008०4010. 4 249. 9 व. 4) ०8 ०९७७ वषड 19 षण्ड
तप द०णणालण{दलणा' 70 भणा1६४, १6810०6 168 - पि्णकष्ढता०8. - 3०११०३५, पा. 5 3श्वुष्४ + # ४0011005 ६८८१४ प्िककानवकव १2 वव? -- भवा एकवत्) दैवाद एकवण्ठ अद्वय. ४० ऽवत एव्ल्वकण्कडन्छका+ प्वृकवमवकठवाव णष्छ्काा - 1.74 1०४०१7४2 0०6 भप ग इत्त४ 16 ३० 7870 (600४6 12 160 १6 1 €भप्षणा 0९8 ए द्ा198, 2740 शा, €&४ 168 कपप्९8 द्०गफाालनडिष्टिपा8) : ६० वकवम १५८४८१८: (वश्व, ‰१7८१/गु/ढ ए ०११87 211४४ (182 2), १००४ 8108017€ गंश1९- 7167४ 706 प्रष्टा, ४ अंण्फालणलण(ः अा४8-8 == ४४८४९. -- ए 0 2 १३.१1१ ९४४ (580 1) ध्वद्ाप्ाा क 5०४०४. ।
2) -04688प8 14. 1
8) €-0€888 88. 1
4 ७५, वषत्, - र. पतु चिषुषासेषु मकमन दु - ७०१-
40.३1५ दुंगुसबसिगु कमस पदिन् $) &-06888 38. 4 6) &-0688४8 36. §
7 ठेषमस पु दै कुः मे | फणृप मुर मे गेमकषग् | मुप पर वे देप > | कैमुर मे फुमपेम् ||
1.ग€ा०1०क्वं6 वप 70४ क्तिभ् २ ९8४ 600०866 8४१ १४.१९.०६ 8४०३ 21.1, 8053१ (४१ 11. 2. 19) 354. 8, प ९१६०४४81 ४६8४7 278. 18. (लया कुकौ कवक 4४ व्वव्ला्ं चवककडव्पवदल्ववतः ऋन0 १५१ 71४, -- 2/0 कतक ऽक 0४90), 2 ०४०१४६11 (दा 14व/ व्धुदट तवाप्ववपरलष्व वष्ल्वव्ः ४४० ०८८५5४८ 2८ %४न्त४व्॥
0 ए10ल0©, 11 ==. ११८४४. 4 91014}. ६. ». (8 ०८००८०१ 15370 ¶ कथन 0) तव द्मः वणक , व 2 त्वद चछ स्वल, चद्व, 7४ एनच; . ०५४ 7९ ४ 270/48/व 54१10 वाल" ५दवद्य/क, , , 4९1५7 21०४0 श्व्वत्छ्कः दकव
-22४ प्रथमं प्रकरणं . ५
तन्न निर्वतको सेतुरिति ल्तणात् + यो दि पत्य निव॑तको बीनभावेनावत्थितः स तस्य हेतुप्रत्ययः । उत्यग्यमानो,. घर्मो पेनालम्बनेनोत्प्चते त तस्यालम्बनप्रत्ययः। का- रृणस्यानात्तसो निरोधः वानत्यात्पति यथः । तग्चधा बोनस्या[नात्तते निरोधोऽङ्कर्- स्योत्याप्रत्ययः "4 यस्मिन् सति यदवति तततप्याधिपतेयमिति त एते चराः परत्य याः॥ पे चान्ये पुरोभौतपद्छ्नातपश्रान्नाता्यस्त एतेेवातताः । ३धरा्स्तु प्रत्यया ' एव न सेमवत्तीति । शरत ए[श्टणावावधारयति ' प्रत्ययो नास्ति पञ्चम इति ॥ तस्मदेभ्यः पटभूतेभयो (प. 29४] भावानामुत्पत्तिरस्ति परत उत्पत्तिरिति ॥
्त्नोच्यते \ तैव रि भावानां पमूतियः प्रत्यपेभ्य उत्यत्तिरिति । यस्मात्
१20) अतषदठा एक चकाठव्व ४ एकत्. -- 20808 4739 4 कलणाः वडव 2710440, श्ण ्वढ ६४ 17४४८ = ९६व्४व१न0 लषन, 7बा/क४/चड ४४ द्वद्काककद- दका (2?) १४ ०0०7९; दद दद १८४ 4८. -- 1569 9 कण्यणदकद क 19/४2 ववादः वव्युककद८ <, व्ववकषक्कदव्यृभव$वङ्व दद्युवकवद्ठ व्वदकाछवकवाद्व्यषच्. - . . कषण क तवकवपव्टु व्द्युनध्यव्युः €. -- ति ९६६1 १४1२१09 1. 4 § 15 ष्णाः ४. ०४५. § 115 (४) उवाकक्वधव्ााव, वनवद, कद्व). ~ 1४१ - ६2१४872 (8. 7. 8.) 85 7 शशााट्भ्णया पप इल्पाा€ फल एक्कुङ्व्ददा५ लपतत का, , 5 कककष्दावकलम, , , व्नाेव्कावय्षछवः का. . .; प्वपवष्व- 2८५1. . . ववन्द, ,; वक्व . , ववाशवकववद्व्लव्कका ०... द्वप्वल्वाकभ्वध्य; शवक. . .; प्व्रला लपक -- 86. 14 वलण्व्यन्छदष्द (1/1... ०४/4१ 27. . . . . प्व १0९, , , . , ४८ ब्द षद १०६७०46 -- 87. 3 74 0 बन०वकु८ व+ तथं , क्नवः चव वव. ~. प18०१)017४ 28 (प 27760, 4. 72. 7. 8. 1898) 0. 109 पपरक [09988 (0९8 12{{020 28}: ददातत) नक, वालक, ४६५; 7. 188, 1186 १6. र०६६-वपडतल एप ४8 १९ 18#1त52, १०४६ 168 वष््ःद, एषलफालः8; ८४) क्वाय, ` कदकवछ) कव्व; 16 &४¶ पलि€ : अववा ककव. -- ४४02१. 2१. 1.2 ~ रमण ४" 20१8 0४१18, 700. 8४१६811 2. 274 ५-7९7-94, ४४ ११५०, ऽद कन्लि ०, ` | 1.९8 पण ध्ा एभ्ु ध ४8 १७ 18 600021888766 , 8278 2१३7८. 8. 20. ३ (धकतप्ल्पण ०४8६०४०, ००6 122). ^ ४१०1११४. ४. ₹. (8. 8 ०१1१०४१) 91. 13४ 10 न्वमकककः ९० १४ व द्द्दा ॥लधरककावकककौद्वककफवदव) १007४ कव लव्लम(द ५पदव्कककाव्लष्द १८{१०व ८१1८८ . {९ = कुव((कश्कद्वय/८ (28 = वकचकवल्। , उकिकप्कप्काव्मूवक्वकवण्म- प्म४ल्व ४ ८
1) प्म 8१४8. ४. 1. 14.
2) ६९€तएटण€०६ पि 10, 6. 6४ 11 व€ 1४ 8 वप पए18प001098४ 0. 109.
78 . प्रत्ययपरोत्ता नाम [४४४-
न दि स्वभावो] भावानां प्रत्ययादिषु विग्यते। श्विग्यमानि स्वभावे पभावो न विग्चते\। इति । ३ यटि हेवादिषु पर्मूतेषु प्रत्ययेषु समस्तेष॒ व्यस्तेषु व्यप्तसमस्तेषु केतुप्रत्य- याम्या न्यत्र वा क्त चिदरावानां कार्याणामुत्यादातयूष सनव स्यात् › स्याततिभ्य उ- £ त्याद्ः। न चेवं यडत्यादात्ूर्वे संभवः स्यात् । यदि स्यादयेत चोत्पाद्वैषथ्यं च स्यात् , तस्मान्न चास्ति भावानां प्रत्ययादिष स्वभावः । ्विश्चमाने च स्वभावें नापित पर्भावः। . भवनं भाव उत्पाट्ः * परेभ्य उत्पादः पट्मावः " स न वियते । तस्मादृय॒क्तमेतत् पर्भितेभ्यो भावानामुत्पत्तिरिति ॥ शर्धं वा भावानां का्ाणामङ्कुरादीनां बीनारिष प्रत्ययेषु सत्स्वविकृतद्रपेषु ना- 10 स्ति स्वभावो निर्हेतुकलप्रसङ्गात्। तत्किमपेत्तं परं प्रत्ययादीनां ' विश्यमानयोरेव ङि वैन्रोप्मारुकयोः परस्परा पेतं पलं ' न चेवं बीबाङ्करर्योगुपमपं । तस्माट्विष्यमाने [79.80१] स्वभावे कार्याणां परभावः पतं बीबादीनां नास्तीति पाव्यपदेशाभावादेव न पद्त उत्पाद् इति । तप्मा- दागमाभिप्रायानभित्ततैव पस्य , न रि तथागता युक्तिविरदर वाकामुदा क्रति । घ्राग- 15 मत्य चाभिप्रायः प्रणेवोपवर्णितः॥ .
9 य्रबवुममथेः समव गे | केवपत्गृषप एम | सवग सरस्ते पपम् मेम् य गमे सुम ८५ पु मप्यमु ~~ एए. 6-0€88प§ 36. $ -- -
एण. © 1४5 8. 358. 3 द्तावयौछ्याः १90 कष्य स्वद्व क्ण कथक 20 014४५? -- 1/5 फ०त्ज तप काव ९8४ 086०४66 (भ). दष
9) 99. जव्क$ठ५.- शक, रगुसपप्यसः गाथुमत्पुर्ेगुषय 9 भ्वम्, ढः = तदुपनय 4 = गुरु ुमगुष
` शो-भृण्डाद्कव्यय (देशय) 8701९ णाणव
-२३] प्रवमं प्रकरणं 79 तदेवं प्रत्ययेय उत्पादृवादिनि प्रतिषिद्धे ' क्रिवाल उत्फट्वापो क्ये ' न चत्- दपा[२४०]यः प्रत्ययाः सातादिज्ञाने जनयत्ति ' विन्ञ्भ्रनिच्छिवानिष्पाद्कयान्, प्रत्यया उच्यते / सा चं त्रिया विज्ञानं नवति । तस्मात् प्रन्कप्वलो विज्ञानत्रनिं्रया वित्नान- निर्व न प्रत्ययाः । पथा परिक्रिया ्रोदनस्येति ॥ उच्यते ' ५ ग क्रिया न प्रत्ययवती4
पदि क्रिया का चितस्यात्सा चतरादिभिः प्रत्ययैः प्रत्यववतो विज्ञानं नयेत् । न वस्ति । कये कृवा ' इह क्रियेयनिष्यमाणा त्राति वा विक्ञान इष्यते श्रते वा त्राय
मनि वा । तन्न ति न युक्ता ' क्रिया कि भावनिष्याट्का * माचश्चोनिष्यन्ः किमस्य क्रियया 10 रातस्य न्म पुनरेव च नेव युक्तं '
न प्रतिपादितमेतत् (6) अ इत्यादिना च मध्यमकावतारि प् ॥ श्र्रातेभय न वुल *
कर्त्रा विना अनिरिवं [7)४. 301] न च वुक्तदप "
1) पज ५1-त6&8०8 2. 77 ०. 7 1. 2. 2) 249 एष्व 2. -- 9. खुप १। . वदताम्. -- ग. मेय णेमणे ९ ् न भम |
9 निपुसकयणेः नेदु सुपः -- पाष्मनः == सं, ९.१९ (१ ४8९१४४९), 7४18 == हटान्लध्टा €ं§ (8८) 714 == एः दक 2 द्व (९8९०१०४). ~~ 13/40 ० {8104 -@ == ४० &००}६ 19 एणी णह ककल. -- वकाक्कक्च = तक्र. ~ 6१७७६ 18 ९४१४8०0 वष ६ 1€ ड दण, € "00 [कड 185 [कष्यीकचयुकक &€ 19 ८018800 : €, ९४४ &४€.
8) एा€णाल 268 १० वृषकप्ि€ 9४.
6) ४५०१ 6 -त4689०§ 18. 8. -- (070. ९1१1 स (> 262. 19 शतक , , ५{‰41914451/0 वाकी )1वक 0 1८८7 द)911 १ लद्न्वककाकवहयुष्य,
80 | परत्ययपरोत्तानाम ` [७० इत्यादिवचनात् ॥ जायमानेऽपि भावे क्रिया न सेभवति , नाताज्ातव्यतिरेकेण जाय. मानाभावात् । यवो + बायमानार्घ॑नातवल्नायमानो न नायते । शध वा जायमाने सर्वस्यैव प्रसन्यति ॥ -ति॥ 5 यतशचेवं त्रिषु कालेषु उनिक्रियाया घ्रतेभवप्तप्मात्नास्ति सा ॥ श्रत एवाक् । क्रिया न प्रत्ययवती * इति । विशेषणं नास्तीति विना विशेष्यं । इत्यादिना प्रतियादितमेतन्मध्यमकावतरे '। न रि बन्ध्याुत्नो गोमानित्युच्यति ॥ गनेव- मग्रत्ययवती तरं मविष्यतीति । एतदप्युक्तमित्याक् ' 10 नाप्रत्ययवतो क्रिौ । यद्य प्रत्ययवती नास्ति तद कथमप्रत्ययवतो निर्हेतुका स्यात्। न रि तततुमयः पये न युक्त इति विरणमयो ऽभय॒पगम्यते । तस्मात् क्रिया न [२७४] मावत्ननिका ॥ शत्राङ् , यग्येवं क्रियाया श्रमः प्रत्ययास्तरिं जनक। भविष्यत्ति भावाना- मिति। उच्यते १ 18 प्रत्यया नाक्रियावत्त। यस क्रिया नास्ति तस॒ क्रियार रिता श्वक्रियावत्तो निर्हेतुकः प्रत्ययाः कथं ्- नकाः #॥ खथ क्रियावत्त एव जनकां इति । उच्यते।
1) ऋत ०६३7४ पा. 19 (2०६६०४०, 1900, 2. 282). 1/9 8६47166 ९8 ४6 पण्यः दधद्र © -त<क७०ण (क. ॐ २ ए. 1 (9), 1729)
ॐ) 8४४०८€ 200 उदद्णप१6€.
ॐ) ए. 57. -- कड. णदवकृवः 9 धते छदुटककका, , , - णद धस्त की
4) एर्व 522 त वषथगलिाा€ इतत.
5) 128 व ञ. छम हतर रा721)8 (1९ .) ९६ १1४02 (ठकवछ, 397. प. 197. 9) = नल्गृम ८0120४68, &70068 67४8 (86) 010६). - 1.४ द१्४१ दय
85. $ अकव क्यरक्न्कवव्द; सन्या ६१५४209 2वव, श्कवकट्छङ्कष व... (क्ण ल-कल्डञण्यड). ।
6) (ण एत तण अतम.
-28] ४.१5 प्रधमे प्रकरणं 81
क्रियावत्तथ सतयत ॥ 8 नेति प्रकृतेनाभिसेबन्धः। उतशब्दोऽवधार्णे । तत्र क्रियाया अभाव उक्तः* कवं क्रियावहं परत्ययानामिति ॥ यधा च [7)0. 919] वित्ञानबनिक्ियोक्ता ° एवं परिच्छिया- दोऽपि भावा उक्ता वेदितव्या इति नास्ति क्रियातोऽपि सम्त्यत्तिमावानामिति मच्त्यु- त्यादयाभिधानमर्धशुन्ये ॥ | | रत्रा । किं न -एतेन' क्रियावत्तः प्रत्यया इत्यारिविचारेण । वस्माच्तुरष्टन्
प्रतोत्य प्रत्ययान् विन्नानाट्यो भावा जायतते ' तस्माच्चतुरादीनां प्रत्यत केयश्चोत्यटो विन्नानादीनामिति ॥ एतदप्ययुक्त मित्या ।
उत्पद्यते प्रतोत्येमानितीमे प्रत्ययाः किल ।
यावत्नत्यग्बत जने तावननाप्रत्यवाः कवं ५
यदि चनुारीन् प्रत्ययान् प्रतीत्य विज्ानमुत्यगयत इत्यस्य प्रत्यया उच्यते * ननु यावत्तदित्तानाष्यं कार्थं नोत्यग्बते तावदिमे चलुराद्यः कयं प्रत्ययाः ! प्रत्यया ` एवेत्यभिप्रायः । न चाप्रत्ययेभ्य उत्पत्तिः सिकताभ्य इव तिलस्य ।
9य छेबमुरदय मेर | ठेनर्भेषवं उ मेत् | उपमे ठम म पम | उपशमे एम तमेष | |
2) [७ मनस = € १०४८5 17०46, , .
दिम मम १ ममर भोग डे उष वुगुष] देके मे चरै देशम् | पविषु ठगने दे ्२ मेय् || ए०वगय१०, प» 1; 80१8१1१९, 5787; 41०४०४०४ ४१४, 408, णपा 18 रकोध्टे हिक भेग्शेप == ‰2४1५ १010 दवत/तकारा १८.
ए १९७ {97९8 67४८6 ४४११०९४ 06 ५९ 8०0९, भला € सण्यैड क 19 क्ष्ल्ट- ४९१९ णदतोृ कण 8, . 8०016877 दर. 12. 114: %४ढ 0१ 9 णद ऊक, ष्यक ऊ 454 सवतैकण्य ? 2४ वेक 2 पद कदत) ववदकवशककः ण्ण कच्ण्डण्के- पज्या 13. ४. 345. 20. -- प 77१३६४४8 71. 1. 41, 1१४. 1. 59.
१ ॥ 6
10
छि 0 प्रत्ययमहोल्ा नाम (२७४
ख्य मते ' पर्थमप्रत्ययाः सत्तः किं चिटेन्यं प्रत्ययमयेतय प्रत्ययवं प्रतिपग्यत्त इति ।
तदप्ययुक्तं । यतततप्रत्ययात्तरमप्रत्ययस्य प्रत्ययचेन कल्प्यते ' तदपि प्रत्ययते सत्यस्य ~ ~~ नज्रा८चिव (2) ~~~ न प्रत्ययो भवति । तत्राप्येषेव चित्तनेति न युक्तमेतत् ॥
किं चेदे(५भ]मे चतुरादयो विज्ञानस्य प्रत्ययाः कल्प्यमानः पतो वास्य कल्प्ये नतो वा ' सर्वथा च न युव्यत [70. 319] इत्याद । नैवाततो तैव सतः प्रत्ययो ऽरघस्य युष्यते ।
कस्मादित्याह । ततः प्रत्ययः कल्य ततश्च प्रत्ययेन किं ॥ ६
रसतो छवत्याविग्यमानस्य कथे प्रत्ययः स्यात् । भविष्यता व्यपरेशो भविष्यतीति चेत् । नैवं , भविष्यता चेदयपटेण इष्टः शक्तिं विना नाप्त रि भावितस्य ' ट इत्यादिनोक्षदोषलात् ॥ सतो $पि विमानस्य लब्धतन्मनो निष्फनव प्रत्यय- कल्या ॥ 1
1) "भूद 9. शणावयङुवकव्डव १८६५. -- 1.6 ए०णर ९३ 210/@ १४९ 1 8णगण्डटे एणाः व6ाता€ कवक ९6४ वणाव $व४द. ,.
2) 83. वयद्ुव्यं 2. 40 १म् प = ण्ष्न््याछ) १५ क्रव्य एम 4६९ 3. ४०६. लन2११द
9 मेपसम पएसुपमे नुमृषप धन | ठेषु बे उरः मधमु | मेमृमं गरणे कैब ९ "दुर | पलम् कुमेेम रबेगु ख | ० भव५५ ९७ ५८६ ७ ए, 20 -- एष१४३३11४६ 1859 6; 802४१1१९} 563 1. -- (0णृश्च ९2 18 9।&०९९ 897 - » 2१.8.14. 18: १८ 5५१ द्वष््नः$द
4) (ण्ण. 4 9४1420. ए. १; (३०५. 48.) 228४ 2 (11.811 एकवण 57१0 पद४द चवदुः2 १४८६८ 168 €ग्76881008 वाडवः वीर अधवा ०दर, ०१८४ वत्व 8090६ 3070668 60076 ९अला 168
ॐ) = 080 2731१३78, ए. 58 (8४०८6 ०पांऽ€ १४०8 19 लह सं ३४ त ण७६००) ~ 00 = गडु यु एणः ज. ६. ए. इणा€णल्णौ,
अद्धा.
-24 >) प्रथमे प्रकरणं 82
एवं समस्तानां प्रत्ययानां कर्वेत्यादनातामर्घ्यनाप्रत्ययतनद्वाव्य ग्रतः परं व्य- -तानानप्रत्ययवं प्रतिपाग्यते ॥
अजराङ । वब्यप्येवं प्रत्ययानामसंभवः ' तथाघ्स्त्येव सन्नषणोपेणात्प्रत्ययप्रनि- द्धिः। ततन निर्वर्तको से्तारति ` लत्तणमुच्यने केतुप्रत्यवस्य ' न चाविष्यमानत्य लत्तगो पदेशो युक्तो बन्ध्यासतस्येवेति ॥ उच्यते ' त्थादतुप्रत्ययो यदि तस्य ललणं स्यात् ' व
प
न तत्नातत्न सदसन्धरमौ निव॑तते पदा !
फ [ने कि ` ववे - ` व, क {2} कथं निवर्तको केतरेवे सति कि युत्यते ॥
तन्न निर्व्तक उत्भाद्कः ' यदि निवत्यी ध्नी निवर्तेत तमत्पाद्को केतुहृत्पाद्- वत् * न तु निर्वर्तते ' सरसड़भयद्रपत्य निर्वत्यंस्वानावात् ॥ तत्र सत्न निवत विच्यना- नवात् । ्रसन्नप्यविग्यमानवात् [7;. ३२०।। सदृपन्नपि पारपरविहेदस्येकार्धप्याभा- वात् * उभयपत्ताभिदितदोषलाच्च ॥ यत एवं का्ंस्योत्पत्तिनास्ति केतुप्रत्ययोऽप्यतो नास्ति । ततश्च यड़क्ते ' ललणसेभवादिग्यते केतुप्रत्यय इति ' तदेवं सति न यु्यते ॥ इदानीमालम्बनप्रत्ययनिषधार्थमाक् ।
५
1) 41०६०01 ०३४ गुरि स रम्मुपनि समथेसस १
~>, ड) >. {-. >~, ¬~» ("> ->) मु 9 4 ग >. =" 2" एः 2 * २ एरर" नैव | टच. ) ध € १ 0 २ चु ~^ शुभम ६। भुम उ | > ८मून् भेरेपुसन || ०९ पृण वणण€ 12 1९०; दवतन
प ण्माव0 7 द द्वय 5व १4 ४१४०{९. -- ए ०४ 6 -4९७७००8 1. 13. -- (€ 309 ९5 6४6 €-4९8७०8 2. 31. 6 ९४ ४१ +. 26.
8) ०८ 2. 76 ००८९ ¶. ~ 41 ०४०४४४58; नमेगुसपनि नैम, ढे रेमे
देसे : [८वनषेदकदकन४व ४ णपा छप वद्र प्ण एने कमृण, --, के १प-
119, 7० 1173. 1174. ~ 70189३४ €8६ कपण कण ४१६६ € पप दाग व - ठव (7४०११०१, १० 2४69) ९४ १९ 5४ धै; 1 क ४ ००6 प्रह १6 १1४- ४४१९ १४ (०1११1४2), १० (शा. 1.# वच्लप०९ ९७ ५०४४९ 1469181९ ; 91 1९8 ४१०९३) ४ 1९8 €०पा 0868 034070९8 ०€ 2९0१९४४ ९6 ००}९४ १€ 12 6०0०8188 &66९. -- 5 प्य 1४ 16८- पा ब्भ्य (एदा व्कव्माधवाद)) रभ ४0१. 1. 470.
~~
0
84 प्रत्यपवरोत्ता नाम [२५
(1) ४ ~ अनालम्बन एवायं सन् धर्म [247] उपदिश्यते)
ए 2 श्रवानालम्बने धर्मे कुत ब्रालम्बनं पुनः ॥ ट
इ सालम्बनधर्माः कतमे ' सर्वचित्तवैतता इत्यागमति। चित्तवेत्ता येनालम्बनेनोत्य-
यतते पवायोगे बपादिना स तेषामालम्बन प्रत्ययः ॥ श्रयं च विग्मानानां वा परिकिल्व्ये 5 ताविग्यमानानां वा ॥ तत्न विश्वमानानां नार्घप्तरालम्बन प्रत्ययेन ' धर्मस्य खत्यततयर्थेमा लम्बनं परिकल्प्यते " स चालम्बनात्पुवं विग्यमान एरघोति। श्रयैवमनालम्बने घर्म स्वात्मना परतिदे किमस्यालम्बनयोगेन परिकल्तेन ' इत्यनालम्बन एवायं सन् विग्यमानो धर्मः चिततादिकः केवले सालम्बन सत्युच्यते भवद्िः स्वमनीषिकर्या, न लस्यालम्बनेन क- शितसंबन्धोऽस्ति ॥ श्रवाविव्यमानप्यालम्बनं परिकल्प्यते । तदपि न युक्त ै्राल- 10 म्बन (प, ॐ] एवायमित्यादि † श्रविग्मानत्य दि नाप्त्यालम्बनेन योगः।
1) 788. 5 ववम, उवाद, |
9 एएमुपतेः केस रतु सुमेगुसपः दे | मेप रमर एप, पुमे | डश ङस से रमेगृसमेदुय | मिगुस पदर, गुप चु || 1९५०९७ तणवकर कथा. [वाषण 4९8 -7 इ प्ा1८३8. 144० उ एाा. - 41०६०07 853 श्रम कसप (७० ०१९४६ 788 प्र्वप्ध); ए ०११४२7३1} ४४ एम पतेङषमे (फक 7९७६ 798 प्ाश्वण,
3) ¶€ 781 93 1व€णौ70€ ल्ल बद्र ३) १०९ ५1४९ वपञडं ए 08 १४१1१९४३. -- (ण्ण). 7 1.-871 1185. 1508. (8५६8 ४४ 0 ४९€ ४ ९06०11{४0४ ०४ ग भणण = भ्या १०१५}. -1.€ > 1509 प१€ 12 7 0.-81 1 ९8६ ४6६, व ष्ा2े8 16 & ३8४7४ (श्म पठस्व)
9 2392 ₹४१} १४९१४ (901. 609). -- ^ 1४६०४६8 (40) 5) = . . , ४८ कमय बथा, १८ (शव्वदकष्छव्यावपकच७व््. - एण २८३११६४० 2. 3.5,
4) == 212€०€8 6 पषवत्चणला., (70) \110& 1, १. ४). 5-5) तस ६ 1 | ममन, म | तनः (हि नू, -उन, मे | ९ = 15, रि सतरः == व१व्व१९८१द ९णवुवकः ऽवा ९८०0 ५(0/414 पल्य.
- २4) + प्रधमं प्रकरणं 85 ्रनालम्बन एवायं सन् धर्म उपदिष्यते * भन्रद्धिः मालम्बन रति वाक्यरोषः। - श्रधानालम्बने धर्म कुत प्रालम्बने पुनः । वशब्दः प्रभरे , कुत इति देती । तेनायमर्थः शरतैवमनालम्बने धर्मे ऽतत्यविग्यमाने मृषः कुत श्रालम्बने । घालश्चिनकरामावारालम्बनस्याप्यभाव इत्यभिप्रायः । कं तरिं सालम्बनाशित्तचेत्ताः ' सांवृतमेतल्लन्तणे न पारूमार्धिकमित्यटोषः। इ्दानों समैनत्ताप्रत्ययनिष्धार्धमाक् । नुत्पत्रेषु धर्मेषु निरोधो नोपपग्यति ।
नानत्तएमतो युक्तं निरुदे प्रत्ययश्च कः।† ९
१ हष त गुप | पव दुम म के येष करेय | समिगृमपमर परस्प, वमयु षणे रगु मते = ववछ0 २2 000710700004}; 3 27 द्रहव ९०0 एव्व च्छववदुकवा९; अद्यकपवाव (8) 1
2 1.6 णः दाका (मेवम् द) ९७ मष
ॐ) कण्धा€ ६९२१९ 9९ 080णद्ुण€ 288 उदावता (मद्^सपेमगुपः) ल कवा; पी 2. 76 ०, 7. ~ 01०86 ०९ 14 ४०६०0१78; गमश्वगु पते 1
मै कमपुमदिपुपति सिस = कायण षाणामा क. --
भटे 18 त&0िणा्०ण १6 ००४6 ५८९) = प्काप्नावभरष्वकवक० ऋन०वाब, (०ण्फभलाः अञ) 385४ 1१. 1. 14 #द (्८्व ठदणवाषवमव0 शचणवकलव्वष) ८११५१८१८
व्न्भुसा ०८ ०४2 ४४. 26०४४00 15 ९४ बोर). -- ह ०६0१. 3. 1 (+ १६४२- ४४६४8, 2. 183); ण्णः कधा 16 52 40८९०, णद्ध १6 19 876 १९8 काणक णिन्शाह्लध्णला8, 168 4०00988 60०006४६ = अ्ितिकपर्लण€ण > 128 ¶०९७६०य 0 निट भो 20088 21186 जअ)60 (06 0१6 १17९807 9118९ 28१6 0६ ०९४३९? (2.0? 8 7 »*198, 8209018 917 ए३०११४१४४ 3९119).
9 दशरदमस शनैषप म धमम् भगुगुप चपर मे तुर् | रेद् तिलकं ॐ रतु । रगु मे केप कतृ भी
86 | प्रत्ययपत्ता नाम [२५४- तत्र पश्चिमे भ्रोकस्यर्धे पाट्व्यत्यो दष्टव्यः › चशब्द [5०] मिन्र्रमो निरे चेति । तेनैवे पाठः ' निरे च प्रत्ययः कः ' नानत्तएमतो युक्तमिति । मओकबन्धार्धे वे. वमुक्तं ॥ | श तन्न कारणस्यानत्तरो निरोधः कार्यप्योत्पादप्रत्ययः -समनत्तरपरत्ययलन्तणं ॥ शत्र विचार्यते । घनुत्पत्ेषु धमेषु कापमूतेङ्करादिषु निरोधो नोपपग्चते कारणस्य ` [न. 8०] बीनदिः । पदैतदेवे तद काएणस्य नि्धामावाङ्करस्य कः पमनत्तप्रत्य- यः॥ शरधानुत्पन्ने ऽपि कर्ये बीनिरोध इष्यते ! एवं सति निरुडे बोतेभावीमूतेऽङ्करस्य प्रत्ययः। कोवा बीतनिरोधस्य प्रत्यय इति ॥ उभ॑पमेतदद्तुकमित्यार ' निषदे च । कः प्रत्यय इति । चशब्दोऽनुत्य्रशन्दपितः । तेनातुत्यते चाङ्के बीनाोनां निरोध 10 इष्यमाणे ऽप्युभपनेतदररेतुकमापग्त इति नानत्तामतो युक्तं ॥ श्रय वा न स्वतो नापि परत इत्यादिनोत्यारो निषिदस्तममितेधायाह । ` | श्नुत्पत्रेषु धर्मेषु निरोधो नोपपग्बते ॥ नानत्तरमतो युक्तमिति । श्रपिच 15 ` निषे प्रत्ययश्च कः॥ इत्यत्र पु्वकमेव व्याण्यानं ॥ इ्दानीमधिपतिप्रत्ययस्धद्रपनिषेधार्थमाङ । [वीनीरोना) भावानां निःस्वभावानां न सत्ता विश्चते पतः।
= तातेत [~ ज्य ~~ (२) पतीद्मस्मिन् भवतीत्येतत्रैवोपपग्चते ॥ १०
1) 5ध्वा व्च "8६ [१3 प्र 0४ १४०३ 16 कषप.
2) 0210188 1९ 1106४. | को क्के = ५ ४ = „> [ क (= ४ {क ह
9 स्स = मेर 2 ५ नु | ए
पस् उर विस | 7 पिरम 2२ ड : )।
-259] प्रधमं प्रकरणं 87
इ्ह पत्मन् पति द्वति तत्तप्याधिपतेयमित्यधिपतिप्रत्ययलन्तणं । भावानां च प्रतीत्यतमुत्यन्नवात्स्वभावाभावे कृतस्तयदृप्मिन्रिति कारणवेन व्यपदिश्यते ' कुतस्त ग्चद्द्मिति कायवेन । तत्मान्नास्ति लक्नणतोऽपि प्रत्यसिद्धिः ॥
खन्ना [79. 339} ' तल्लाद्भ्यः पटादिकमुपलभ्य पदयटेस्तच्नार्यः प्रत्यया इति ९5४] । उच्यते । प्ादिफल प्रवृत्तिरेव स्वदपतो नास्ति " कुतः प्रत्ययानां प्रत्ययलरं ते- 5 त्स्यति । यधा च पटादिफलप्रवृत्तिसती तथा प्रतिपाद्पत्नार् ।
न च व्यस्तपमत्तेष परत्ययेष्वस्ति तत्फलं ।
(न ^ [रप [र्व (4) प्रत्यपन्यः कथ तच्च भवन्न प्रत्यपघु पत् ॥ ९९
तत्र व्यस्तेषु तततुतुरीवेमतपरशलाकारिषु प्रत्ययेषु पयो नास्ति ' तत्रानुपलभ्य- मानात् ' कार्णबज्नवाच्च कार्यबङवप्रसङ्गत्। समुदितिष्वपि तच्चारिषु नात्ति पटः , 10 प्रत्येकमवबपवेष्वविग्यमानलात् ' एकस्य कायस्य खणड उत्पत्तिप्रसङ्ात्। तस्मात्फ- लाभावान्न सत्ति प्रत्ययाः स्वभावत इति ॥ | ्रथ्ातद्पि तत्तेयः [प्रत्यपेभयः प्रवर्तते ।]
1) 8०१४४ 211४४ 2]0प८€: वडा वञ्च व 9 एकरकण्व,
2) ०४ पपगुरख, ववादः पगु, (01888. 28. 14. 117. ॐ:
2 एभाकलडा ०0४ पत्ालया ००४6 10 84081). ~ चभ 2. 76 ०. 7. ~ ^ ४०१००092 क सूपे पति मुखस == वदाव /40/0 वद्वा.
3) 5४८१० ४९8४ 83 2१४४ १808 16 {9.
9 छेमेदधमम संस नसुखसयि | रसु देमि भेषु क्र | ठु दंमसप्य म॑ पुर मेस | द म सेमपिस द्निर ४ || 8०4४०५१ ३11६5 शफ पूचर (18897) स जं (४ 8०४ 19 166७ कच्छ १४८5६4०.
5) ॐश्वद्श्व्व ०१५8४ 88 (2 प४ १४४०४ 16 ४.
88 ं ` प्रत्ययपरोन्ना नाम [(25४- इत्यमिघरायः स्यात् ॥ [खप्रत्ययेभ्यो $पि कप्मात्नामिप्रवर्तते फलं ॥ १९ शरप्रत्ययेष्वपि नास्ति फलमिति ' श्रप्रत्यपेभयोऽपि वीरणादिभ्यः कस्मात्रामिप्रव्तते पट इति ऋत्ति फलप्रवृत्तिः स्वद्रपतः॥ | 5 अजरा । यख्न्यत्फलं स्याट्न्ये च प्रत्ययास्तदा किं प्रत्ययेषु फलमस्ति नास्ती. ति स्यात , नास्ति तु व्यतिरिक्त फले \ किं तरं प्रत्ययमयमेवेति ॥ उच्यते+ फलं च प्रत्ययमये ्रत्ययाास्वयेभयाः 1 कष. ञ्नो
। प" थ ` फलमत्वमयेः यो पत्त्प्रत्ययमयं कर्थ ॥ ९ यदि प्रत्ययमयं प्रत्ययविकार्ः फलमिति व्यवस्थाप्यते तदयुक्तं । पस्मात्तेऽपि प्र- ६ ह . ¢ न +. -. "न. ् 10 त्यया अस्वयेमया सप्रत्ययस्वमावा सत्यर्यः॥ तततुमयो ठि पट इत्युच्यते। स्यात् पटो षटि
1) कड. कदन्यद 8 धं ६९747. 00कध्वव 27 ४४ ०एाधणव्ुप्म ४ व्यू . - -- 7727768 106 ए९8100 प0€॥क्षाप6, 16 उत्प ४ ण 6 1०४
+ एरच्स्ठेटा 12 एषा पछ 407८४ 397) 124 णथाा€ ०801886४ ०6 ०४6 वण€ इण ड चच्छड क्ोश्चाह 3038.
ऊण ककड उधाशं0, 16० ६68 ए द 1188 (१० हणा) 6४ 19 च्कतप्रल्णण
ध 8० ०२४२7ड1१६२ (18582 7): २ | ममुस'दु प भेम य | रए मु विष् | ब णुः] डेमममृ्स छन 7वसयु १ | उपर मुद्र मन्युर ||
174 ०१०७०२2 {413 5) ६ 818२8१1९ 62 (620 8) 186€0/ 16 एला 208 द | भ] + गृ. 82208 12 16]06प्तप्०छ तप 0६ ‰7तढ + 2 41 3) अकव्षच्वः 724१6 १४8 (1. 9 ॐ-"“" समस्य गुड
9 “वपु कवे रतवं | दग पगु सपव भे | स्पगुूमेमुपम प्सुः पु] वेवि दि कषुर पवित || णर पकप
एः > प्जदै क~ दरक -.. -- 700 ए2च = अध्वादव्छय, -- 1०4 1०४०१878, एप 222 131४2 € 289 हर 21१62 1860४; १४५१-1 १09, १८-1ब5 12४५9.
8) 9. == कय 25 ६4011114 १४.
१ 46 ^ + ++
-26 ५] | प्रथमं मरता 89
तत्तव एव स्वभावतिद्धाः स्युः ' ते सखशमया ब्रंशविकारा न स्वमावतिदाः ' ततश्च तेभ्यो ऽस्वयेमये(भ्योऽ]स्वमावेभ्यो त्फलं पटाव्यं तत्कथं तत्तुमयं भविष्यति ॥ यथोक्तं [४४१] ° पटः कारणतः सिद्धः सिदे कार्णमन्यतः) तिदिर्यस्य स्वतो नास्ति तट्न्यन्जनयेत्कयथै ॥ इति । तस्मान्न प्रत्ययमयं फलं सेविते ॥ श्प्रत्ययमय तर्स्त। नाप्रत्ययमयं फलं । तनिभ्चते। . ॑ इति तत्तुमये यद् पये नास्ति तद् कथं वारणमयः स्यात् ॥ शत्रार् । मा भूत्फलं ' प्रत्ययाप्रत्ययनियमस्तु विग्यते। तथा च भवान् ब्रवीति \ 10 पग्बसत्फलं प्रत्ययेभ्यः प्रतते श्रप्रत्यपेभ्यो ऽपि कस्मान्नामिप्रवर्तत इति । न चासति फले पटकदटाब्ये तत्तुवीरणानां प्रत्ययानां प्रत्ययव्रं युक्त \ तः फलमप्यस्तीति [7,9. 84४] ॥ उच्यते । स्यात्फलं पदि प्रत्ययाप्रत्यया एव स्युः * प्ति हि फल केश्य प्रत्यया शमेऽप्रत्यया इति स्थात् । तच्च विचार्यमापौ नास्तीति | फलाभावात्प्रत्ययाप्रत्यवाः कुतः.॥ ९8 15
{9 गषत, गणक, ग. कमु -नपदमु कमस हुम
2) 46708 6५४४० १8०8 ए ०११४721४; 1899 1. - ए०णः 168 व6ण वथ. 0168 22088, 6002. & ०४६३७४7 ६६४१, ० हरा, 279 5.
१ नभ् = ५५
4) 1.6 ५९२४९ १८ भ(^# ९8६ 6४82011 ॥'*078 16 ४०८४४११. 9 वेदिक निपुयिःप निहगु मतिः रपद म्, श्प = ४ ०१०१8 6) ५ = रैः &०९ 4० ०9 ९९ भत ५ ० नोक.
7 बेडुर केषर पवसं भेव्| केवमेमर पदम परभमु 8| एममेमं नप्रममुमेमपमय् | कममेय् लेन र्ः गृ तुर ||
8§*
90 य प्रत्ययपरीत्ता नाम ` [२6५-
प्रत्ययाशाप्रत्ययाग्ेति समासः ॥ तस्मान्नात्ति भावानां पमृत्पत्ति दितिः पधोक्तमार्यरत्राकमूत्रे † शून्यविष्यं न हि विग्यते क्त चि , श्रत्तरीति शकुनस्य वा पटे । ६ यो न विश्यति समावतः क्त चि , सो न बातु परेतु मेष्यति ॥
यप्यत्नव दि समावु लभ्यति ' सो ्सभावु परच्चैः कथे । धरं किं जनीष्यति ' एष केतु सुगतेन देशितः ॥ सर्व धरम शरचला दष्ट स्थिता निर्थिंकार् निहपदरवाः शिवाः। ्र्रोलपथतुल्य भन्रा्का , तनन मधति अगे शरत्ानक ॥ शिलपर्वत यथा श्रकम्पिया ' एवं धरम श्रविकम्पियाः सदा । नो च्यवत्ति न पि चोपयग्यय एवै घर्मं तिनेन देशिता] ॥
1) ऽ्प्छेषढ्कवव, कफो १४०३ ¶6 119.
2) &४०१}००7, 240०, जा. गि. 885--456 (९९१, 7. 2418). - एणाः न-4€8- 80४8 ० ए. 6. ~ ५४० द्वाः 2४ €३६ प १९३ 8९126 गा९8 एलाप९प ञ् दलाप्ा668 . १४०३ 16 [,०४४३, 08}. [ (९०, 2. 4). ~ शर 2१४१०११४ ४४३ --------- ~~ |
3) 1088. ०८. (70 गुर ठ निर 9 प् व्] ॥ भे प गे == 5१04४ (४६१५) वम ०१४०९५१४ १0 ०४व४४९. 4) 1088. भ्8९, ०४९, र; न. ४ 0२. 1. 341. %. बृरमु कर द्वम् तेषु एममेमुप = अवमा १० त 9०० ४१2० ४४८८ 8) 2488. 24५४१ ; १6 66 र्वकद्ण्ठ 6०716 ए0णः 16 प्ट ९. ¶) 2088. 2४, ११. -- ८2 प्क 8) €१९४४-४-0€ १०९ 18 ०8०6 73€ 068 कव्१द5 ९३६४ 06४76 वलव्द्ड 9) 19 भेम पः प्रणी पर. 1. 84.19, 27229228. 275. 19 &4वद..... ३4१९० कवठ व्पुकभ्म्ठ ०७०८४, ६५42. . . . ॑ 10) शण्डा, कम. 11) 88. ४, ४ (५. 19011816 एन), ४४११. प) प. दमनम् = गवोककनन; ग. ससस निर == ९५०१ कच.
-26] प्रधम प्रकरं 91 इत्यादि । तथा । |
यो न पि ज्नायति ना चुपय्नी ' नो च्यवति न पि तरति [२6१] धर्मः।
तं तिनु देशयतो निः ' तत्र निबेश्िं शतानि ॥
यस्य समावु न वि्चति कथि ' नो पभावतु केन चि श्यः ।
नात्ततो न पि बातो वा ' लयति तत्न निद यि नायः॥
शात्त गती कथिता सुगतेन ' नो च गती उपलभ्यति का चि।
तन्न च वोक्रसो गतिमुक्तो [110. 85९] 'मुक्तकु मोचयता बऊसतान् ॥ इति विस्तर्ः॥ +
॥ इत्याचा्वचन्दरकोर्तिपादोपर् चितायां प्रसत्रपादए्रा मध्य॑मकवत्तो प्रत्यप्परोत्ना
नाम प्रधमं प्रकरणा ॥ ५9
1) 1.€ ०९०९ 7 ह्ुणा€०४ ९8६ <€ 24 7 वा. 6. -- का 0 ०१988 ---------- | 2) दि करणीम् -- ४81४016 (४५ शा. 6): श्ववदुकःं ऽवण्ठ ऋष्वा 3) 1.€५४ा€ 16679016 > दला] १०४९ ००8 2१००8 2007४66 %. 1.
9४ गतागतपरक्ञा नाम ` [२७४-
1. गतामतपरोक्ता नाम दितोयं प्रकरणं . , अत्रा \ यश्चप्यत्पादप्रतिषेधात्प्रतीत्यसमत्पाट्स्यानिरोधादिविशेषणसिद्धि*, , तथाप्यनागमानिगमप्रतीत्यसमुत्पादपिदये लोकम्रमिद्रगमनागमनक्रियाप्रतिषेधा्थं किं 5 चिडपपत्यत्तमच्यतामिति ॥, उच्यते । पदि गमनं नाम प्यात्नियतं तद्रते बाऽध्वज्ाते परिकल्प्येतागते गम्यमाने वा । सवधा च न युव्यत इत्यार।
गतं न गम्यते तावर्गतं नैव गम्यते । गतागतविनिमृक्कं गम्यमानं न गम्यते ॥ ९
तत्रोपतगमिक्रियमध्वनातं गतमित्युच्यते । ्राविश्यमानं वर्तमानगमिर्रिरया
10 गम्यत इत्युच्यते । वद्रतमुपरतगमिक्रिय तदतमानगमिक्रियायोगवाचिना गम्यत इत्यनेन
शब्देनोच्यमानमसंबडमिति कृवा गतै तावद्म्यत इति न व्यते । तावच्छ्ब्देन च प्रति षेधक्रमं एृशंयति ॥
` 1) 8००0 270211४४ 19081.
4
2) १० &1-0688४8 ‰. ५8, 19. | 9 रेषु नपि मे सनु| मरभिरपय भिर मुप भेष्| सर पुरम सनः ममिगृसपः | स्वम पेम मे दयु || 10९ ४ वरणह० 8 $ & ०0 क. । |
4) 2088. ववक्षु ००40. -- एमी 1072 ४0 ए, 14 (णि, 467 ण ०१७४०४०४). ।
^" "न न क १ 1 क
- 9] दितीषे प्रकरणं 98. श्रगतमपि न गम्यते । श्रगतं खनपल्लातगमिक्रियमनागतमच्यते " गम्यत इति च वर्तमाने , घरतोऽना[शश]गतवर्तमानपोरत्यत्तेदादगतमपि [7५४. 85] गम्यत इति न यत्यते । प्यगते कथे गम्यतेऽध गम्यते न तद्गतमिति ॥ गम्यमानिऽपि नास्ति गमनं यस्मात ' | गतागतविनिरमक्तं गम्यमानं न गम्यते। ` ^ इक रि गत्ता पं देशमतिक्रात्तः प तस्य देणो गतो ' पं च नातिक्रात्तः सोऽत्या- नागतः। न च गतागतव्यतिरेकेण तृतोयमपर्मध्वननातं पश्यामो गम्यमानं नाम । यतथेवं गम्यमानं न गम्यते ` गम्यत इति न प्रन्तायते ' तस्मान्नास्ति गम्यमानं । श्रतो न तद्रमि क्रियया श्राविश्यते न गम्यत इति नास्ति गम्यमानेऽपि गमनं ॥ घ्र स्यादरतुर्गच्छ्तो यश्चरणाक्रात्तो देशः त गम्यमानः स्यादिति । तरेव. चरणवोएपि परमाणुपंधोतवात् । धङूल्यावस्यितस्य परमाणोः पवी देशः घ तस्य गते्तर्गतः। पा्यवस्थितस्य चम- परमाणो उत्तरी देशः ष तस्यागतेऽनतर्गतः। न च पर्माणुव्यतिरेकेण चरणमस्ति तस्मा- न्रात्ति गतागतव्यतिरेकेण गम्यमानं । था चेवं चरणे विचार. एवं पटूमाणूनामपि | र्वपर्दिग्भागसबन्येन विचारः कार्ष इ्ति!॥ घ्रधार्थगतं गम्यमानं " उक्तमृत्तरं जायमान- विचरणं । तस्मादरम्यमानं न गम्यत इति सिदध ॥ | | 15 तन्ना [7\0. 86४] । गम्यत एव गम्यमानं इह दि. ` चेष्टा यत्र गतिस्तत्र गम्यमाने च सा पतः। ` ` न गते नागते वेष्टा गम्यमाने गतिस्ततः॥ २
भ“
0
1) 188. ववा १४. ४
2) ४98. 92१ 01द40ाच्ठा दकतिकवकष्ता. -- ए. फा, +बताक्ीतद. 8) धभ 8०११1१५. 1. 47.
4) एण ०३-०९७७०४ 2. 80. ४
9 कुरे गु देयं तु| मे धत कुरर सुमपत| गापक मेमं मङ्ग मेम्] रेढर प्म शप प् |
94 . गतागतपरीत्तानामः ` ` ` (ध तत्र चेष्टा चएणोत्तेपाधारिततिपलक्तणा । यतो त्ररतो गततर्यन् देशे चेष्टा मतिस्तनैव दे " सा च चेष्टा न गतेश्वनि संभवति नाप्यगते किं तु गम्यमा[धण॒न एव ` ततश्च गम्यमाने गतिः । यत्न कि गतिर्ूमलभ्यते तदरम्यमातं ' तच्च गमया म्राविश्यते । | तस्माद्रम्यमानमेव गम्यत इति ॥ एकोऽत्र गमित्तनीर्धः' घयर देशात्तासंप्रा्यर्थ इति ॥ 5 एवमपि परिकल्य्यमाने गम्यमानं न गम्यत इत्याह * गम्यमानस्य गमनं कथं नामोपपत्स्यते । गम्यमाने दिगमनं पदा नैवोपग्यते ६
इह द्टि गमिक्रिषायोगारेव गम्यमानन्यपेशमिच्छ्ति भवांस्तच्च गम्यत इति ब्रवीति । टका चात्र गमिक्रिया ' तया गम्यमानव्यपदेशो भवतु कममघनो ' गम्यत इति 10 भूयः क्रियापेबन्धो गम्यमानत्य न युव्यत इति गम्यमानत्य गमनं कधं नामोपपत्स्यते ॥ काृणमाङ्। १ गम्यमान दिगमनं यद् त्रैवोपपग्बते ॥ इति | गम्यमानमिति गम्यत सत्यर्थः ।“दिगतं गमनं दिगमनं 4 एकस्या गमिक्रियावा 15 गम्यमानमित्यत्रोपयुक्तबाद्रूतीयाया शरावाच्च \ गम्यत (7. ४6१] सत्यवं व्यो
1) (णका 16 00106 १९8 70४8 दयु) 5४446.
9 पुम चुप पमुप व| दिद्यु य्यर्] गरक र्तुप मेदपष्ये| परमप चदुप) मेरु || = कणा 2 कणठ ` वण हव पवदशमनकृव्दक८ (ध १० उ षा ९६ 1९8 एणणणलभा९छ). -- 11. ण णकहि्थः ८९४८९ 1९400. -- ४ 07 168 70168 $प्रो १ ४68 €६ 18 &1086 धणष्दं व्माच१6१व (7. 96. 1).
3) 1.6 ` भण प8वेप धम 6 लं -4९७७४४ (र्णं 006 2) & श्रणण+& पनुपमेद्,
तु मे नगुप (५) पुति ्= वदुवष्वद कककककावरद, ऽप क्काषुकीष्कष्वष
4--4) (४ ए1886 768६ 28 प2वण(6 १४०३ 16 पि€भण.
।
- 28४] (दतीं प्रकरणं 95
विना गमनेन पदा तैवोपपग्यते " तदा गम्यमानं गम्यत इति परपु वाकाय नास्ती- त्यभिप्रायः 1 गम्यमानमित्येतावन्मात्रमेव संभवति दितीयक्रियाभावात् न तु गम्यत इति ॥ | श्रथ गम्यत इत्यत्रैव गमिक्रियापेबन्य इष्यते । एवं सति गम्यमानव्यपदेशे नास्ति क्रियातेबनध इति न परर्णतौ वाकार्धसयेत्याक् । ¢ गम्यमानस्य गमनं यत्य तस्य प्रप्यते । ते गतर्गम्यमानं गम्यमानं रि गम्यते ॥ 8
यत्य वादिनो गम्य[छभुमानस्य गमनमिति पलः , गम्यमान संन्ञामूते गमिक्रि धाशूनये यो गमिक्रियामाधेयमभूतामिच्डति ' तस्य पत्त इते गतेर्गम्यमानमिति प्रस्यते ' गतिर र्ति गमनं स्यात् । यत्मादृस्य गम्यमानं रि गम्यते । रि शब्दो यस्मा । स्माद 10 गतिर् ितमेव गम्यमानं सत्तस्य वादिनो गम्यते \ गम्यत इत्यत्र क्रपोपयोगात् । तस्मा- दरतिर् रितं गम्यमानं प्रतन्यते ॥ शरघोभयत्रापि क्रियासंबन्ध इष्यते गम्यमाने गम्यत इत्यन्न च । एवमपि गम्यमानस्य गमने प्रसक्तं गमनदयं । येन तद्गम्यमानं च यच्चात्र गमने पुनः॥ ष् 15
1) 24० € क 0४०8 8९1६४11 ४ ४; 0 16 8608, रणोः ऊक छन्न, ०००.
9 गुरव, र्वीसमपत्य सर्वेष] रेपः पमन रिवुभमुपर्| केयम् ते ग स्य कर षड
9) ७6, भवार, - ग10. मेरठ = युप] (= १2००-०.) रमा ९७- भते ४ कापु पििभ८; ०५५ 1९768९16 16 8९ ~+ -- कवशद == ०-९९8-79.
¶ प्लस सप छदुमते| तु पृषु थ चुने गुने र वमु प भेष कंप गर धम|
96 ॑ ६ गतागतपरोत्ता नाम ` 1 [8४-
येन गमनेन योगाद्गम्यमानव्यपदेशं प्रतिलभतेऽध्वा तदेकं गमने । तत्र गम्यमाने- ऽधिकषएणमूते दितोयं गमनं यैन सोश्धा गम्यते । एतद्रमनदयं गम्यमानस्य गमने प्ति प्रसक्त ॥ |
भवतु गमनदयं ' [7\0. 97*] को दोष इति चेत् । श्रयं दोषो ' यस्मात् "
¢ दौ गत्तारी प्रपव्येते प्रसक्ते गमने । किंपनः कारणं गततदयप्रसध इत्यार् । ` गत्तारं हि तिरस्कृत्य गमनं नोपपग्यते ॥ ६
पल्मादृबश्य क्रया स्वप्ताघनमपत्तत.कम कतार बा । गामाक्रया चेवं कतयवत्थि-
ताश्तो गत्तारमपेनतते । नास्ति चैकस्मिन्नेव गच्छति देवदत्त दितीपः कर्तेति । घतः कर्तृह 10 यामावात्नाप्ति गमनदये । ततश्च गम्यमानं गम्यत इति नोपपग्बते ॥ |
घथ स्यात् ' पटायं देवदत्तः स्थितः ष नानु] भाषते [ननु] पश्यति \ नान्] तदेको
ऽनेकक्रियो दृष्टः । एवमेकत्मिन् गत्तरि क्रियादय भविष्यति । इति [४8४] ॥
नेवं । शक्तिं काएको न इव्यं \ क्रियमिराच्च तत्साधनप्यापि शक्तेः सिदध एव ` मद ॥ न हि स्थितिक्रियया वक्ता स्यात् ॥ दरव्यमेकमिति चेत् । भवत्वेवं ' न तु व्यं
2) पवुपुपतिः गुमिरयुन्पपनि" कमस देः ववा वणावाधि९ वणथ
20/८2 ९. - ५ = @कका८, ५ ७-१७४६8६०४०३ 97. +, 99.11
) नगु" गुक् सुः स च्यु] नर्गुषतः पट पास डु ्छुर| ` | ४६ ॐ नव ०१०५ न | = निषुम् पन, भेन्युप्यैन | 1 शिण 1176 20 - `
20 %१९व-2 0" १४
8-3) ५४९ 0017986 ४०१०९ १४०8 18 रशशणा ध ०61४1०6 पृषं 1४: ध्व्वन्धम द्रम. ... . ~ 2088, , . , ऽद 5 शव छादन छव चव व्ववद्क०, ...
-28४] दितीयं प्रकरणं | , ^ 4, कारकः ' किं तर शक्तिः " सा च भिग्यत एव । शपि च पदशक्रियादयकारकत्वं नकर शिकस्य दष्टे , तो नेकप्यं गतर्भमनदयं ॥ शरत्राङ । ग्यप्येवं तथापि गत्तरि देवदत्ते गमनमुपलभ्यते देवदत्तो गच्छतीति व्य- पदेशात् ' ततश्च विग्यत एव गमने गमना्रयगत्तषद्ावात् ॥ उच्यते । स्यादेवं पदि गम- नाग्रयो गत्ता त्यात् ' {न तस्ति] । कथमित्याक् (7. 97 ४ $, गत्तारं चेत्तिस्कत्य गमनं नोपपच्ते। | गमनेऽ्तति गत्ताथ कुत एव भविष्यति ७
गन्ता्मत्तरेण निराश्रयं गमनमसदित्युक्तं " तत गन्तारं चेत्तिएस्कृत्य प्रत्या- व्याय गमनं नास्ति शरति गमने कृतो निर्देतको गतता । रतो नास्ति गमनं ॥ |
तरार । विग्यत एव गमनं तदतस्तेन व्यपदेशात् । इ गत्ता गमनेन युक्तः. त्चो- 10 | गाच्च गच्छति । पदि गमनं. न स्याद्रमनवतो दृवत्तस्य गच्छतीति व्यपदेशो न स्यात् ' दण्डाभावे र्पिडव्यपदेशाभाववत् ॥ उच्यते । स्याद्रमनं पटि _गच्छतीत्येवं व्यपदेश स्यात् । पस्मात् '
गत्ता न गच्छति तावद्गत्ता नेव गच्छति । . रन्यो गततुरगततु्च कप्तृतीयो रि गच्डति॥८ ` ` 16
1) 088. दकाप; 7818 0008 ४१००8, तभाा€ 70198 0४प, यमपे
2) कक, ८०६ ००००४०. ~ यासे सुसमाेष् प स्थ 15 16७ वण
, १९०४९ (05 == कद्यद).
भरेम भे
4) गगन रेगुर्य भेर दयुम] न्नुष रवर पम मेव्युमे| सनष भेम रवृ पत| एस्पषेर्म्' गुनि रयु || |
9. रढ्गु न्नुः म नु र | श्गप्वमेम् रिलुष मेम् | कले ध्वे विम गु] गूसुमय गुरकेग न षुर |
98 | गतागतपरौता माम [280--
इक गच्छतीति गत्ता \ स तावत्न गच्छति ' यथा च न गच्ति तथोत्तरेण श्रोका- येण प्रतिपादयिष्यति ॥ श्रगत्तापि न गच्छति । श्रगत्ता दि नाम पो गमिक्रिपारदितः। गच्छतीति च गमिक्रियायोगप्रवृत्तः शब्द् । यव्य[9भुसावग॑त्ता कथे गच्छति ' श्रथ गच्छति नासावगत्तेति ॥ तडइ़भयव्यतिरिक्तो गच्छतीति चेतरैवं ' को दि नाम गततुरगतत-
5 विनिमुक्तस्तृतोयोऽस्ति यो गच्छतीति कल्प्येत । तस्मान्नास्ति गमने ॥ त्राह । नागत्ता गच्छति नाप्युपरयरर्ठितः [79.98०] ' किं तर्द गत्व गच्छ्
` तीति ॥ एतदप्यसत्। किं कार्ण । यस्मात् ' गत्ता तावदरच्छुतीति कथमेवोपपतस्यते ।
(स नैत) . _ ~ (1) गमनेन विना गत्ता यदा नेवोपपग्यते ॥ ९
10 गत्ता गच्छ्नीत्यत्र वाक्य एकैव गमिक्रिया तया च गच्छतीति व्यपदिश्यते । गत्तेति तु व्यपदेशे नास्ति हितीया गमिक्रियेति । गमनेन विना गत्ताशगच्छून् गत्तेति यदा न संभवति तद् गत्ता गच्छतीति न पुथ्यते । कामं गच्छतीत्यस्तु ' गत्तेति त न संभ- वतीति तदयुक्तं ॥
श्रथ गतियोगात्सगतिक एव गत्ता ॥ तथापि दितीयगमिक्रियाभावाद्च्छतीति 16 व्यपदेशो न स्यादित्या द । पत्तो गत्ता गच्छतीति पस्य तत्य प्रस्यते ।
९ (9) गमनेन विना गत्ता गतुर्गमनमिच्छतः॥ ९०
0 गुदे सुप मेषपमडे| नुः नविपपन मन्युम ठ्| रेणु ॥
ॐ) यन्नो कुषृषण' रनवे ` रिगु देष (लु मेप पति | नर्मरपि पम् पम सयप्यु्मे| ननु शङ भदस" |
-29४] दितीयं प्रकरणं 99 वादिनो गमिक्रियायोगदेव त्तानि (1) त्य वाद्नो गमिक्रियायोगादेव गन्तेति पत्तः ' तप्य गत्तुगमनमिच्छ्तः सगमन]- गत्तव्यपदेशाद्रमनेन [न = क हितीपगमि [न् { ) नि गत्तव्यपदेशाद्रमनेन विना गत्ता गच्छतोति स्यात् " क्रियाभावात्। चतो गत्ता ~ (३ गच्छुतीत्येतस्यर्वि "व प (९ ~ 3) गच्छ्ताति न युज्यते । ठ गत्तेतिशब्दो गमनेन विना गत्तेत्यत्र वाक्ये ॥ खधोभयत्रापि गतियोग इष्यते गत्ता गच्छतीति । एवमपि ' गमने दे प्रस्येते गत्ता पम्युत गच्छति । 6
तान न = (4) गत्तेति चोच्यते येन गत्ता सन्यचच गच्छति ॥ ९९
येन गमनेन (79. 88] योगाद्रतेतयुच्यते व्यपदिश्यते तरेकं गमनं । गत्ता भवन् यच्च गच्छति यां [२४] च गतिक्रिां करोति ' तदेतद्रमनदयं प्रसक्तं \ परतो गत्तदयप्रङ्ग इति पुर्ववदुषणं वक्तव्यं । तस्मान्नास्ति गच्छतीति व्यपदेशः ॥
घतनार् । यब्यप्येवं तथापि देवदत्तो गच्छ्तोति व्यपदेशद्रावाद्मनमस्तीति ॥ 10 नेवं । यस्मादेवदत्ताभ्येवेषिव चिन्ता किमतो गत्ता सन् गच्छति उततोऽगत्ता गच्छति तर तिरिक्तो वेति सवधा च नोपपग्येत इति यत्किं चिरेतत् ॥
धन्राक्। विग्यत एव गमनं तदारम्भसदरावात् "इ टवदततः ।स्यत्युपमदेन गमन-
1) रिषम. पटस्य ननुःषपन्परुसपस य व
2) (४०४. ५40 0 ‰१#2 वन्नं १५ ४१८४०१९, वकवम क १८ ४४०१८. १०८८१८- न वभु... . 2918, 6916. 40 वषभ १५ ‰,१४५६९.
8) ©९७४.-४-0176; १8४०8 1» 2077886 व्कमाभ्ा१ा१द पष्ठ 41962, 16 9६ व्र्म्द 8 16 8608 06 €6 70४ ०८५५४ (6 19 0079486 वकद वव्ल्वकक). = `
५ गुरने न्वं नतं युय्] ` क्वुष गिमसुः कयन्युनते| गुर ` १[म] सुद् महमृप व<! न्नुियुनमेस गुरः समुत् ||
ए) ४७७. ०मुगभूण क्णण् कठ = मुमुदुः रिद
100 गतागतपरोक्ता नाम (29१४
^ ~(1) ~~ म व स्वादनं मार्भते । न चाविग्चमानकूर्महोमेप्रवारारिकमारमते ॥ उच्यते । स्यादरमनं पदि तदाएम्भ एव स्याग्य्मात् ' गते नारभ्यते गन्तु गततं नारभ्यतेऽगते ।
॥: +^ च नायत गम्यमान गत्तुमाट्यत कृष्ट ॥ ९२
5 पदि गमनारृम्भो भवेत्तदरति वाध्वन्यार्भ्येत " [श्रगते वा] ' गम्यमाने वा ॥ तत्र गते गमनं नायते ' तदि नामोपर्तगमिक्रियं । पदि तन्न गमनमारभ्येत तदरतमित्येवं न स्याटूतीतवर्तमानयोर्विरोधात् ॥ गतेऽपि गमन नारभ्यते ऽनागतवर्तमानयोविंरोधात् ॥ नापि गम्यमान तद्भावात् क्रियादयप्रसङ्गात् [79.99०] कर्तदयप्रसङ्गाच्च ॥ तदेवं सवेत् गमनाएम्भमपष्यत्राक् ' गतुमारभ्यते केति ॥
10 यथा च गमने न संभवति तथा प्रतिपादयन्नाह । न पूर्वी भमनारम्माद्म्यमाने न वा गतं।
(न प् + (4) यत्नायेत गमनमगते गमनं कतः ॥ ९३
इ देवदत्तो यदावस्थित श्राप्ते घ तदा गमन नारभते । तस्य गमनारम्भत्य्व न गम्यमानमध्वनातमस्ति न च गतं यत्न गमनमारभ्येत । तस्मादतगम्यमानाभावदेन-
~~ < *ल+ न ५) = सुद शुः छयमयमपनिः कस, ~ प, शाण ४०) एषषका४० - 270९ क == *स0116068 26४६ (?. क) = 8 णृ ० ०ण॑लह्खष क्छ पशा ग दनत्णि -- 766 6०879180 ए, 8प वकण; उ. 2, इ णा. 25 (गथ्णा€ छदश्वकण्कृद). प्रभः
818४0818 फ 81८07 ४2182100 287 ४१४.) 1. 475, १, 240; 9. 1488, ए, 624; ए ००११४ ४४१९११९0 472, }. 726 ((०णणप्णंवण€ एष 10. 6. 4. उ ४९६०४)
9 सरवि न्तु पनि हम" मेपुमे| म सप'व ०८. र्वु म" मेद् | पुम पदुम प्ररमेमम्| गुरु" ननुपः हमयर
8) 1088. व26॥4 वकवत कष) क
9 ननुपः दुम जयम्] गुरु, निन ईम्दयुरय| पमप भेुरु> सनयः मेप्| मर र्वः पु एत् |
-ॐ9५] दितीयं प्रकरणं 101
योनं गमनार्म्भः ॥ चथ स्याग्बग्चपि [90९] गमनारृम्ात्पूर्वे न गते न गम्यमानं तथाप्य- मतमस्ति ` तन्न गमनाटम्भः स्यादिति ॥ उच्यते । गते गमनं कृतः। घ्नुपन्नातगमिक्रि- पमनाृन्धगमिक्रि्रमगतं । तत्र गमनार्म्भ इत्यसंबदमेतदित्याङ गते गमनं कृत इति ॥ | ॥
वर्पि गतागतगम्यमानेषु गमनाहम्भो नास्ति ' गतागतगम्यमानानि तु सत्ति । न चासति गमने एतानि व्यत्त इति ॥ उच्यते । प्याद्रमनं प्चेतान्येव स्युः! सति दि गमि- क्रियाप्राहममे यत्रोपरता गमिक्रिया तदरतमिति परिकल्य्येत , पज वर्तमाना तद्रम्यमानं, यत्नात्नाता तद्गतमिति । यदा तु गमिक्रियाप्राएम्भ एव नास्ति तदा
गतं किं गम्यमानं (79. 89४] किमगतं किं विकल्प्यते ।
शृष्टयमान श्राएम्मे गमनस्यैव सर्वधा ।। ९8 10 प्रारम्मेऽनुपलम्यम्राने किं मिष्याध्वत्रयं परिकल्य्यते ' कुतो वा तद्यपदेशकारणं ` गमनमित्ययुक्तमेतत् ॥
त्राह । विश्चत एव गमनं तत्प्रतिपक्ञसद्वावात् । यत्य च प्रतिपत्नोऽत्ति तद्- स्ति ' श्रालोकान्धकावत् पारावाएवत् सेशयनिश्चयवन्च । श्रप्ति च गमनस्य प्रतिपत्तः स्ानमिति ॥ उच्यते । स्याद्रमनं यदि तत्प्रतिपक्तः स्थान स्यात् । कथमिरेदं स्यानं 15.
गततुरगततुस्तदन्यस्य वा परिकल्प्येत , पर्वधा च न युव्यत इत्या् । गत्ता न तिष्ठति तावद्गत्ता नेव तिष्ठति ।
घन्यो गत्तुरगतुश कस्तृतीयोऽथ तिष्ठति ‰। ९५
1 नुम दुमपषमसर२/२्| डः [| मेषु करर प्पठ ठ्| न्प से केण कमिप से] मक्त उवे कंमपन्ष्|
9 रकेषु रके भे समे | भनु पर्वेमे् सुर नवुरतिः न्बुर्ये मेम गुम गमय गुर् दूर पमु ||
108 गतागतपरोत्ता नाम [80 »-
यथा गत्ता न तिष्ठति तथोत्तरेण श्नोकेनाष्यास्यति॥ श्रगत्तापि न तिष्ठति'त ङि तिष्ठत्येव ' तस्य किमपर्या स्थित्या प्रयोजनं । एकया स्थित्यागत्ता श्रपर्पा तिष्ठती. ति स्थितिदयप्रसद्गात् स्थातृद [४0४]यप्रसङग इति पूर्ववदोषः ॥ गन्नगत्तरर्तिथान्यो ` नप्ति॥ | 8 शत्रा] नागत्ता तिष्ठति ' नापि गत्तुरगत्ुथान्यः ' किं तर्द गतव तिष्ठती- ति ॥ नेवं ' पस्मात्। | गत्ता तावत्तिष्टतीति कथमेवोपपत्स्यते । [7)9. ५००}
नेघोप्र्यति (1)
गमनेन. विना गत्ता यदा नेवोपपग्चते ॥ ९६
दायं तिष्ठतीत्युच्यते तदा स्थितिविोधि गमन[म]स्य नास्ति \ विना च गमनं 10 गत्तव्यपदेशो नास्ति । ्रतो गत्ता तिष्ठतीति नोपपग्बते ॥ तरार । वित एव गमनं [तानिवृत्तिसद्वावात् । इक गतेर्निवर्तमानः त्थितिमा- ` एभते । गमनाभावि तु न तेतो निवर्तेत ॥ उच्यते । स्याद्रमनं पट तन्निवृत्तिरेव स्यात् । [न तस्ति] यस्मात् । ' | न तिति गम्यमाना गतान्नागताट्पि।
18 तन्न गत्ता गताट्ध्वनो [न] निवर्तति गत्यभावात श्रगताटपि गत्यभावदिव । गम्यमानाद्पि न निवतंते तदनुपलब्धेर्गमिक्रियाभावाच्च । तप्मात्न गतिनिवृत्तिः॥
४ बुरॐ पलु वमेषुपर 8| सवत पुपर, मेष्ुर द| येवगु नये सपय वेष | हेव नवपुयकेर मुर | 2) मेभेभेमं ए९6प४-6४6 ४ *008-078 ४०४ १९ 6४४77 १४08 16 ६6०४९ (८४४७ णि
ए्रा6 पपं ४४ ०6 89.
8) 1.9 1९6धप76 १ तेद 68४ प6ा6०४९€ एष 16 पककण 100-200 पणं त्म7९8- 0४ 3 79४16 १6 ००6 (०पाणाछछ+क 6. 1 68४ तार्िना6 वणषण्वण6 19 ०68० (षव १0८१११८ वकाुवदद); 7278 19 87 ०४४२९ ९8 ह इ 7118 ०९ 1*6४1&€ 795 10706 66०. -- # भए ५६-१८७७०४३ 2. 104, 8. 15.
-81*] दितीयं प्रकरणं 103
रतरा । यदि गमनप्रतिदन्दिस्थित्यभावाद्रतिरूसती ' एवं तर्द गमनप्रतिद्ये स्थितिं साधयामस्तत्सिढो गमनसिदधिः । तस्मादिग्यत एव स्थानं प्रतिदन्दिसद्ावात् ' स्थिते प्रतिदन्दि गमनं ' तटृप्ति * ततश्च स्थितिरपि प्रतिदन्दिसद्रावात् ॥ एतद्- प्युक्तं * यस्मात । | ५ [गमनं] मं प्रावत्ति्च निवृत्ति गतेः समा ९७
रत्र दि यद्रमनं स्थितितिद्धये वर्पितं तद्रत्या समं गतिहषणेन तुल्यमित्यर्थः । यथा गत्ता न तिष्ठति तावदित्यादिना गतिप्रमिद्ये स्थितर्हतुत्वेनोपात्ताया [79.40४] दरषषमक्तं , एवमिकापि स्थितिप्रिद्धये गमनस्य]. केतुत्वेनोपात्तास्य) स्थता न गच्छ् ति तावदित्यादिना प्नोकदयपाढपरिवर्तन ट्ष वक्त[9।भूव्यमिति नास्ति गमनं , तद्- भावात्प्रतिदन्दिनी स्थिंतिटपीति ॥एवं तावद्रमने गत्या तुल्ये प्रत्या्येयं ॥ श्रय स्यात् ' विग्चत एव स्थाने तदारम्भमदावा् । ङ्क गत्युप्भर्दन स्थानमा- एते " कथं तत्र स्यात् ॥ उच्यते । सत्ति गतेः तमा वाच्या । तत्र यया पर्व गते नारभ्यते गततमित्यािना गमनारम्मो निषिद्धः , एवमिकापि ' स्थिते नारभ्यते स्यात् स्थातुं नाटभ्यतेऽपस्थते । नारभ्यते स्थोपमाने स्यातुमाएभ्यते कुक ॥
४ रुम दगु भेशुने| सन गुर मस र मेम् रबुपः # मे नङ्गृम म> हगृम > े नगु मन मद्ुरस |
2) 8०४४11१६; ०. 286. 0160४ 061९४,
8) ९९७४-2 त77€: 57४ क(क =+ व्वन्थफव कण्व चरकीं क्वण द्वन्ततेष्यः, कष्छुचके शद्धा" 0574४ व 45 {1140 11704 वन्यया ; 572 चठन्यदे ववन्नेव द्रकेका €20- ००८७४८१९, 51112114 (?) ०५१५2 517 दढ &८वद १४० व् व्व.
4) == अकवा, २० भं -046880४8 2, 104. 1.
8) 1. 13.
6) © 8४, 60706 ९6पड पणं शपार्€ण४ (@. 104. 8 ९४6६.), 298 एण्ड पण्ड श्श्ण वण ००8 &१08 768६1४४८€8 08208 ४०९ 0{€ [766606० ४6, ०९ 6०४6 क्क 168 बकच ५९1९४
१४९ 1४ श्धाशं०० भफिकक्षण€ तप 1879 20) 808}8 € 16 न्भगण ००छड 168 जण ५०१०४४९. न
-104 ` मतागतपरौक्ञा नाम 0 [भन इत्यादिनि श्नोकन्नयपरिवर्तिन स्थानसंप्रवत्तिएपि गतेः समा ॥ स्थाननिवत्तिपि गतिनिवृत््या समा प्रत्याष्येया । यधा गतिनिषेधे " | न तिष्ठति गम्यमानात्र गतात्रागताद्पि.' `` इति गतेद्रषणमक्तं ' एवं 1स्यतिनिषेधेऽपि ' । ज, ` ` न गच्छति स्थीयमानांन स्थितान्ास्थितादपि। ` इति गत्या तुत््यं (1४. 419] टू षणमिति नास्ति स्थितिः । तद्भावात्कृतो गति प्रतिपत्तस्थितिषद्वाववादिनां गतेः तिदिरिति ॥ ` ` श्रपि च घटि गमनं स्याद्रत्तव्यतिरैकेण वा स्याटृव्यतिरेकेण वा । सर्वधा च वि चार्यमा न सेभवतीत्याद । ¦ 10 टेव गमनं गत्ता स एवेति न पुत्यते। ` ्रन्य एव युनर्गत्ता गतेरिति न पुव्यते ॥ ९८
कयं पुननं युव्यत इत्या । पदेव गमनं गत्ता प एव रि भवेष्वटि। एकीभावः प्रपव्येत करतुः कर्मण एव च ॥९१
18 येवं गमिक्रिया प्रा पदि गत्तरव्यतिरिक्ता नान्य। स्यात् ' तदा कर्तुः क्रियाया. कत्वं त्यात् , ततेव क्रियायं वर्तिति विशेषो न स्यात्। न च ्िदिक्रियायण्डतुचै- ` कत्वं । रतो यदेव गमनं स व गततेति न युश्यते ॥
1) 1.6 धवण्णरपा प्द्भय 9 19 शक मावर = दिगण भे नयु भ रुष दै कुर नरष] रेषे ठेस यर उ मे उर |/ क्ष मुर मे न्बुष्| गुदे उष ठ उ मे र| 9 गुमट न्व गुर पमुप| मेकम् सवतं भमृप्युगस| येषु तारिप पता
4) 88. 6१०, कन्व. -- 095४०. 7. 8: व्व वश्मकात्रमाव€.
-81१] ` दितोयं प्रकरणं ` 105 ` ्न्यत्वमपि गत्तगमनयोर्यधा नास्ति तथा प्रतिषाद्यन्नार् । | अरन्य एव पुनर्गत्ता गतेर्वदि विकल्प्यते ।
गमनं स्यादते गततर्गत्त स्याद्मनाटृते ॥ २०.
पदि कि गततगमन[91 णुपोएन्यत्वं स्यात् ' तदा गमननिररेतत गत्ता स्यात् \ गत्त- निशपेत्ं च गमनं गृद्धेत पृथक्िसिदं घटादिव पटः । न च गन्तुः पृथकिसदे गमनं गृ्त 5 इतति । श्न्य एव पुनगत्ता गतिरिति न युब्यत इति प्रताधितमेतत ॥ तदेवं । | ट्कोभाविन (79. 410] वा पिद्िनीनामावेन वा पयोः। न विग्यते तयोः सिद्धिः कये नु लु विग्यते ॥ २९
ययोर्गत्तगमनयोयथोदितेन न्यायेन एकोभावेन वा नानाभावेन वा नास्ति सिदिः' तयोरिदानीं केनान्येन प्रकरेण मिदरृस्तु । श्रत घ्रा" तयोः सिद्धिः कय नु ललु विग्यत 10 इति। नास्ति गत्तेगमनयोः-सिदिरित्यमिप्रायः॥ तरार । इक् देवदत्तो गत्ता मच्छ्तीति लोकप्रतिद , तत्र यथा वक्ता वाचं भाषते करता क्रियां करोतीति प्रिद ' एवं यवा गत्या गततेत्यभिव्यत्यते तां गच्छतीति = पथोक्तदोषः ॥ तदप्यसत् । प्मात् । गत्या पयोच्यते गत्ता गतिं तां घ् न गच्छति । 18
1) ॥ >) ५ पर मुष | ॥ 01 इम पगृ (1 मेदुर सतुष मूर [- ने्तुपमेदुपतेः भुम ऋजुः || ^ 1 04, पत्युन्पय पसुमेम्| देप, गुणप श्रम ए || ५८५ ०.१९७७०७ ए, 64. 6
106 4. प्रत्ययपरोक्ता नाम [81४- `
` ` पया गत्यां देवदत्तो गत्तेत्यभिव्यव्यते " स गत्ता संस्तां (तावत्र गच्छति न प्रा प्रोति पदि वा न करोतीत्यर्धः। ` ` ् यस्मान्न गतियूवीऽस्ति। . गतेः पू गतिूर्वः । यटि गतता गतेः पुर्व तिद स्यात् ' त तां गच्देत् । कथै । 8 यस्मात्, |
“कथित् किं विदि गच्ुरति"॥ २२ `
कशिदेवरृत्तः -किं दिटर्घा्तरभूतं यामं नगरं वा गच्छतीति दृष्टे । न चेवं पया ग्तेत्युच्यते तस्याः पव मिद्रपो गतिनिरेपेननो मत्ता नामास्ति यस्तां गच्डत् ॥ शध मन्यते यया गत्या गत्तेत्यमित्यब्यते तामेवरासी न गच्छति , किं तरदं ततो 10 ऽन्यां गतिमिति ॥ एतदय्यपश्वस्मात्' गत्या योच्यते गत्ता [1९.49 °] ततोऽन्यां [९५] स न गच्छति । ` गती दे नोषपेते यस्मि प्रगच्छति ३ `
0 रेभे तवुषमः ए मे ~ 1९ धरवण्लरणय पणलाणण 91४: , णु |
ढक 9१ वल्लक ऋत उकम. `
9 देः वेर नगृ व्युन्दगृनु | दश्री दय्| कुरगैडर| गुरैषु
रु व्च
8) 140? "8788 168 88.
` 4 द्व ॥ मतु कर मठ्] सुपः दे ४ नुः मै पुर.
> पलः परि" नरभ भेद्| गुर वगु गुर २" ननु पनु | 8) स्तुव" गुमगृषः प्ल वर मञ्] देस" क्म् य' ये, म मेऽ गुर यर न्क पासन, यु"च| न्वः पाडस' सुभः |
- 329] दितोयं प्रकरणं 107
पया गत्या गत्तामिव्यन्यते ततोऽन्यामपि सर गत्ता सन्न गच्छति ' गतिदयप्र्- ङ्गात् यया गत्या गत्ताभिव्यत्यते गत्ता सन् पां चापरां गध्छतीत्येतद्रतिदयं प्रसक्तं । न चेकस्मिन् गत्तरि गतिदयमित्ययुक्तमेतत् । एतेन वक्ता वाचं भाषते कर्ता क्रियां को तीति प्रत्युक्तं ॥
तदेवं । ¦ 5
सद्रूलो गमनं गत्ता त्रिप्रकारं न गच्छति ।
श 9 ~ + ~ {२} नासदरूतोऽपि गमनं निप्रकार् स गच्छति ॥ २8
गमने [सद्]सद्रूतः चिप्रकार् न गच्छति ।
तन्न गम्यत इति गमनमिरोच्यते । तत्र सदरूतो गत्ता पा गामक्रिापुक्तः । घ्रत- दरूतो गत्ता यो गमिक्रियार तिः । सदमदूो प उभयपततीयद्रपः। एवं गमनमपि त्रिप्र- 10 कां गमिक्रियातेन्धेन वेदितव्ये ॥ तत्र दरूतो गत्ता सदरूतमपद्रूतं द्द्ूतं निप्रकार् गमनं न गच्छति । एतच्च कर्मकारकपरीक्ताधामाष्यात्यति । एवमपद्रूो $पि गत्ता जिघ्र कारं गमनं न गच्छति ' सदृसद्रूलोऽपोति तत्रैव प्रतिपाद् पिष्यति । यतथेवं गत्तगत्तव्य- गमनानि विचायमाणानि न सत्ति ' तस्माद्रतिश्च गत्ता च गत्तव्यं च न [10.५५०] वियते ॥ २५ 15
1) एष्यो8, 0916. कचकुषव ; ण), वुचषदको, गू. दसतरपप्रसद 9 स्वृ प्रमनस्युनपय| त्वुं मणम र् भे क्प्| नप्प पन्य दे ५८ | सुं दुमगसुन र रमे ` ॐ) ४०. कव्यम्. 4) कभक५९ पा.
5) पमुरन्णयेमयुनय ५५८. | ९¶ स्मगृसम्" नु भेदम, | देथ वं गुर तुं सुर] पिपम प्म
,
10
108 . . ` ` ~ प्रत्यपमरीज्नानम. (३९० = यधोक्तमार्त्तियमतिनिर्ृशप्तरे ! घरगतिरिति भदत्त शारदतीयत्र संकर्षणपद्मेतत् । गतिरिति भदत्त शाषदतीपुत्र निष्कर्षणपद्मेतत् । पत्र न तेकर्षणपद न निष्कर्षपपद् तदायाणां पटमपद्योगेन श्रनागतिर्गतिश्चायाणां गतिरिति ॥ यदि बीनमेवाङकरे पंकरमति बी्मेव तत्स्यान्न पद्रः शाश्रतदोषप्रसङ्ग । प्रथाङ्करोऽन्यत श्रागच्छति [४८१ ' श्रहेतुकदोषप्रतङ्गः प्यात्र चकेतुकस्योत्पत्तिः खर् विषाणस्येव ॥ प्रत टवाद भगवान् । नीननस्य पले धाङ्कृरो न चयो नोन प चेव धङ्कएो । न च श्नन्यु ततो न चैव तदेवमनच्देद् श्रशाश्रत धमता ॥ इति म्॒रात्प्रतिमदर दृश्यते मुद्रतंक्रात्ति न चोपलभ्यते । न च तन्न नु चैव पतान्यतो एवं संस्कार् ऽनद्घ्दणाश्नताः ॥ इति [च]
तधा। ( श्रादृशपष्ठे तथ तैलपात्रे निरीत्तते नारिमिषंमलकतं ९
ह पति मर इः 16 गवना, एणा @1४888. 278. 4 € 8०668
6५668 2. 11, ४. 6
2) १९ ©008€7१€ 18४ 166ौप्€ १68 2788. (00166 एषा 8. ए $ ०४. 228. 16. 16 € ए०१४५. 7. ४१1. 9 क्कण्ाज ९ ष्का उवव्ापााद्छां 1.1.114. 12.
, ध्वमः दव्छवक्थछवमदल्ला९कण कद्वव, ~ इण 18 शव्द) १०77 16 तिष्टण्छणा ७8 11-
88.70 08.878. 66 क; ^ 8. 1902, 1, ॥. 272 ०. 2, भ-068808 2. 25 ०. 3. 1.6 ००. 80 कष्य ९8४ 6771076 १४०३ 14 ॥ २. (1. 449) एणा एकव पटाः 16 0988886 00०6 एद्ाभं 2 006 प्र्ः€
8) = 1४11६४४१. 210. 4--5; र्णा ५-0688प8 2. 26, ०. 4
4) = 1, 811४१. 210. 8-9; 6४६ ८०016. ६. 842. 8 &४ &118 858. 2929. 8 १०४ 108 80०7४008 18 ]€तप्ा6 . ९४ [पला 640 प्प वण€ @ पण तकभा 0768; अकद्ाण (११५८० ८वव्दक्दरव्प॑द्य . &प 16 06 अक्क / कलव ` बब्ण्णद्). -- ०११40 ९०768000 (1 11/11 ॥ (== ०१४०४१०) यि = ६40. 00 ०27067401८ 18 काद्र
प ४8 16 ९४66४, 0 १8०४ ['लणाधा१९.
8) ९8 १९४०२ 8180668 (6४६९8 (भ). इ श्ाा, नद १9.) 800४ 62 ४१५९8 ११ 88 - 01172} 8, 2. 29. ५-9 १€ 16० € 1४ 8. ¶. 8.
6) श्क्षा व्यद, 16लप् 6०166४6, 16 # 68४ व०पाह शलनं (वस्व 0270788 140910816 तप्र 7600णफालणलण४ १6 #% € 889861४ भ768 १०१९ 0िठे€ € वभश्म १०१५1 (0०86१४४0 १९ 1४, ६९7०)
-32४] ` दितीवं प्रकरणं 109 सो तत्र रागं नयित्व तो प्रधावितो कामि गवेषनाणो ॥ मुलस्य संकरात्ति यदौ न विग्ते विम्बे मुख नेव कदाचि लभ्यते । मो "पथा सो जनयेत गं तथोपमान् तानथ सवधरमान् ॥ इति । तथार्वतमाधिएनिमूतर ऽपि]! तङि कालि सो दशबलो [खानघो 8 बिनु भाषते शु समाधिं । मुपिनोपमा भवती सकला न रिक्थं त्रायति न चो मियते ॥ |
न च सलु लभ्यति न बबु नो )-~ धर्म“ केनकट्लीपटशाः (7१0. 4३१] । ॥ मायोपमा गगनविष्युतमा
रकचन्द्रसेनिम मरीचिपाः ॥
1) 1.68 2088. 201€०४ एव्म. 2) मु == {410 8) द्सपनमगा " " " == शद्द्द ककी व 19/96 +.
4) ८९ 10वा6्प्रणा 68६ णप्पण6 97 16 भभव; ०911168 1९8 81820668 पपं 8४1१९0६ 800६ 1676६668 &० €0पा8 १० ४6 (6090. [ड इ दा, इश वद ४.) 6४ 1४ 80 प८९ ९8६ 4०६1१००8 ००066.
5) एश ०1९; एब०; ०४8 ग् 9. महग 6) 1488. 21०4०; 7४88 ग. सुपु रिनुप ~ भ्ण ०१७७६ 2४5 ४५६०।६
7) दुनि == 04१५. 8) 2188. €, ४०, ८०. 9) 2088. ४१४९४, क, ककत, कोम.
10) बद्दः == ५वद्द्व, गभो (भववद्, (०), (0) (2), 61४8 8. 57. 9, 204. 19, 329. 18; 210१. 1, 468. +.
10
110 प्रत्यपपयोक्ला नाम ` [1 न च रस्मि लोकि मृतु कश्चि नो परलोक संक्रमति गच्छति वा 1 न च कर्मं नश्यति करा चि कृतं
फल रेनि कष्णशम मंप्र्तो ॥
~~ _ (3). न च शाश्चतं न च उदर् पने
न च कमपेचवु न चापि स्थितिः न, 4 (4) ( “ चचसरोपिकृब्र पुनरास्पृशति (5) (काक । न च न्यु कृत पुन वेदयते ॥
न च संक्रमो न च पुनागमन न च सर्वमस्ति न च नास्ति पुनः। न (6) = 4 (7) न च दृ्टिस्थानगतिशदिरि र (8) _ . ~ न च सब चार्सुपशात्तगति ॥
1) = फकः वववन्, -- कड, न्वता, आनतथण) 79. चन" वु सम == ॥\८4५४६७९/ त
2) ९५१५0 (= "40401} 0१९8४ 88 ५ &0४।४ 08०8 16 ५।०६।६४।१.
$) = द सपास' |
4) द-3£. = 16601 णका पाणा (8९) ४11०६)
ॐ) 088. ०१/५८ ०५, ॥ ८/4. -- [€ ५०९1३ ३ अस , (पववद (0००0०86 2 ॑
युस स्ः 06 1४ 118१९ 0?९८९0००१९) 6) 4} 51/21 ¶) 2188 ४/2, ५५ = नस ठ्
8) ४७. ८० - 78 सेसु पुयुपुय "पक रहय मे | = १५
अका {040104१ ( १04८4. -- १४२१ (4)201६8 7 ०५०३७५४) = व्ध्कच्य, ५००४९ 0४ 168 1614५७8 0००0७ ९१८।५६}€ा६ 8 ८2 = ए66ए९९॥ प्रह, (०८४९५५१६ (85) 11०६४).
-9%न] दितीवं प्रकरणं 111
मुपिनोपमं कि तिमवे विक लधुभण्नम------ मापसाभ्भामं) न च श्रागतं न च इरोपगतं शून्यानिमित्त सद् सेततियो ५
घनुतथाद् शात्त निमित्तयरं पुगर्तीन गोचर ननिनान गुणा बल धारणो रृशबर्लन बलं
वदानि
बुदधानितं वृषभिता पमा ॥
वोत दि क यभ क य् 2) ७. षवतता 9० कम मु तिहु भेदेषु मेष = 70
रको 07940401 कदक्ट्डककाण्यक४ == 10क7कककतकु काका कत 98०2?
9 भ, ००१०१५०. प. जुमु दमस दगु ध छ मकमुम मेमु/ = न्ग
६०९} 5८द2 (१४2 कछदााष्व्.
4) 86४00९2; ५११४१ दवत.
6) 308. भवाम, -कष्कष्ण; गू). कुपित, एमुपम् ०४९ 19 10७७ त १200 (१४449000) ५१०
6) (€#€ 119९, 0808 16 भणि, ९8६ 12 ए7शकलिः€ 86 1४ ६४०6९.
7 ्रुपस मुम नम दमस सूरः वे रयि पसः = एनम, कोठ. दवय ९८४९८ कनकमेव © = -- ९ अषणफ]0€ पणर भणको८ह वेण एप्पल ष्का १९ राक णां $€ 16 ००६ 50252८४. (वव्दृष्छेन्पद).
8) = ए५९दा\@ा । १६/१४ == एवतोक्लवलक शकक == ५५१ बे सूसकम ।
112 ` प्रत्ययपरीत्ता नाम [98० युतधर्मुपकेनिवयो | गुणक्तानघाएणिबलं | पमं । इदोविर्वणविधिः परमो वरपचमिन्ञपातलामनपः । इति विस्तरः ॥
$ = सइत्याचर्चन्द्रकोर्तिपादोपर चितायां प्रसन्रपादायां मध्यमकवृत्तौ गतागतपरौतणं , नाम दितीयं प्रकरणं [7)0. 43] ॥ ^+ .
1) 1088. च्वन्ष्रव, (कान्तत, ण्ण. | 2) &०४०द०09; ५१८१2११५. 9 दुमपरनद्ुयय, एणं 19. 1. 495. 4) णठ = सुपः
-339] तृतीये प्रकरणं 113
1,
चलतुरारन्दरियपरोत्ता नाम ततीयं प्रकरणा
्त्रार् । वष्यपि गतिश्च गत्ता च गत्तव्यं च न विग्यते " तयापि प्र्वधनपिव्यपेत्तया इरष्ट्रष्टव्यद्शनादीनामत्तिवमा्थेयं । तथा चामिघमं उच्यते । र्णनं श्रवणं घ्राणं सनं स्पर्शने मनः। | इन्द्रियाणि षडतेषां द्ष्व्यादीनि गोचरः ५१९ ` तस्मात्सतति दूर्शनारीनि स्वभावत इति ॥ उच्यते । न सत्ति । इर र पश्य तीति दृशन चतुः \ तस्य च तरपं विषयतेनोपदिष्यते । पघ। पूर्नं बयं न पश्यति तथा प्रतिपाद्पन्नार । स्वमात्मानं दरशन हि तत्तमेव न पष्यति† ` ¦ न पश्यति यदात्मानं कवं रत्ति त्यान् २
1) 2१०००८८0 => 1रद्िदपाणा९. - ए2}९ ०4721512 1६८2 > ध ४तण६ 16 €+ 7९7667९६ १९ ९९ 08४६4808 ए ८११४18१४ त ९2. 1.1४. ए. 170.
गः कव पः मम च| ठण्ड यर चनु भर] मष ५) ४ ॥ सी ५ रपु पद प्खनक्म|| ४२० अपाः कुषम 8) ददिम मेषु मे प्सम् प पदेरुप एड = अ नवः क च~
4) 2188. अध्व काकी. , , , . {वना ९०५. , ,; 221९ ०१८21३19 1४ धमक ८०, ॥ (€ पणी 9 ४18 0 819
9 दे सनन पदगृकेम ठे] देष द्रुम मप्र] कुरकेगु प्यर् निः भु मे गुणरुगुय £ रष ४५० उषाः सं कषठ १०7 10-20 ९ की -भोष ९०८-12 कं 0 -20-
ॐ
न 8 +
19
114 चलुरादीन्तरियपरीत्ता नाम ` (98०-
तत्र तदेव दर्थं स्वात्मानं न पश्यति स्वात्मनि त्रिंधाविरोधात् । ततश्च स्वा- त्मादशनाच्छ्रोजादिवन्रीलादिकं न पश्यति । तस्मान्नास्ति दशनं ॥ यग्चपि स्वात्मानं दशनं न पश्यति ' तघाप्यपनिवत्रान् गरत्यति । तथा स्िः परात्मानमेव ददति न स्वात्मान ! एवे दश{88णानं परानेव द्रत्यति न स्वात्मानमिति ॥ 5 एतदप्ययुक्त यस्मात् ' |
न पवीप्तोऽिटष्टात्तो दर्शनस्य प्रसिदये '
योभ्यमधिटृ्टात्तो दर्शनस्य प्रतिद्यये भवतोपन्यप्तः । स न पर्याप्तो नालं न समी न पत्यत इत्यथः । यस्मात् " = ५१ (4) पदूर्शनः स प्रत्युक्तो गम्यमानगतागतिः ॥ ३ (१. ५५०]
५ पर दर्शनेन बतत इति सदर्शनः। योश्यमिद एात्तो दर्शनप्रसिद्धये भवतोपदिष्टः। सोऽपि सर दर्शनेन दाटततिकाथिन प्रत्युक्तो ह् षितः। केन पुनरित्यारे ' गम्यमानग ताणतेः। यधा गतं न गम्यते नागतं न गम्यमानं ! एवमपिनापि ए्ग्धं न दृद्ते नादण्धं दृत इत्यादिना समं वाच्यं ॥ यधा च न गतं नागतं न गम्यमानं गम्यते ' एवं '
नट्ट दश्यते ताबद्दष् नेव दश्यते 1
15 ` दृष्टाद्टविनिर्त दश्यमानं न द्यते ॥
इत्यादि वाच्यं ॥ |
.1) अकष€ एषपल€ 8 10788. १.) 1. 48; 8०११016. ६, 1. 18, 0. 261.8.
%) ९९४४6 व्०णक्ड8्णा 78706 16 गवकवल् ५१४४८ (8 ०401५. शा. 61).
8) पर भए धभ-068808.84. 6,
% रष सपुष्प प" दर| भे स्वस ठे मृष" मपरम्| मुर मक्र स्मपपमस| नेभे परस चिनु
8) एण ५-0९88०8 7. 1
6) € त०६ 288 &६6 €00810€76 (दमाा्रा6 प€ बद्र, ०१6४४ 723 #79 प १878 09 उषा (आ्च्क्का ११ ४प ४१121158)
-84 म] | ` तृतीयं प्रकरणं ` 1185 `
यया च गत्ता न् गच्छति तावदित्यामुक्तं । वंन रधी दरति तावदित्याटि ` वाच्यं । एवं न दरष्टा पश्यति ताबदित्यादिनापरिदष्टत्तेन सङ गम्यमानगतामतिर्यस्मा त्समं द्षणमतोऽप्रिवदर्शनतिद्धिरिति न युव्यते ततश तिद्मेतत् ! स्वात्मवदरशनं पा नपि न पश्यतीति ॥ वदेवं तय" ` नापश्यमानं भवति यदा किं चन दशनं । ६ शनं पश्यतीत्येवं कथमेतत् यत्यते ॥ £" यदा चैवमपश्यत्र किं चिदुर्शनं भवति ,तशनीमपश्यते रृशनत्वायोगात् स्तम्भा दिवित् पश्यतीति दूर्शममिति व्यदेशो न युव्यते ॥ यग्चपि दरशनशब्दाटनत्तं ओोकबन्धा नुरोधेन (7५. 44४] दरशन पश्यतीति पाठस्तथापि व्याब्यानकाले पश्यती[शभ्ति दरणनमित्येवं कथमेत युव्यत इति पदितव्यं ॥ ` 10 ` किं चान्यत् , इक पश्यतीति दरथनमित्युच्यमानि दर्शनक्रियया दूरशनस्वभावत्य वा चलुषः संबन्धः परिकल्च्येत ' धटर्शनस्वभावस्य वा । उभवघा च न पुव्यत सत्याक् । ` पश्यति दर्षनं तैव नैव पश्यत्यर्धनं । दूरथनस्वभावत्य तावदु क्रियायुक्तस्य भूवः पश्यतीत्यादिना सेबन्धो नोपपग्बते ' दृशिक्रियादयप्रसङ्गात् ' दूर्णनदयप्रसङ्गाच्च । घदृशनमपि न पश्यति ' दृशनक्रियार् दिति- 15 ादृङ्गल्यमवदित्यमिप्रायः ॥ पटा
1) प्रभौ 6-0688४8 11. 8.
2) 1088. १2 वुको द। वद्योवयट ववश्व, , , ९०१४ १4 वक्षाक१०११ ०१/०८ वद्या, - 7५. रेषु सगृ मै सेण् "^ "वगु पे भे (1 ,
9 गरक सुरचप मे श्रैष| ब्रपस्येरयः स पड ब्व ब्र डम सेर] रेने रैर सगृममम, शुर |
4) म 270८ (६४0. 1. 109).
316 चलुरादोन्नरियपरीक्ता नाम (84१ पश्यति टर्न रेव नेव पश्यत्य । त ॥ ` दशनं पश्यतीत्येवं कथमेततु युत्यते ॥ इत्यनेनिव संबन्धः ॥ पे तु मन्यन्ते निर्व्यापारं कीटं धर्ममात्नमुत्यग्यमानमुत्यग्यत इति » 5 तैव किं चित्कशिदिषयं पश्यति क्रियाया श्रमावात्तस्भादूरशनं न पश्यतीति पिद्मे तत्प्रताध्यत इति । श््रोच्यते । टि क्रिया व्यवराराङ्गमूता न स्यात् ' तदा धर्म- ` मान्रमपि न स्यात् ! क्रियाविर्हितवात् खयुष्पवदिति कुतः क्रियार्रितं धर्ममात्रं भवि- ष्यति । तस्माग्यि व्यवद्हारसत्यं धर्ममात्रवत् क्रियाप्यभ्यगम्यतां , रथ तच्चिन्ता तदा क्रियावद्ममाज्नमपि नास्तीति भवताभ्य॒पगम्यतां ॥ यथोक्तं एतके । 10 क्रियावान् [7.45] शाश्चतो नास्ति नापित सर्वगते "क्रिया । | निष्क्रियो नाप्तितातुल्यो नेत्म्ये किं न ते प्रियं ॥ इति: तस्मान्नायं विधिर्बाध्व; परस्य ' नाप्यप्माकं तिद्साधनरोषः ॥
` 1) 068४6 8४8 १९ कद्व) १6 कावद (ष्मा लं -१६७७०३ 7. 96 1.18) 1906- 6४त870९०४ १७ 12 &१‰द. ए गाए 1४ 8187166; वध ऽका णवकचाअक्द कक्ष्य थव 1014070" कवक्हदा+ ४ वव दद्वः 80१९ ८0दछव॑८ (6४6९ 8०११४१९. 9 2. 6, नङ १०170पएच7१२ 2४88) १० उल णि. 1189, एभप्रलाहणला 8208 80271807, 361.8 ४९१३०६३४] 2४27, 276. 9 {18067872 170.19 ए729- ` १९५९४82 0 8877, 2. 309) == «008 1९8 8ध्श्द्वाः४8 807६ 71070604068 € टगः अपं पलः 1226प्00 धप्र फना€ण+ 16? 1€पाः वकश्लणा (ए) ९१९७४ 1४८४6 (== 16 ४६ १6४९ 16
` ए€8प् तण व्णाण16र6 [७24१8] १९४ ९६०8३९8), ९९७४ ९6 १०४ भकना भणथ्डं 18 णड- 82166 (16 9६ 0*6६€ प १68 ९06ी 6९०४8 तपा 66४ ए008॥66ण) >. 8१ इ ११६ १2०४५- 1877 (6०. 8. 8.) 184 दादा 5०0८१ वव = ण्व्ल्वद्ध, द ककशव रैर (पिव्यवाादय्कक) व्क द्रक्धावक ४ ९०... -- 19 1666 द्रक्तववक४ 16 097१४ 60007766 87.16 प्रकषण ए४०द 20; ए४९व-00-200 ०प ए४८वद 290 = वान्व शिं ०0 "€नोनल6 1४ 7621166 (कवश्व्लषद, पण्टक्द), 11 शप्र 0००6 णलः 18 ए १९8 5व1दक्ावड (= कोवााप्कीद्व); 680६ व577् वऽ, 118 ०6 800६ णं ९४०868 (क्ट) णं 680०868 (दा क्द); ४प 0०90४ १6 रण€ € 12 गशा४€ 06 1€सए€ा ९०५९ (ण्छकण्वकद्लवन्वक) वा == ४/2. ~ प्रण 18 वकीणाप्रणा 3४7१४१४९. 8. (४८80. ००४6 ॐ) श्व 7 एवन ९६ १..4.8., 1908, 7 2. 876
2) ड. 17. ~ एभः ०86०४, 1900, 7. 239. 9 गुखदुः नतु सुपः मेम् 4) 088. गदं क्ष४०; फ प्रकषण भेम मूर मदुन्स
४) 2088. शक्र" 72 ० (0. = ववडाप्व्द ववा 2454८ णपः ५ एद ५ 11.11,
-84 ४] ततीयं प्रकरणं 117
घत्रार् › त्रैव कि पश्यतो[94४ृति टूर्घनमिति कर्तृ्ाधनमभ्युषगम्यते , किं तरि पश्यत्यनेनेति टृ्शनमिति करटणपाधनं ' ततशोक्तदोषाप्रपङ्ः । पशानेन टृणनेन करणभूतेन पश्यति प द्रष्टा ' एष च विगते विन्तानामात्मा वा ' कर्तसद्रावाच्च टूर्णन मपि सिदमिति ॥ उच्यते । | व्याव्यातो ट्धनेनैव द्रष्टा चाप्युपगम्यतां ॥ €
यथा स्वमात्मानं दशनं ₹ीत्यादिना दृशनस्य हषणमुक्तमेवं दर रपि दशनवदूषणं वेदितव्यं । तग्यथा | स्वमात्मानं तैव दरष्टा दृ्णनेन विपश्यति । ` न पश्यति द्ात्मानं कथं द्रत्यति तत्परान् ॥ इत्यादि वाच्यं ' त्मादर्शनवद्रष्टापि नास्तीति षिदे॥ = ` 10
अन्रार । विग्यत एव दष्टा तंत्कर्मकर्णपद्भावात् । इह पन्नास्तोति न तस्य कमक्णे विग्येते तग्यथा बन्ध्यापूनोः । स्ति च द्रष्टः करणं दशनं ष्टव्यं च कमं । तस््ैत्वदिश्चमानकर्मकर्णो विश्यत ट्व दरति ॥ उच्यते \ नव हि ष्टव्यर्शने विरते तत्कृतो द्रष्टा त्यात् । द्रषटूतपिते रि ररष्टव्यदरशने (70. 45४] , त च निद्रप्य- माणः! । 1 16
` तिर्॑त्य) बर्टा नाप्त्यतिरस्कृत्य च दर्शनं।
इ द्रष्टा नाम पदि कश्चत्स्यःत त दरशनपापिततो वा प्यानिए्पेतो वा । तन्न पदि दूर्धनप्तापितोऽतिर्स्कृत्य दृथनमिष्यते ' तधा तिदस्य वा दृर्शनपित्ता प्यादतिदस्य वः) तत्र सिद्धो दष्टा न हि दृ्नमये्ते ‹ किं तिदस्य सतो दष्टः पुनरशनपिता कुर्यात् '
४ द्रप करम मणे द्वैपेन मै | प्पे रत पर| ुमपन्यमृरुपन् नपर
2 एग भ-4९०9४७ 1. 2.
8) 09728 16 ४०6५४।१. ~ 16 शा 6७६, ए0ण 16 प्रणंण४, 6र्णीधिः
118 चतुरादीन्द्रियपरक्ता तराम ७५४ न रि ति पुनरपि प्रायत् इति। घ्ामिद्धोगयत्ेत , घिद्धव्ादन्ध्याुतवदरधनं नापि्ते। एवं ताबर् तिरस्कृत्य द्श[ॐभुनमपेत्य ष्टा नास्ति ॥ तिरस्कत्यापि दृ्शननिपपेतवा- दित्युक्त प्राक् ॥ तदेवं तिरस्कृत्यातिरस्कत्य] बा दशनं पदा दरष्टा नास्ति तदा "
द्रष्टव्यं टर्न चेव ्र्ट्यतति ते कतः॥ ६
8 ष्यति निरदतुके द्रषटव्यद्शाने न संभवत इति कृतस्तत्सदरावाद्रष्टा प्रते तस्यति ॥ . अत्रास । विगते एव र्व्ये तत्कार्यपद्वावात् । तत्र ' प्रतीत्य मातापितरौ यथोक्तः पुत्रसंभवः। चते प्रतीत्येवमुक्तो विज्ञानपेभवः ०
1] ( चिज्नानमत्प्यतिं ) संनिषातात्साल्न (5) 4 | 10 इति दष्टव्यं दर्षन च प्रतीत्य विज्ञानमुत्यश्यते । जयाणां (6) 0 ~ ~ चार्वपि (8) ¦ व्पर्शः 'स्पर्शकन्ना वेदना ' तत्प्रत्यया तृष्णेति › एवं ` भवाङ्गानि दर्टव्य-
1) 96 088. -- [476 व भूण६े8 16 प्रकषण दकाद्काष्वा कावद १4 अवावा. . 9 मद्ुरस ब्रव पमे ब्रु स्ुरसयमजुन् एन] र मेषु ड मः । दैप वेग पृषत् भरि य रुर मदग] कौमुमृष मु मु तुरः ररव] रेषे मेषु फ गुङ्गुस देममस| दमपन्सेसय नजुरपर् यत्|| 4) पणा ७-१९88प8 . 6, ०. 4 ।
8) ०९18 80१४ 668 ६08? . 2" भूणटेड 16 शवप्प्हणन9 © 180४8 10 ककशन 15, 20 पणृषि्ानकषव्यत5दद) 30 णन्वकाषनएकद्रे$वव, (4 0014). 1. ए, 2419). - 012]188 १६४९8 १०८५५68 10 16 #काष्व-पकापक 9 न्दद्व, 20 16 कात (श्वो; 8० 16 १८0४१ ६6७1; 8०४ ९अप868; = १104004 470 वा ४८, १७८; ९8४ €: ११० 771.
6) ५ प च] ८] + > पुरुब्'तः ~ ४. ४१०४. 109. 591 केशवण्ठ) 105 रद्शकण्व,
106 -4१25)2४4. -- & 118 28. 221. 8 €६ ०६९; दकदरवका पककछण्द्गिद्ाव. -- व इ > ४0३ 51८४८45 (धद्व) 01४१8, 8४109), 1४1१. § 56.17. ~ 11616 वदेम कएद ९8४ अकपो€ (कण- छद्म), 4 91010} 1६. ४, (80५, 48.) 01. 3088 6. ~ 90 ऽत्ान४ 6४€ 191. 276 9 8: ऽद्शकणठ पिकादः 22006 $कण्व्व 6४ त्वक &दण्ढव ९४८ शच्रृद्छष्यः ४. १०४०९ 16 २ त1860५अ0०
-95 १ तताप प्रकरणं ` ` 19
[19.46 भुूरशनरेतुकानि 1वग्बत्ते । तस्मात्कार्थसदावाद्रटव्यद ८ विते इति ॥ उच्यते । स्यातामिति पटि विज्ञानादिचत्टपानि]व स्वीग्व्मात् * ्रषटव्यद्शनमावादिज्ञानाद्चतुष्ं । नास्तोति। `
इक द्रष्टमावादृष्टवयदर्धनेऽपि न त्त टत्यक्तं ' तः कुतो विन्ञानादिचतुष्टयं विक्ञानस्यषवेद्नातृषाव्यं । तस्मान्न सत्ति विन्ञानादीनि ॥ ` भरत्रार् । सत््येवेतानि तत्कारयदरावात् । रक् तृष्णापरत्यवमुपादानमित्यादिना , उपादानभवनातिनएामरणादिकं विज्ञानारिचतुषटयाडत्पग्ते * तस्मात्सत्ति विज्लानादीनि तत्कार्यसद्ावात् ॥ उच्यते । स्युषादानादीनि यदि विज्ञानारिचतुष्टयमेव स्यात् । यटा ` तु द्रष्टव्यद्णनाभावादिज्नानारिचतुष्टयं नेवाप्ति तदा उपाटानाटीनि भविष्यत्ति पुनः कथं ॥ ट"
न सत्युपादानादीनीत्यर्थः ॥ इधानो दूर्णनवच्छषायतनव्याव्या[95 णनातिदेशा- धमार् ।
४ ए0०8 € 1247021; 16 ऽव्नाणदद्चक १८ १6 114 7096 (लमा$च्छमवद्क) ९४ 1 श्च €{66 (018, पप्रा) 807६ ११2814945. ~ 1.6 ९६००६४८४ 68६ ऽद वश्य ¶०४०१ 16 गधढ०> € व्शवण्छ्का+ श्नुषा) ऋ 4/4, |
प) 2. प ¶प६. 245. 1140 शव्द कावप श्ल्ववष्ड. 49४10. 1. १. (4223) 54175007(0101 274171४0८14द ४/८; (ववा कदव्द श्ट्वकटा. -- 51 12 श्ट्वेवकट ०४६ तप्र 54१7180) 607९0०६ [€प॑-ला€ द्र शव्मद्वडवपदद (€०फाण€ 16 व ००४९ ५९०४५६२ 14 9 9140277४ ०९४ १8८प४ € ९6 16 ऽत्ोन्द्ष्मषवप्य (अप्रा १६०616) €# 16 तनय अतध्वपव1 2०0 (76184100 १९ = ८२०8९ ॐ सी); 106 १6 1 षवे. ९8६ शंापोध्€ ४ 1 काव एणं ९8४ 83 ९३०8९ (४6016 तप ऽवप ब्ा्४).
8) सुपति: पपमुकगु यवत. ~ एणः 40140. ७५४६०19 (उ. 7. 7. 8. 1884) ए, 12, 16 एव्म ४.
१ शर प्रप मयपर | दम परनेसचिगुसयः पे] एमुमेम् ःपन्समिमुचि सनस | ष्पुरम म्प |
€ 51471501
2) पष्मोपः षभः 8५7 714, 9. ००८.
10
ऋ पतुरारीन्नरियपलो्ा नाम [छण ॥ व्याव्यातं प्रवणं घ्राणं रसनं स्यर्नं मनः । दर्शनेनैव बानीयाच्छ्रोतृभ्रोतव्यकादि च॥ इतिं! १
उक्तं हि भगवता ।
न चकतुः [70. 461] प्रतते उपे मनो धर्मत्र वेत्ति च।
एतत्तु परमं सत्यं यत्र लोको न गाकृते ॥
सामग्या दर्शनं यत्र प्रकाणयति नापकः।
प्राोपचापमूमिं तां परमार््य वुद्धिमान् ॥ इति । तवा
चतुश्च पतीत्य उतः चतुविञानमिकोपनायते ।
नी] च्तुषि उ निभतं दपसनरात्ति न वैव चतुपि ॥
तरेएतम्यश्णुमाश्च धर्मि वे तेघात्मेति शुभाश्च कल्यिताः।
विपरीतमसदिकल्पिते चत्तुविजान ततोऽपि बायते ॥
४ वरप कमै क्र शुम मुर | छरपन्डेपं मुर वृङ् ५| $
प्त मूर मढ़मुवरबेगुस| दुम परतेस पर भषय् |
9 म द्म पिरथु्प भे तप्ये सुय -न्न्ुम | 1711 प्त व्छकद्द्न्काद्कमतछ चकला वकृकव्ठ) १०९४759. (९146 पवप्दण 8791६. ०४ 16 णंणड, 107९. -- 21८ ९७१ तपटण्ड, -- 1/6 8608 ९8 (लाक॑क्षणः 12 ० 1९ ककषप्षह
€08€ा € ०6 16 वलव्क 768पा४€ वणा €०ण16@€ ` च€ ९१०४३९३) ९१९8४ 19 पा ऽलं ह०९- ` 6६ द्णफद्ण्णानो १€ 1४ 1८१1४८६.
ॐ) टट पर 2119115४. ` 4) 09१28 16 पण, शक्छक्कीः ९त. 5) अ्वक्नं = 6) 488. शवकद्ुऽ्य्फकलर्तुः 62 क्वकं ८ , , , वाकां ९1९७४ शद, -कूष0
गृ मेषं मेःशगु कस तविुग | प वगु र शृं उकं शगु
-3ॐ5ण] ततव प्रकरणं 121
विक्ञाननिरोधं वित्तानउपादृवपे. विपश्यति ।
न करि चि गते न चागतं शृन्यमीयोपम योगि पश्यति ॥ तथा चर्यीपाल्िपृच्छायां। यसमोगि )~
सर्बततपोगि त पश्यति चतस्तत्न न पश्यति पत्ययरने। त्रैव [च] चतु पपश्यति इषं तेन सर्ोगंवियोगविकल्यः॥ मनोरमचित्रविशिष्ट ) ~
श्रालोकपमागभरित पश्यति चलू प मनोर्मचित्र । वेन च पोर््माभितचतुस्तेन न पश्यति चतु कदाचि ॥
1) 7020788 1€ प्प ९क्वणछककणद्ै, 2) ५४१24 -०४०४५. -- ए0प्ण 16 फद6: 19४08 -०7808. -- 0170008 = नगुगि 88008१9. = निस पत8 = रिवय") र१४१४ == उद.
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९) १४७५. ०००१०४९. - तेषा -ठे पमरप मुत् = व्ण ९० भणण्य9० (8०१९8८१) ४/११८व१).
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[8.1.18 7 वि 8१
128 ~ चलुरादीन्िपपरोला नाम तृतो प्रकरणे [95४-
यो पि च ग्रूयति शब्डु मनोज्ञः सो पि च नात्ति त्रातु पविष्टः। संक्रमं न च लभ्यति तस्य कल्यवणात पमुच्छ्रितु शब्द्: इति ।
(तथा ॥] गीतं न नृत्यमपि वाश्चहते न प्रा्छं सवप्रोपमा कि एतयोण्वुधमोकना् । ` सैकल्यलालस गता घरनुधा ऽन्न नाशं
किं त्केशद्ाप इव बालननो भवामि ॥ उति।
॥ इत्याचार्यचन्दरकीर्तिपादोपरचितायां [7;. 47 १] परतन्रपादायां मध्यमकवत्ती |
चततुरारोन्द्रियपरीत्ता नाम [969] तृतोषं प्रकरणं ॥
1) ¶10. = &4एकद्छष्का, ५1७०2. 2) "9768 16 ४४६४४१०. -- 06 प 88४६४६४1 ०३. ॐ) ¶१. = १0741005/0 १९ 6 १९192.
^+ भिर ~) 4,
~ग] , कर्ये प्रकरणे ` 128
` [४. स्कन्यपरीत्ता नाम चर्व प्रकरणं प्रत्रा । प्येवं चक्तदीनीन्द्ियाणि न सत्ति ' न स्कन्धा घ्रप्रतिषेधात् ' तदत गतानि चेन्द्रियाणि । शरतप्तान्यप्रि भविष्यत्तीति ॥ उच्यते ' स्युरेव पदि स्कन्धाः स्युः। तत्र शवत्कथमव्वित्याकि। ~ ~ `. ` 65 ` पकारणनिर्मक्तं न उपमपलभ्यते, ` ` 9 दषेणापि न निरम्त दृश्यते उपकारं ॥ ९
तन्न दपं भोतिकं ' तप्य कारणं चारि मराभूतानि + ननिरिकत पृथग्भूतं मरीतिकं पं दपन्द्गन्धरसप्प्रष्टवयाब्यं नोपलभ्यते टादिव पहः 1 उयेणापि न ` निम उत्पत ्पकारमुपलभ्यते ॥ .. ,. ‰ ` ` = # ` तदेततप्तिननादयंप्रसाधयितुकाम घ्राक्: -डपकारणनिमकते उपे बरं प्रत्यते। घरारेतुकं " न चाप्त्यधः कथिदारेतुकः र चित् ॥ २
1) ग् ङंगुमय <: मवगृ प गृ ङगुस गे ममृत, मे रुर | काम बेषञजम मणु महग णे नद्] ` 2) १ [6160१] ९8४ € 19६ 0408 16 868 १6 एववपःय [००9] (== ¢1\4
{दक्, रणए ५-१९७8४8 71. 6 € 2088 126. 1). ~ & ४१) ४४7४, 11. 2.18 (@. 582. 8). -- 0४ 019०६०९ 16 ०/८ ९४ 1९ अक्काषलभढ (6-468598 2. 118 ०. 6).
8) 9९ ४1९०8 18 1९40४ १९8 088. ¶०€ }6 वणक वकण 8 दलाी6ः 2. 24, ०. 8. -- 0४ ६८०९९ € €#€। 1४ 6176 €लपा€ ८८ १४०४ ३००३81४8 8 072४ 9. 21 (6016 2४ 4. ५. 86४१8४11, १४०६ 20 ०४६०४ 1908. 1}. = ` 30० क्ता, र. १०५. 30. 14, 82.17
५ गृण जरं ग सर्गुभियमः | गृकगुष गं गृकगम वे वुमन कथवननमे मुम रि पर | बुनेमपः मै गुरः गग भेम
124 त्कन्धपरोज्ता नाम [७७१ पथा घटादू्त्तएमूतः पो न घटरेतुक ' एवं ब्षकराएणचतुरमरमूतव्यतिरिक्त भोतिकं बपमिष्यमाणं न भूतकेतुकं स्यात् । न चास्त्यर्थः कथिदाकेतुकः का चित् । तप्माएदेतुकवदोषप्रसङ्गात्र उपकारणनि्मुक्तं उपमभ्युपेतव्यमिति ॥ इदानीं उपेणापि विनिर्मुक्तं पथा ब्रपकारणं नात्ति तथा प्रतिपाद्यत्राद । 5 वपेणतु विनिर्मुक्तं यदि [7४.479] स्याद्रूपैकार्णं ।
यदि कार्यंद्पविनिर्मक्तं उपकारं स्यात्तदा ' पथा घदमत्करुणएडं पृथकसिद्धे घट्हेतकं न. भवति ' एवे कार्ीत्पृथभूतं कारणमिष्यमाणे ८ -खकारयकं काणं स्यात् ।
(नी ह. 9 [न् (ज ्वततर्दत -५* +. [8 कार्यनिरपेत्ताच्च ५ निर्ेतुके स्यात् । कारणस्य ङि कारणते कार्य(96 प्रवतिरहेतुः ` कार्थनिएपेत्ाचच कारणात्यृथकिसिडा 1 नास्ति ^ ¢ ( क १ [की भ 4 10 त नाप्ति कार्परवृत्तिः। यञ्चाकार्यकं कारणां तनिर्हेतुकबात्ररोएगतु- ` एगविषाणवनरास्त्येवेत्यार् । / नास्त्यकार्े च कारणा ॥ तिं । ३
परथ चेद उपस्य कारणमिष्यमाणं सति वां उपे कार एेनेष्यतेऽतति वा । उभयधा च नोपपश्चत इत्य्राद्ध । | 15 दषे सत्येव उपप्य कारणं नोपपग्बते ।
[रस् ~~ ~. ४7) वपःस्त्यब उपप्य कारणं नापपग्चते ॥ 8
पति वा -सेविग्यमाने ठे किं ब्पकरार्णेन प्रयो्नं । ्रसत्यपेवि्यमाने उषे किं
00.114 8 तवरपुभपपनिनुर तयुम्ये| तषषनुभेनन कुं भन् भ युुणृन एर् पर गुकुणुसये ये| ` श ५ भव् प् मे" भुन् |
| गृडगृर भगं भरः गरुगुषठे वै| जुं णन वयर मे ्युष्ेष्|
भग] चतुर्ध प्रकरणं 125 दपकारणेन प्रयोननं ' कस्य वा तत्कारणमिति परिकल्प्यते । तस्मादसत्यपि उपे बरपकार्णं नोपपग्मते ॥ भ ¦ घय त्याग्यग्यच्येवं द्रपकार्णं न संभवति ' तथापि कायं उपं संविग्यते तत्सदा- वात्कारृणमपि भविध्यतोति ॥ स्यादेवं यटि कं रं स्यान्न वत्ति प्मात् " निष्कारणं पुना वं तेव तरिवोपपग्यते । 5 बपकार्णं यथा नास्ति तथोक्तं । घसति कारणे कतो निर्देतुकं कां [79. 48०] दपं भवेत् । नैव तैवेत्यनेन सावधारणेन प्रतिषेधदयेनारेतकवाद्प्यात्यनिषटतां दरण - यति ॥ यतश्चैवं उपं सर्वथा विचार्यमाणं न मंभवति ' रै तचवणी योगी | 10
विकल्पेन (1)
दपगतान् कांशिन्न विकल्यान् विकल्पयेत् ॥ ५
सप्रतिघाप्रतिघपतनिदूर्शनानिदृशनातीतानागतनीलपीतादिविकल्यान् बपालम्ब- नान्न कांशित्परिकल्यपितुमरैतीत्यथः । शपि चेदं ब्पकाृणमिष्यमाणं सदशं कां निष्पादयेददृशं वा , उभयधा च नो- ` पपग्यते ' इत्याह ।. | | 16 न [879] काटृणत्य दशं कार्यमित्युपपग्यति । (न काृणस्यापद्श [न कारणस्यासद्शं कार्यमित्युपपग्यते ॥1 ६
१ रप नुुभमगु मे| पुव मै 3 उनम मर गृडगुष येम |स्गुरि पर दसपनवदगु मे| = श्वम शय ४. तपुसःयु, ञं दर नियः बस उवः पदप ममु कषक शु ^ भेपर दुम| उपयर दवपुप मपमम्||
रः ` . स्कन्धपरीक्तानाम ` `. . ` [भभ
तत्र दपकारणं कटिणद्रवोष्णतदूलस्वभावं । तिक ` तु च्तुगाग्याध्यात्मिकं
पञ्चवलावक्ननाख्याग्रयत्रपप्र्॑ादात्सकं ' बां तु. ढपाग्यायतनादिकं चतर्विक्तानादिमा खलत्तणं न: मराभूतस्वभावमिति । रतो मित्रल्तषणवानिर्वाणवत्कार्यकारणयोः सा- दृश्यमेव नाप्तोति क | 5 न कारणस्य पषटशं कायमित्युपयव्यते। ` । | + चापि सदृशानां शालिबोजादीनां परस्यर्कार्यकारणभावो ष्ट इत्यतो _ ` कारणस्य पटृशं कायमित्यपयग्यते ॥ तथापि 7 6 न कारणत्यासदृशं [7४. 48०] कायमित्यपपस्ते। ` 10 भिन्नलन्नणवातिर्वाणवदेवेत्यमिप्रायः
यथा चेदं ठं .विचायमाणं स्रधा नोपप्चते ' एवं वेद्नाद्योऽपीत्यतिदिश- ॑
न्रार्। ` वेदनाचित्तत्तानां संस्काराणां च सवेशः। ` सवेषामेव भावानां णिवे तमः क्रमः| ४ `
1) क्षप वडददद == ॥ - » + ^ * " , (णण &11८888. 250, ०. 3. ~ 1.68
66168 ५1४68 97 68172 7 8 €4क0178860॥ ¶९ १व-20 = क$४कव१द. -- 4०५ 8001668
19014०66 87 1. ए ९ ०0811 (7 0.-811 § 597, ^ ५१४२8६1. 77.72.306), भणण्लः क. पः. `
101. 98) ^ 0100. 8. ए. 1 (व. ?. 7. 8.) 1884) @कडद्दवरककपक्द्को, कद्वद, क) द््कदव्छरका भदा, ९६ ^ 01140. ॥, ४. (806, 48.) 2899 8 ध्व्वद्ानन् ०४८